पालकी में सवार होकर अस्पताल पहुंचते हैं बुजुर्ग

पालकी के स्वरूप को हल्का बनाने के लिए जर्मन स्थित हैमबर्ग विश्वविद्यालय के दो छात्रों ने एक डिजायन तैयार किया है। आपातकालीन प्रबंधन एवं अनुसंधान संस्थान (ईएमआरआई) ने इस डिजायन की 500 डोलियों का प्रस्ताव शासन को भेज रहा है। पहाड़ के दूरदराज के गांवों से अत्यधिक बीमार लोगों को अस्पताल तक लाने में डोली की भूमिका अहम होती है। यातायात सुविधा से वंचित सैकड़ों गांवों के बूढ़े-बुजुर्गो को यदि डोली का सहारा न मिले तो उनका अस्पताल तक पहुंच पाना एक टेढ़ी खीर है।
कुछ स्थानों पर हालांकि घोड़े-खच्चरों का भी उपयोग किया जाता है, लेकिन पालकी व्यवस्था सस्ती और आसान मानी जाती है। इसे देखते हुए सरकार पिछले काफी समय से इस सुविधा को और अधिक कारगर बनाने की कोशिश कर रही है। ईएमआरआई 108 के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनूप नौटियाल ने बुधवार को बताया कि मरीजों को घर से अस्पताल तक पहुंचाया जा रहा है, लेकिन गांवों से सड़कों की दूरी काफी अधिक है। इन गांवों के मरीजों को सड़क तक पहुंचाने के लिए डोली की व्यवस्था की जा रही है।
उन्होंने बताया कि जर्मनी स्थित हैमबर्ग विश्वविद्यालय के छात्र फ्रैंक और हैरिक ने डोली का हल्का डिजाइन तैयार किया है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के जरिए 500 डोलियों का प्रस्ताव तैयार किया गया है। पहले चरण में पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली और उत्तरकाशी जिलों के दूरस्थ गांवों में यह सुविधा मुहैया करायी जाएगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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