यहां दहेज में देते हैं नाग, बीन और पिटारा
तामिलनाडृ में इरलू जनजाति के सपेरे जब पोंगल त्यौहार के समय समूह में जमीन के अंदर से सांप पकडऩे जाते है, तो वह सांप की तरह ही सर्पाकार चलते है। सपेरो के विषय में रोचक जानकारी देते हुए एक विशेषज्ञ गुरमेल सिंह ने बताया कि सांपों की कम होती संख्या और वन्य जीव सरंक्षकों के चलन हो रहा है।
ऐसे में सपेरों के लिए जीविका जुटाना कठिन हो गया है और इसी के मध्य नजर रखते हुए सपेरों को सरकार की ग्रामीण पर्यटन योजना में शामिल किया गया है। इस योजना के तहत सपेरे ग्रामीण परिवेश को देखने के इच्छुक विदेशी पर्यटकों को सजी-सजाई, भैंसा-बुग्गी पर बिठाकर उन्हें अपनी बीन से विभिन्न विभिन्न धुन्ने सुनाते है और हरे-भरे खेतों के बीच बने कच्चे रास्तों से गुजरते हुए विदेशी मेहमान परंपरागत वेशभूषा पहने लोक कलाकारों के नृत्य और ठेठ भारतीय भोजन का आनंद लेते है।
बिजनौर के दारांगज नगर निवासी सपेरे भूरे नाथ ने कहा कि आजकल सांपों को पकडऩे पर रोक और ग्रामीण स्तर पर बढ़ रहे मनोरंजन साधनों के चलते पुशतैनी धंधा चौपट हो गया है और यही कारण है कि ज्यादातर सपेरों ने इस धंधे को छोड़ दिया है।
भूरे नाथ का यह भी कहना है कि सरकार को सपेरों के कल्याण के लिए प्रयास करने चाहिए, क्योंकि यह देश की प्राचीन धरोहर के रखवाले है, परंतु किसी भी प्रकार का सहयोग न मिलने के कारण लाचार हो गये है। यदि सरकार ने सपेरों की विवशत पर ध्यान नहीं दिया, तो वह दिन दूर नहीं, जब नाग, बीन, पिटारा और सपेरे सब इतिहास की चीज बनकर रह जायेंगे।













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