छेड़छाड़ के डर के कारण बृजमंडल की होली से दूर होती महिलाएं
बजाज ने बताया, "अब से छह-सात साल पहले हम बांके बिहारी मंदिर में होली खेलने जाने के लिए बहुत उत्साहित रहते थे। लोग आश्वस्त रहते थे कि यह बहुत शुद्ध होली होगी लेकिन यदि आज कोई होली खेलने जाने का निर्णय लेता है तो वह अपने जोखिम पर ऐसा करता है।" उन्होंने कहा, "आप नई शर्ट या कुर्ता पहनकर मंदिर में होली खेलने जाते हैं लेकिन जब आप लौटते हैं तो आपके कपड़े फटे होते हैं और पुरुषों व महिलाओं दोनों के ही साथ ऐसा होता है।"
उन्होंने कहा, "यह हमारे लिए गम्भीर चिंता का विषय है। हम अपनी बहनों और यहां तक की मां को भी होली खेलने के लिए बाहर भेजने में असुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि वहां बहुत ही अभद्रताएं होती हैं। हम घर पर ही परिवार के साथ होली का त्योहार मनाना पसंद करते हैं।" पंद्रह वर्षीया पायल गुप्ता अपनी मित्रों के साथ कृष्ण जन्मभूमि मंदिर पहुंची थीं। वह स्वीकार करती हैं कि होली का त्योहार उनके जैसी लड़कियों के लिए खुशी और उत्साह के स्थान पर डर की भावनाएं लेकर आता है।
दसवीं की छात्रा गुप्ता कहती हैं, "यहां लड़कियों के साथ बहुत बुरा व्यवहार होता है, बहुत छेड़-छाड़ होती है। लड़के इधर-उधर हाथ लगाते हैं और मौके का फायदा उठाते हैं।" एक अन्य छात्रा माला शर्मा कहती हैं कि होली के समय लड़कियों की स्वतंत्रता छिन जाती है। उन्होंने कहा, "होली के नजदीक आते ही हमें हमारे माता-पिता घर से निकलने की इजाजत नहीं देते। कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में प्रसिद्ध लट्ठमार होली होती है लेकिन हम यहां अपने माता-पिता के साथ ही आ सकते हैं नहीं तो हमारे साथ गलत हरकतें हो सकती हैं।"
पुलिस भी खुद को मजबूर बताती है और कहती है कि लोग इस मामले में लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराते। दूसरी ओर रंग लगा होने के कारण लोगों को पहचानना मुश्किल होता है। लट्ठमार होली में बरसाना की महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती हैं और पुरुष अपना बचाव करते हैं। यह होली 14 मार्च को शुरू हो गई है और 16 मार्च तक मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर में जारी रहेगी। बांके बिहारी मंदिर में पांच दिन तक होली मनाई जाती है। यहां 16 मार्च को एकादशी के दिन इसकी शुरुआत होगी और 20 मार्च को दोपहर दो बजे तक होली खेली जाएगी।













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