खुद को प्रोत्साहित कीजिए, रहिए सबसे आगे

जोगिन्दर सिंह

नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। प्रोत्साहन किसी भी क्रिया के लिए मूलतत्व है। यह वह चीज है, जिसकी जरूरत आपको हर जगह, हर समय एवं हरेक परिस्थिति में होती है। यह किसी परेशानी एवं श्रेष्ठ परिणाम पाने की प्रभावी रवैया है। हमें जीवन की योजना इस तरह से बनानी चाहिए कि हम खुद के श्रेष्ठ प्रोत्साहक बनें। यह एक खुद को प्रोत्साहित करने का जागरूक रवैया है।

आत्मविश्वास एवं स्वाभिमान की कमी का सामना करने के लिए इस दिशा में छोटा ही सही, प्रयास करना अच्छी शुरुआत है। यह सफलता का आदर्श फूल है। इसे करने का कोई अच्छा समय समय नहीं है, इसलिए आप जहां भी हों, अभी से एवं ठीक इसी दिशा में काम करें।

बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं कि खुद को कैसे प्रोत्साहित किया जाए। इसके लिए आपको अपने दिमाग में मूलधार एवं प्रतिफल को अपने दिमाग में बैठाना होगा। आप खुद को पुरस्कृत करने का एक तरीका खुद के प्रोत्साहन स्तर को बढ़ाने के लिए अपना सकते हैं। आप कुछ लक्ष्य बनाइए, चाहे छोटी ही क्यों न हो और इसे हासिल करने के लिए मेहनत कीजिए।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि उत्साह के स्तर को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है, पर इसके बिना कोई भी सफलता नहीं पाई जा सकती। जो विकास आपने किया है, उसे पहचानें एवं इसे सकारात्मक सोच एवं क्रिया कलाप में अपनी आदत बनाएं। अपने लक्ष्य के प्रति हमेशा समर्पित रहें। समर्पण वह कुंजी है जो सफलता के सारे द्वार खोल देगी। यदि आप समर्पित नहीं हैं एवं अपने मन को बदलते रहते हैं, तो जो भी आप पाना चाहते हैं उसे महसूस नहीं कर पाएंगे।

समर्थन का अर्थ है कि आपने सफलता का जो क्षेत्र चुना है और जो भी आप पाना चाहते हैं, उसमें जोश के साथ लगे रहें। समर्थन खुद एवं संस्था के लिए ऐसी चीज है जो बेहतरीन कर्मचारी को मिल में काम कर रहे कर्मचारी से अलग करता है। समर्थन छोड़ने को नहीं कहता। यह खड़ा होता है रुकावट का सामना करने के लिए एवं जरूरत पड़ने पर बगल से से आगे बढ़ जाता है।

किनारों पर बैठे लोग समर्पित कर्मचारी या समर्पित मजदूर का यहां तक कि समर्पित बॉस नहीं हो सकते। समर्पण का अर्थ छोड़ना नहीं है। इसका अर्थ है सभी संभावनाओं एवं स्रोतों का प्रयोग अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए करना। समर्पण का अर्थ यह नहीं है कि आप सबकुछ खुद करें, बल्कि यह काम किसी और से भी करवा सकते हैं। किसी खास क्षेत्र का विशेषज्ञ उस काम को आम आदमी या अन्य कर्मचारी से अच्छा करता है।

हमें अपनी मंजिल पाने के लिए साहसिक होना चाहिए। हमें सर्वप्रथम किसी धंधे की क्षमता एवं मुकाबला जो काम करने से मिलेगा जांच लेना चाहिए। साहस को बुद्धिमानी से मिलाने से निश्चित रूप से श्रेष्ठ परिणाम सामने आएगा।

साहस खुद मौकों को जन्म देता है, यद्यपि यह कभी-कभी निर्भीक भी दिखता है। यह खुद की पूर्णता एवं सफलता का पाठ पढ़ाता है। डरों के बदले में हमें वह जरूर करना चाहिए जो हमें करना है। अपने जीवन एवं परिस्थितियों को सुधारने का और कोई रास्ता नहीं है। जब हम मुश्किल घड़ी में होते हैं एवं ऐसा महसूस होता है कि अब इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। तब साहसी एवं आत्मविश्वास भरा कदम उठाने का समय होता है। यही वजह है कि कभी-कभी हम जितना उम्मीद करते हैं, उससे भी ज्यादा बार ऐसे तरीके से भयावह स्थितियों से बाहर आ जाते हैं।

(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि., नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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