'सरकार अपनी नौकरशाही की छवि सुधारे'

करुणाकरण हरि ने बीबीसी से बातचीत में कहा,"यहाँ हर प्रक्रिया में बहुत समय लगता है, ये बेहतर होगा कि भारत सरकार अपनी नौकरशाही की छवि सुधारे." यूरोपीय कंपनी केर्न ने वेदांत कंपनी के साथ क़रार कर पिछले साल अगस्त में भारत सरकार से राजस्थान में तेल खोजने की अनुमति माँगी थी.
लेकिन इस योजना में भारतीय कंपनी ओएनजीसी के साथ रॉयल्टी की अदायगी को लेकर बातचीत रुक गई और अभी तक इस मुद्दे पर सरकार किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाई है. कैबिनेट समिति में चर्चा किए जाने के बाद अब पिछले महीने अप्रैल में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति को अब इसपर फ़ैसला लेने के लिए कहा गया है.
भारत में तेल और प्राकृतिक गैस की माँग काफी ज़्यादा है और आपूर्ति बेहद कम. इस कारण भारत को बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर होना पड़ता है. मंगलवार को राजधानी दिल्ली में भारत के उद्योग और वाणिज्य मामलों से जुड़े संगठन एसोचैम ने भारत में तेल और प्राकृतिक गैस के उद्योग में विकास की ज़रूरतों पर एक बैठक आयोजित की.
यहां करुणाकरण हरि समेत कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधि मौजूद थे. तेल की खोज के बारे में कंपनियों को सलाह और विशेष जानकारी देने वाली कंपनी हैलिबर्टन कन्सल्टिंग के बिज़नेस डेवलपमेंट मैनेजर ने भी अपनी शंका व्यक्त की. वरुण भुटानी ने कहा, "सरकार को ये समझना चाहिए कि अनुमति के साथ-साथ काम सुचारू रूप से चल पाए, ये उन्हें देखना होगा, क्योंकि कंपनी को इससे बड़ा वित्तीय घाटा हो सकता है."
बैठक में भारत सरकार के नुमाइंदों का कहना था कि उनकी नीति कंपनियों के लिए फ़ायदेमंद है और गैस की खोज और विदेशी कंपनियों के निवेश को आकर्षित करती है. हाईड्रोकार्बन्स विभाग के सलाहकार आर के सिन्हा ने कहा,"अगर अनुमति देने में या बाद में कोई रुकावट सरकार की वजह से आती है तो इसके लिए घाटे की भरपाई के प्रावधान भी हैं."
लेकिन तेल मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा के मुताबिक़ परियोजनाओं के लिए अनुमति लेने की कवायद और नौकरशाही की वजह से अंतर्राष्ट्रीय जगत में सरकार की छवि खराब हुई है. इसके अलावा 1999 में लाई गई सरकार की एनईएलपी नीति (न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी) का प्रारूप पिछले सालों में बदल गया है और नए प्रावधानों से तेल और गैस के भंडार पर अब कंपनी का नहीं बल्कि सरकार का अधिकार हो गया है. तनेजा के मुताबिक तेल और प्राकृतिक गैस में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए भारत सरकार को सरल प्रक्रिया वाली एक स्पष्ट नीति लाने की ज़रूरत है.












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