'कालका' का काल देख आंख में आंसू और चेहरों पर दहशत
ट्रेन की गति धीमे थी, लेकिन लोगों की दिल की धड़कने बढ़ी हुई थी। लोग ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रहे थे तो कुछ लोग अपने प्रियजन के लिए खुदा से दुआ मांग रहे थे। ट्रेन अब काफी धीरे हो गई थी। वह प्लेटफार्म पर रेंग रही थी। लोगों के चेहरे दिखने शुरू हो गए थे। पर सभी के आंखों मे आंसू थे, चेहरे पर भय और दहशत का स्यापा। ट्रेन रुकी और डाक्टरों और तामीरदारों की फौज ट्रेन की तरफ तेजी से लपकी। डाक्टर अपने काम में लग गए तो कुछ लोग अपने परिजनों को देखकर विलाप करने लगे। कुछ इतने भाव विभोर थे कि उनकी जुबान तो हिल रही थी पर उसमें से बोल नहीं फूट रहे थे।
उसी ट्रेन में चढ़े बंगाल के एक यात्री सुब्रतो ने बताया कि हमलोग नाश्ता करके अभी खाने का कार्यक्रम बना रही रहे थे कि एक झटका लगा औऱ फिर क्या हुआ हमें पता नहीं। कुछ देर के बाद चीख पुकार मच गई। हम लोग की बोगी हवा में झूल रही थी। सभी लोग चिल्ला रहे थे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एसी बंद था। लाइट नहीं थी। पर कुछ समझ में नहीं आ रहा था। धीरे धीरे बात समझ में आ गई कि ट्रेन हादसे का शिकार हो गई है। पर हमलोग कैसे उसपर से उतरे यह समझ में नहीं आ रहा था। करीब चार घंटे के बाद हमलोगों को घायलावस्था में सेना के जवानों ने निकाला।
वहीं मुगलसराय स्टेशन पर सवार हुए कपिल ने बताया कि वह अभी सवेरे ही गाड़ी में सवार हुआ था। उसे दिल्ली पहुंचना था। उसका साक्षात्कार था। पर गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पर सभी लोग इस बात की खुशी जाहिर किए कि चलिए जान बची तो लाखों पाए पर सवाल वहीं छोड़कर वे चले गए कि क्या रेलगाड़ी में इसी तरह यात्रियों की संरक्षा और सुरक्षा होगी, या इसी तरह रेलयात्री सिर्फ भगवान भरोसे रहेंगे। पर एक नसीहत वे जरूर दे गए कि यदि समय से राहत ट्रेन पहुंच गई होती तो यात्रियों की मरने वालों की संख्या 67 नहीं होती। पढ़ें देश-दुनिया की ताज़ा खबरें
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