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कड़े संघर्ष के बाद ममता बनर्जी को मिली सीएम की कुर्सी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल चुनावों में भारी बहुमत से कांग्रेस के गठबंधन में मुख्‍यमंत्री बनने जा रहीं त्रिणमूल कांग्रेस की मुखिया और पश्चिम बंगाल की दीदी ने आखिरकार अपने जीवन की सबसे बड़ी जंग जीत ली। सच पूछिए तो यह लड़ाई किसी जंग से कम नहीं, क्‍योंकि दीदी ने इस जीत से 34 साल पुराने वाम दलीय शासन को जड़ से उखाड़ फेंका है। वैसे सच पूछिए तो उन्‍हें इस लड़ाई में काफी संघर्ष करना पड़ा।

ममता बनर्जी ने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस के साथ 1970 के दशक में शुरू किया। बहुत जल्‍द ही वो महिला कांग्रेस की सचिव बन गईं। पश्चिम बंगाल की विभिन्‍न सीटों से वो 1984 के आम चुनाव में वो सबसे युवा सांसद के रूप में उभरीं। उस दौरान उन्‍होंने जाधवपुर सीट से सोमनाथ चटर्जी को करारी शिकस्‍त दी थी। देखते ही देखते वो ऑल इंडिया युवा कांग्रेस की राष्‍ट्रीय महासचिव बन गईं।

1989 में उसी सीट पर मिली हार से पश्चिम बंगाल में कांग्रेस विरोधी लहर दौड़ पड़ी। लेकिन 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में लगातार वो आम चुनाव में जीतीं और संसद में अपनी सीट से प्रतिनिधित्‍व करती रहीं। 1991 में नरसिंह राव सरकार में ममता मानव संसाधन, खेल एवं महिला एवं बाल कल्‍याण मंत्री बनीं। उसी दौरान उन्‍होंने सत्‍ताधारी सरकार को धमकी दे डाली कि अगर पश्चिम बंगाल में खेल को बढ़ावा नहीं दिया गया, तो वो मंत्रीपद से इस्‍तीफा दे देंगी। 1993 में उनसे सभी मंत्रालय वापस ले लिये गये।

1996 में सरकार में होते हुए भी उन्‍होंने काला शॉल ओढ़ कर पेट्रोल के बढ़ते दामों के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन किया। हमेशा से तेज़ तर्रार नेता रहीं ममता ने एक बार संसद के अंदर समाजवादी से सांसद अमर सिंह का कॉलर पकड़ लिया था। 1997 में रेल बजट के दौरान ममता ने अपना काला शॉल रेल मंत्री राम विलास पासवान की ओर फेंक कर विरोध जताया।

तमाम विवादों के बाद 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़ दी और ऑल इंडिया त्रिणमूल कांग्रेस का गठन किया। इस पार्टी ने मार्क्‍सवादी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी। 11 दिसंबर 1998 में एक विवाद के दौरान ममता समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कॉलर पकड़कर बाहर खींचती हुईं लायीं, वो भी सिर्फ इसलिए क्‍योंकि वो संसद में महिला आरक्षण के विधेयक का विरोध कर रहे थे।

1999 में उन्‍होंने एनडीए के साथ गठबंधन में सरकार बनाई और रेल मंत्री बनीं, लेकिन एनडीए के साथ भी उनकी ज्‍यादा नहीं पटी। नंदीग्राम और सिंगुर आंदोलन में ममता हमेशा आगे-आगे चलीं। ममता का यही आक्रामक अंदाज आज उन्‍हें सीएम की कुर्सी तक ले आया है। अब देखना यह है कि वो राज्‍य के विकास में उतनी आक्रामक साबित होती हैं या नहीं, क्‍योंकि जनता को उनसे काफी उम्‍मीदें हैं।

पश्चिम बंगाल में नक्‍सलवाद ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, अब देखना यह है कि ममता उससे कैसे लड़ती हैं।

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