फर्जी खुलासों में माहिर है उत्‍तर प्रदेश पुलिस

UP Police is expert in fake work out
लखनऊ। यूपी कदम-कदम पर बदनाम व दागदार होती खाकी। पिछली घटना से कोई सबक न लेना। उत्तर प्रदेश पुलिस जिसे अपराधियों का संरक्षक कहा जा रहा है। कहा भी क्यों न जाए यूपी पुलिस जिस प्रकार घटनाओं का खुलासा करती है और जैसे ही कोई बात बिगड़ती है वह आरोपी को क्लीन चिट देकर वर्दी पर लगी धूल को झाड़ लेती है। सीएमओ डा. विनोद कुमार आर्या की मौत से लेकर निघासन काण्ड तक पुलिस कई बार कटघरे में आयी लेकिन उसकी कार्यशैली में कभी भी सुधार नहीं हुआ। डा. आर्या की मौत को यदि सही खुलासा होता और आरोपी पकड़ लिए जाते तो शायद डा. बीपी सिंह व डा. वाईएस सचान आज जीवित होते।

सीएमओ परिवार कल्याण डा. विनोद आर्या की 26 अक्टूबर को हत्या हुई। हत्यारों ने उन्हें विकास नगर स्थित उनके घर से कुछ दूरी पर गोली मार दी गयी है। पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच शुरू करने की बात कही। डा..आर्या हत्याकाण्ड का 12 दिसम्बर 2010 में खुलासा हुआ लेकिन खुलासे पर उठे सवालों ने पुलिस के दावों को गलत साबित कर दिया है। पुलिस ने डा. आर्र्या की मौत के लिए माफिया अभय सिंह को जिम्मेदार ठहराया जबकि जेल में बंद अभय सिंह ने अपने बयान में पुलिस के आरोपों को गलत बताया।

आश्चर्य की बात तो यह है कि पुलिस कल तक जिस अभय सिंह को हत्याओं का सूत्रधार बताने पर तूली थी अब वह उसे क्लीन चिट दे दी। पुलिस के इस रवैये पर प्रश्न उठने लगे हैं। सवाल यह है कि यदि पुलिस के पास अभय सिंह के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं था तो वह अभय सिंह का नाम किसके दबाव में ले रही थी। पुलिस ने हत्या के आरोप में जिन लोगों को कुसूरवार बताते हुए जेल भेा उन पर वास्तव में आरोप हैं या फिर पुलिस अभी भी जांच को भटकाने में लगी है। पुलिस ने अभय सिंह को घटना का सूत्रधार बताया और बाद में उसे क्लीन चिट दी लेकिन इस बीच उसने जिन लोगों को 7 माह तक जेल में रखा और बाद में उन्हें बेकसूर बता दिया उनका क्या होगा।

तथा क्या कानून पुलिस के खिलाफ इस मामले में कोई कार्रवाई करेगा या फिर खाकी पहने यह लोग इसी प्रकार मनमर्जी से लोगों को जेल भेजते रहेंगे। डा. आर्या के मामले का पुलिस ने जिस प्रकार खुलासा किया और बाद में बैकफुट पर चली गयी से उससे तो यह साफ है कि सारा घटनाक्रम किसी बड़े नाम के इशारे पर हो रहा था। पुलिस की कार्यशैली पर नजर डालें तो राजधानी की पुलिस फर्जी खुलासा में बहुत माफिर है। हसनगंज इलाके में महिला व्यवसाई के घर लूट हुई मामला दर्ज हुआ तो पुलिस हरकत में आयी। विभाग के आला अधिकारियों ने जब इसकी खबर ली तो तत्काल पुलिस ने उनके पूर्व कर्मचारी चौक निवासी चांद को पकड़ा और सारा किया धरा उसके सिर पलट दिया।

आरोपी कहता रहा कि वह निर्दोष है लेकिन पुलिस कहां सुनने वाली थी। कुछ समय बाद असली लूटेरा पकड़ा गया जिसके बाद पुलिस की खूब फजीहत हुई लेकिन शर्म लिहाज छोड़ चुकी पुलिस ने चांद को रिहा कराने के लिए कोर्ट में अर्जी लगा दी। बेकसूर चांद को जेल भेजने वाले पुलिसवालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा ही वाकया राजधानी के मडिय़ांव इलाके में हुआ जहां एसओ अनूपमा सिंह ने अभिरक्षा से भागे एक आरोपी की जगह एक व्यक्ति को पकड़कर जेल भेज दिया। बेकसूर व्यक्ति को जेल में डाले जाने की घटना को खुलासा और वरिष्ठ अधिकारियों ने इसका संज्ञान लिया तो आनन-फानन में उसे जेल से रिहा कर दिया गया।

गोमतीनगर पुलिस ने अपनी पीठ थपथपाने के लिए इलाके में व्यवसायी दाऊ दयायल हत्याकाण्ड में पुलिस ने फर्जी खुलासा किया और कुछ लोगों को हत्या के आरोप में जेल में डाल दिया। घटना के खुलासे के बाद कैन्ट पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया पूछताछ में पता चला कि गोमती नगर के व्यवसायी की हत्या उन्होंने ने ही की थी। असली हत्यारों के पकड़े जाने के बाद राजधानी पुलिस की काफी खिचाईं हुई लेकिन पुलिस वालों ने वर्दी पर उड़ी छींटों को झाड़कर फिर अपना कार्य शुरू कर दिया।

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