दलित की दाल-रोटी, चारपाई पर सोना... राहुल गांधी का अच्छा नाटक
ग्रेटर नोएडा से शुरू हुई राहुल गांधी की पद यात्रा अलीगढ़ पहुंच चुकी है। बीती रात राहुल गांधी ने दलित के घर पर दाल-रोटी खायी और वहीं चारपाई पर पड़कर सो गये। सुबह उठकर उसी दलित के घर पर चौपाल लगाई और उत्तर प्रदेश सरकार को जमकर गरियाया। ये खबरें पढ़ने में काफी मसालेदार लगती हैं। आखिर क्यों ना हो राहुल की पदयात्रा मीडिया को भी जमकर मसाला दे रही है। एक आम आदमी की नज़र से देखें तो राहुल गांधी अपनी इस पदयात्रा से लोगों को बरगला रहे हैं।
बात बरगलाने की आयी है तो हम शुरुआत यहीं से करते हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी यूथ आइकन बनकर कांग्रेस की नींव डालने में जुटे हुए हैं। अपना वोट-बैंक मजबूत करने के लिए राहुल गांधी किसानों के घर जाकर वहीं सो रहे हैं, खा-पी रहे हैं और लोगों से बात कर रहे हैं। राहुल गांधी का यह कहना कि वो भट्ठा परसौल के किसानों को न्याय दिलाने के लिए निकले हैं, तो उनसे हमारा सवाल यह है कि आखिर उन्होंने भट्ठा परसौल ही क्यों चुना?
राहुल को भट्ठा के वो मुठ्ठी भर किसान दिख गये, जिनके पास जमीने नहीं हैं, उन लाखों किसानों का क्या जिनके पास जमीन तो है लेकिन खेती के लिए खाद नहीं, बीज खरीदने के लिए पैसा नहीं और घर में चूल्हा जलाने के लिए ईंधन नहीं। अगर यह कहें कि नोएडा एक्सप्रेस वे के कारण भटठा के किसान प्रभावित हुए हैं, इसलिए राहुल गांधी उनकी मदद करने आये हैं, तो सवाल उठता है कि राहुल गांधी को बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, मऊ व पूर्वांचल के कई अन्य जिलों के किसानों की फिक्र क्यों नहीं, जिनकी जमीनें बलिया से दिल्ली तक बन रहे गंगा एक्सप्रेस वे के कारण छिन गईं।
राहुल गांधी को भट्ठा किसानों की जितनी फिक्र है, क्या देश की आम जनता की उतनी फिक्र है? नहीं। अगर होती तो वो महंगाई, काले धन और भ्रष्टाचार मामले पर एक बार प्रधानमंत्री या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से जरूर बात करते। अगर होती तो मायावती पर दबाव डालते कि वो केरोसीन व डीजल पर वैट कम करें, ताकि लोगों को राहत मिल सके। अगर होती तो वो मायावती की 2500 करोड़ रुपए की मूर्तियों व स्मारकों का विरोध जरूर करते।
इन सब बातों के बीच से सिर्फ एक ही बात निकलकर सामने आती है। वो यह कि राहुल गांधी सिर्फ वहीं जाते हैं, जहां मीडिया का फोकस होता है। शायद इसलिए क्योंकि उनके पास अब करने के लिए कुछ नहीं रह गया है। प्रदर्शन करेंगे तो पुलिस की लाठियां पड़ेंगी, धरना देंगे तो मीडिया ज्यादा तवज्जो नहीं देगी, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की तरह अनशन करने का शायद उनमें दम नहीं। सच पूछिए तो पदयात्रा के अलावा वो अब कुछ कर भी नहीं सकते हैं।
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