मध्यप्रदेश में शिवराज के लिए 'किसान' बने चुनौती
भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों एक ऐसी चुनौती से जूझ रहे हैं, जो उनकी 'किसान पुत्र' वाली छवि को बट्टा लगा सकती है। इसे उनके पांच साल के शासन काल की दूसरी बड़ी चुनौती माना जा रहा है। पहली चुनौती तो राजनीतिक थी जिसमें उन्होंने उमा भारती को शिकस्त देकर पार्टी के कई धड़ों में फैली गुटबाजी पर फतह पा ली, मगर अब किसानों की आत्महत्या का मामला उनके लिए बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन कर उभरी है।
चौहान के पिछले पांच साल के कार्यकाल पर नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफ हो जाती है कि जब भी किसी ने उन्हें चुनौती देने की कोशिश की है तो उसे शिकस्त ही झेलनी पड़ी है, चाहे वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कितना ही प्रभावशाली नेता या सरकार में मंत्री ही क्यों न रहा हो। यही कारण है कि प्रदेश में अब कोई मंत्री या पार्टी नेता उन्हें सीधे चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं।
चौहान की छवि प्रदेश में किसान पुत्र की है और इसीलिए वह भाजपा के जननेताओं की श्रेणी में शुमार हो गए हैं। शिवराज पिछले पांच सालों में खुद से लेकर पूरी सरकार को किसान का हितैषी बताने में पीछे नहीं रहे हैं। किसानों के लिए तरह-तरह की घोषणाएं करना और योजनाओं से लुभाना उनके कार्यकाल का अहम हिस्सा रहा है। वह किसान को अन्नदाता मानते हैं, लेकिन अब वही अन्नदाता किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाकर उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आए हैं।
पिछले दिनों शीत लहर के साथ पड़े पाले ने फसल को बर्बाद कर दिया है। सरकार की आकलन रिपोर्ट ही बताती है कि 50 में से 30 जिलों में फसल 20 से 80 फीसदी तक चौपट हुई है। इसी के चलते आठ किसान आत्महत्या कर चुके हैं और पांच ने आत्महत्या की कोशिश की है। मरने वाले किसानों में से दो मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर के हैं। सरकार इन आत्महत्याओं की वजह कर्ज व फसल की बर्बादी नहीं मानती है।
मुख्यमंत्री ने किसानों का दर्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को न केवल सुनाया है, बल्कि प्रदेश में लगभग 5000 करोड़ की फसल चौपट होने का हवाला देकर मदद की दरकार की है। अभी केंद्र सरकार की ओर से मदद की कोई हरी झंडी नहीं मिली है, उसके बावजूद चौहान ने दिल्ली से लौटते ही गांवों के भ्रमण का अभियान छेड़ दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने किसानों के लिए 500 करोड़ के विशेष प्रबंध के साथ किसानों का लगान माफ तथा कर्ज वसूली स्थगित करने का भरोसा दिलाया है।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसानों की आत्महत्या पर सरकार के कई मंत्री ही ऐसे बयान देने में लगे हैं, जो किसानों के साथ आम लोगों में असंतोष पनपा रहा है। यह स्थिति मुख्यमंत्री के लिए और मुसीबतें पैदा कर रही है।
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर इसे शिवराज की प्रशासनिक चूक मानते हैं। वह कहते हैं, "उमा के बाद गुटों को एकजुट करने की उनके सामने बड़ी चुनौती थी और इसमें वह सफल भी हुए। अपने नेतृत्व में पार्टी की सत्ता में वापसी कराकर उन्होंने अपनी छवि जननेता के तौर पर विकसित की, लेकिन प्रशासनिक मामले में वह चूक गए।"
उन्होंने कहा, "किसानों की आत्महत्या का मामला, जननेता की चूक नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक चूक है। इसी चूक के चलते आज यह समस्या उनके लिए इतनी बड़ी चुनौती बन गई है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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