सीबीआई जांच की मांगों में खो गए जनता के मुद्दे

मंहगाई की बात हो या फिर जनता को मिलने वाली अन्य मूलभूत सुविधाएं विपक्षी इन बातों को दरकिनार कर अब सिर्फ सीबीआई जांच की मांग की राजनीति करने लगे हैं। विपक्षियों की यह मांग आज से नहीं बल्कि बीते चार वर्षों से चली आ रही है।
चार वर्ष पूर्व मायावती के सत्ता संभालने के बाद से ही विपक्षी प्रत्येक हाई प्रोफाइल मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रही है। चाहे किसी विधायक की हत्या की बात हो या फिर किसी अन्य ऐसे अपराध की बात जिसमें कुछ वरिष्ठ लोगों के नाम आए हों विपक्ष ने हमेशा जांच सीबीआई को सौंपे जाने की मांग की।
लखीमपुर के निघासन में जब सोनम नाम की नाबालिग लड़की के बलात्कार व हत्या की बात हुई तो विपक्षियों ने सीबीआई जांच की मांग उठानी शुरू कर दी। इससे पूर्व जब 2 अप्रैल को सीएमओ परिवार कल्याण डा. बीपी सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गयी तो भी विपक्षियों ने मामले की सीबीआर्ई जांच की मांग शुरू कर दी।
इसके कुछ सप्ताह बाद 22 जून को जब डा. वाई एस सचान की जेल में मौत हुई तो भी विपक्षियों ने सीबीआई जांज का राग अलापना शुरू कर दिया। सरकार को कदम-कदम पर घेरने के प्रयास में विपक्षी जनता के आम मुददों को भूलते जा रहे हैं।
कुछ दिन पूर्व जब सिलेण्डर व पेट्रोल के दाम बढ़े तो विपक्षी दलों ने दो दिनों तक प्रदर्शन किया लेकिन समय बीतते ही वह अपनी मांग भूल गए। समाजवादी पार्टी जहां मुरादाबाद मुददे को भुनाने में जुट गयी वहीं भाजपा ने मायावती के भ्रष्टाचार को उजागर करने में ध्यान देना शुरू कर दिया। उधर अन्य छोटे दल जनता के मुददों पर बोलने की बजाय जोड़ तोड़ की राजनीति में ही जुटे रहते हैं।












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