मुंडा के सामने उपचुनाव में कड़ी चुनौती
मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए मुंडा को उपचुनाव जीत कर राज्य विधानसभा का सदस्य बनना आवश्यक है। क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद छह महीने की अवधि पूरा होने के करीब है।
मुंडा के खिलाफ एकजुट विपक्ष और कई मुद्दों को लेकर नाराज मतदाताओं ने चुनाव को महत्वपूर्ण बना दिया है।
विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार, झारखण्ड विकास मोर्चा-प्रजातांत्रिक (जेवीएम-पी) के कृष्णा गार्गी मुंडा को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
गार्गी को कांग्रेस के साथ ही शैलेंद्र महतो, सूरज सिंह बेसरा जैसे मुंडा के पूर्व सलाहकारों का भी समर्थन हासिल है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं जेवीएम-पी के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने गार्गी के चुनाव प्रचार की कमान संभाल रखी है।
इलाके के लोग दो महीने पूर्व हुए पंचायत चुनाव को लेकर नाराज हैं, क्योंकि पंचायतों में स्थानीय जनजाति मांकी-मुंडा व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।
मांकी-मुंडा परम्परा के अनुसार ग्रामीणों को स्वशासन का अधिकार होता है। युगों पुरानी इस व्यवस्था में ग्राम प्रधान (मांकी) छोटे अपराधों के मामले में एक न्यायाधीश के रूप में काम करता है और राजस्व वसूलता है।
इसके साथ ही जनजातियों को 50 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने को लेकर इलाके के पिछड़े समुदाय के लोग भी नाराज हैं।
मुंडा, मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए देर रात तक प्रचार कर रहे हैं। प्रचार में उनके साथ दोनों उप मुख्यमंत्री, सुदेश महतो और हेमंत सोरेन भी होते हैं। महतो आल झारखण्ड स्टूडेंट यूनियन (एजेयू) के अध्यक्ष हैं और सोरेन, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के प्रमुख शिबु सोरेन के बेटे हैं।
सत्यानंद झा, गोपाल कृष्ण पातर उर्फ राजा पीटर और हेमलाल मुरमु जैसे तीन कैबिनेट मंत्री भी मुख्यमंत्री के प्रचार दल में शामिल हैं।
मुंडा को हालांकि विश्वास है कि वह उप चुनाव जीत जाएंगे। उन्होंने कहा, "जनता इतिहास रचेगी। खरसावा की जनता राज्य और इस इलाके के विकास के बारे में जानती है।"
दूसरी ओर मरांडी दावा करते हैं कि मुंडा की हार सुनिश्चित है। उन्होंने कहा, "मुंडा चुनाव हार चुके हैं। मतगणना के दिन इस बात की आधिकारिक घोषणा हो जाएगी।"
मतगणना 17 फरवरी को होगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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