सावन विशेष : क्यों पहनें मांगटीका?
जानी मानी पत्रिका 'एराउंड द इंडिया' के मई अंक में छपे लेख 'सोलह श्रृंगार की महत्ता' की लेखिका कुमद मेहरोत्रा ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया है, जिसके बाद उन्होंने अपनी लेखनी से श्रृंगार का महत्व समझाया है। चलिए सावन के इस शुभ मौके पर हम आज से शुऱू करते हैं श्रृंगार की महत्ता।
कुमद मेहरोत्रा के मुताबिक स्वर्णाभूषण शरीर के ऊपरी भाग में घारण किये जाते हैं और वेदांग की मान्यता है कि सोना संसार के पालक श्री हरि विष्णु को सर्वाधिक प्रिय हैं। इसलिए मान्यता है कि स्वर्ण आभूषण नाभि से ऊपर ही धारण किये जाये। इसलिए श्रृंगार का क्रम सिर से होते हुए पैरों तक पहुंचता है। आज हम आपको बताते हैं श्रृंगार नंबर 1 के बारे में, जिसें हम 'मांगटीका' कहते हैं।
महिलायें जब भी श्रृगांर करें तो वो सबसे पहले मांग टीका धारण करें, क्योंकि यह पति द्वारा प्रदान किये गये सिंदूर का रक्षक होता है। ललाट पर लटकता हुआ इसका अंतिम छोर दोनों भवों के नीचे पहुंचता है, जहां पर पुरूष तिलक लगाते हैं इसलिए इसका नाम मांग टीका है। क्योंकि ये पूरी तरह मांग को आच्छादित करके टीके के स्थान पर पहुंचता है।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के कई क्षेत्रों में यह माना जाता है कि कोई भी दुल्हन तब तक मांग टीका नहीं उतार सकती है जब तक कि वो मां नहीं बना जाती। अगर वो घर में मांग टीका नहीं पहन सकती है तो कोई बात नहीं लेकिन उसे बाहर जाते समय तो हर हाल में टीका पहनना जरूरी होता है। इसका मतलब ये होता है कि संतान के रूप में वो पूरी नारी बन गयी है, लेकिन जब तक उसे ये सौभाग्य नहीं मिलता तक उसे मांग टीका से अपने आप की रक्षा करनी होती है। ( कल पढ़े श्रृंगार नंबर 2 के बारे में)













Click it and Unblock the Notifications