अरेंज मैरेज ही भारतीय समाज का आधार क्यो?

मेरी दादी की शादी हुई, जब वो सिर्फ़ 14 साल की थी। अगले कुछ वर्षी में उनके बच्चे भी हो गए। ये शायद वो पल होते है ज़िंदगी के, जिसे हर इंसान अपनी पढ़ाई और कॅरियर मे लगाता है और अपनी ज़िंदगी में कुछ करना और बनना चाहता है, उस वक्त मे उन्होने एक बड़े परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली और उन्हे ये भी याद नही कि उन्होने अपनी ज़िंदगी कब जी।
इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बड़ों ने जो किया वो ग़लत था, लेकिन हम ये भी जानते है कि अरेंज मैरेज हमें अपनी मर्ज़ी से अपने निर्णय और इच्छओं के विरूद्ध ही काम करवाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वो लड़कियाँ हैं, जो अरेंज मैरेज के बाद दहेज और कुप्रथा जैसी परेशानियों से आज भी जूझती रहती हैं। हमारे बड़े-बुज़ुर्ग समानतायः एक योग्य वर या वधू उनकी कुंडली, पढ़ाई, परिवार और बाहरी सुंदरता को ध्यान मे रख कर तय करते हैं, लेकिन ये सारी बातें तभी सार्थक होंगी, जब लड़का और लड़की एक दूसरे के विचार, व्यवहार और एक दूसरे की भावनाओं को समझे और उसका सम्मान करें परन्तु यह तो तभी संभव है ना जब कम से कम लड़का-लड़की शादी से पहले एक दुसरे को देख, समझ और जान पाएं, जिसका मुख्यतः आभाव अरेंज मॅरेज में पाया जाता है।
जहाँ परिवार और समाज अपने बच्चो को अरेंज मॅरेज के द्वारा सामाजिक सुख, सुविधाएँ प्रदान करता हैं, और समय-समय पर उनकी समस्याओ को पूरा परिवार मिलजुल कर सुलझाता है, क्योंकि अरेंज मैरेज का अधर ही समझौता और सामंजस्य है। यही कारण है की लोग अर्रेंगे मैरेज को ज्यादा लम्बा और सफल मानते हैं। वहीं लव मैरेज एक दूसरे की खुशी, सम्मान, इच्छाओं और आपसी समझ पे आधारित होती है, लेकिन उनकी किसी भी समस्या में उनके परिवार वालो का साथ न होना और हर वक्त परिवार के द्वारा ये एहसास दिलाए जाना की उन्होंने जो किया वो गलत है और वो उनके किसी भी समस्या में उनके साथ नहीं होंगे? एक बड़ा कारण है, जिसके चलते ज़्यादातर लड़के-लडकियाँ चाहके भी एक दुसरे के साथ जीवन व्यतित नहीं कर पातें क्योंकि वो अपने परिवार से अलग होकर कोई ऐसा कदम नहीं उठातें, जिससे उनके परिवार वालो को, उनकी वजह से समाज में शर्मिंदा होना पड़े।
मेरी राय में, एक सफल शादी तो वही है, जहाँ पर आपसी प्यार, त्याग और सम्मान हो, एक दूसरे के लिए और एक दूसरे जुड़े सभी रिश्तों के लिए हो, ना कि उन ज़बरदस्ती जोड़े हुए रिश्तों के लिए, जहाँ हर वक्त यही सोचना पड़े कि ऐसे रिश्तों को निभाएँ कैसे जिसे उन्होनें ठीक से समझा ही नहीं। आज जैसे-जैसे हमारे भारतीय समाज में लोगों ने अपने कपड़ों और रहन-सहन के तरीक़ो में बदलाव किया है, शायद वही परिवर्तन अगर वह अपने बच्चों के ज़िंदगी, शादी जैसे बड़े फ़ैसलों मे लाएं और समझे कि सिर्फ अरेंज मैरेज ही आज सामाजिकता के दायरे मे नही आता, बल्कि उनके आशीर्वाद से हुए लव मॅरेज भी एक सफल और स्वस्थ समाज को बनाते हैं।
*लेखक वाराणसी की हैं और नोएडा में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाईड्रोकार्बन में कार्यरत हैं।
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