विदेशी प्रत्यक्ष निवेश अथवा विदेश आश्रित मानसिकता
नई दिल्ली, 16 जनवरी (आईएएनएस)। वित्त मंत्री चाहे कांग्रेस का रहा हो या भाजपा का, हर वित्त मंत्री ने एक सुर में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट - एफ.डी.आई.) का समर्थन किया है। शुरू-शुरू में मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम जैसे कुछ वित्त मंत्रियों के अनुसार, 'बात यह नहीं थी कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश जरूरी है, बल्कि यह थी कि इसके बिना हम नष्ट नहीं हो जाएंगे।' इस कथन ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) को भारत का मूल्यांकन करने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक प्रतिष्ठा का प्रतीक या कहें कि उसकी कसौटी बना दिया।
आर्थिक विषयों के टीकाकार चीन को प्राप्त एफ.डी.आई. और भारत को प्राप्त एफ.डी.आई. की तुलना किया करते थे, ताकि वे भारत को एक निकृष्ट अर्थव्यवस्था अर्थात् एक निम्नस्तरीय देश के रूप में बदनाम कर सकें। मनोवैज्ञानिक तौर पर इसने देश के विश्वास को कमजोर कर दिया।
बम पोखरण में नहीं बल्कि नॉर्थ ब्लॉक में
एक उच्च स्तरीय अधिकारी भारतीय व्यापारियों को यहां तक सलाह दिया करता था कि वे अपनी कंपनियां विदेशियों को बेच दें। उसके कहने का मतलब था कि उत्पादन कंपनियां चलाना विदेशियों को ही जाता है, हमारे अंदर वह योग्यता नहीं है।
विदेशी सलाहकारों ने टाटा-परिवार को टिस्को और टाटा मोटर्स का स्वामित्व त्याग देने अर्थात् दोनों कंपनियां विदेशियों को बेच देने और टाट कंसलटेंसी सर्विसेज पर ही ध्यान देने की सलाह दे डाली। इस प्रकार राष्ट्रीय विश्वास को ठेस पहुंचाई गई, जैसे कि कोई षड्यंत्र चल रहा हो।
वास्तव में इस स्थिति ने ही विदेश आश्रित मानसिकता बना दी। इस तरह विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की खोज एक आर्थिक साधन बनने के बजाय राष्ट्रीय विश्वास को नष्ट करने का माध्यम बन गई।
इस राष्ट्रीय पराजयवाद को उलटने का काम एक घटना, एक गैर-आर्थिक या कहें कि अर्थव्यवस्था विरोधी घटना ने किया, वह घटना थी - पोखरण बम-विस्फोट। यहां तक कि पोखरण के इतिहास रचयिता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस प्रभाव की पूर्व-कल्पना नहीं की होगी। बम के धमाके ने भारतीय सभ्यता को पुनर्जीवित कर दिया, जो शताब्दियों से 'सघन देखभाल कक्ष' (आई.सी.यू.) में पड़ी हुई थी। इस विस्फोट से पश्चिम, विशेषतर अमेरिका स्तब्ध रह गया।
पश्चिमी देश भले का नहीं, बल्कि बलशाली का सम्मान करते हैं। यहीं कारण है कि वे रक्तरंजित चीन का आदर करते हैं। भारत में पोखरण बम का विस्फोट असल में तो राजस्थान में हुआ, लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से इसका असर वित्त मंत्रालय पर पड़ा, जिसके पदाधिकारी आतंकित हो गए, उनमें तहलका मच गया।
लेकिन शीघ्र ही राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा होने लगा। विदेशी मुद्रा की स्थिति को मजबूत सहारा देने के लिए जारी किए गए भारत विकास बंधपत्रों (इंडिया डेवलपमेंट बॉण्ड) में अनिवासी भारतीयों ने आशातीत निवेश करके उन्हें ओवर सब्सक्राइब कर दिया। पोखरण ने उन्हें भारत के साथ अपना संबंध बताने की लज्जा को दूर कर दिया, पोखरण की घटना होने तक भारत उनके लिए एक विफल सभ्यता का प्रतीक बना हुआ था।
कोई अर्थवेता नहीं, बल्कि एक विज्ञापन विशेषज्ञ पोखरण के प्रभाव को महसूस कर सका। उसका कहना था कि जो अनिवासी भारतीय भारत को गाली दिया करते थे, पोखरण-विस्फोट के बाद उन्होंने भारत की प्रशंसा में गीत गाना शुरू कर दिया।
उसके बाद से राष्ट्रीय आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढ़ने लगा। तब तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह को उस समय अमेरिका के उप विदेश मंत्री स्ट्रोब टालबेट से अपेक्षित सम्मान मिला। बढ़ती हुई राष्ट्रीय भावना विज्ञान और व्यापार में भी झलकने लगा।
टाटा ने विश्व भर की सलाह के विरुद्ध जाकर पहली भारतीय कार का निर्माण किया - पहले इंडिका बनाई, फिर इंडिगो। महिंद्रा बंधुओं ने पहली भारतीय विशेष उपयोगी गाड़ी (एस.यू.वी.) बनाई - पहले बोलेरो, फिर स्कॉर्पियो। टी.वी.एस. ने पहली भारतीय मोटरसाइकिल 'विक्टर' बनाई और अपने संयुक्त उद्यम साझेदार की छुट्टी कर दी। टिस्को ने न्यूनतम लागत इस्पात उत्पादक के रूप में विश्व भर में अपनी पहचान बनाई। सफलताओं का यह सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो चलता ही गया।
मुरासोली मारन ने विश्व व्यापार संगठन को भारत की बात सुनने के लिए बाध्य कर दिया। देश के अंदर ही छोटे-छोटे स्थानीय ब्रांडों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विश्वव्यापी ब्रांडों को चुनौती देना शुरू कर दिया और उन पर सफलता पाई। भारत की एक नई तस्वीर उभरने लगी।
आश्चर्य की बात है कि यह सब बहुत अधिक एफ.डी.आई. के बिना ही हुआ, पहले से और कम एफ.डी.आई. के साथ। इस नए घटनाक्रम ने भारत और बाहर के देशों में वित्त मंत्रियों और अर्थशास्त्रियों को पूरी तरह चकरा दिया।
वास्तव में पश्चिमी आर्थिक विशेषज्ञों को भारत में अच्छे गुण नजर आने लगे; क्योंकि चीन की तुलना में भारत में 'विदेशी प्रत्यक्ष निवेश' कम हुआ था। उन्होंने कहा, 'भारत को इसकी जरूरत नहीं है', लेकिन चीन को थी। क्यों? उनका कहना था, भारत के पास उद्यमी हैं। चीन के पास नहीं हैं, क्योंकि वह उनको पहले ही समाप्त कर चुका है। इसलिए चीन को एफ.डी.आई. आयात के जरिए उन्हें आयात करना पड़ा। इस तरह एफ.डी.आई. की अधिकता नहीं, बल्कि उसकी कमी एक सद्गुण बन गई।
भारत के लिए खेद प्रकट करने वालों द्वारा बड़े परिश्रम से बनाई गई विदेश आश्रित मानसिकता अतीत की बात हो गई, तथापि एफ.डी.आई. के लिए वह अविवेकी खोज, जो उस समय शुरू हुई थी, जब हमारे पास तीन सप्ताह की पूर्ति के लिए विदेशी मुद्रा भंडार शेष था, अभी तक जारी है। जबकि इस समय हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 120 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, और कभी-कभी हम सोचते हैं कि इस बढ़ती जा रही निधि का हम क्या करेंगे! इसके बावजूद इस बजट में भी, एफ.डी.आई. पर याचनापूर्वक जोर दिया गया है।
वित्तमंत्री कहते हैं कि मूलभूत ढांचे के लिए एफ.डी.आई. की जरूरत है। इस कारण से तीन क्षेत्रों में एफ.डी.आई. सीमा बढ़ाने जाने की अपेक्षा है - दूरसंचार के क्षेत्र में बढ़ाकर 74 प्रतिशत और बीमा तथा नागर विमानन में 49 प्रतिशत की जानी है। इन सभी क्षेत्रों में सरकार की प्रमुख भूमिका है, दूरसंचार में भारत संचार निगम लि. (बी.एस.एन.एल.) और महानगर टेलीफोन निगम लि. (एम.टी.एन.एल.), बीमा क्षेत्र में एल.आई.सी. और जी.आई.सी. समूह तथा नागर विमानन में एअर इंडिया व इंडियन एयरलाइंस।
सार्वजनिक क्षेत्र में इन उपक्रमों में एक भी सरकारी शेयर विदेशियों को नहीं बेचा जाएगा। ऐसे में निजी क्षेत्र की कंपनियां ही रह जाती हैं, जो अपने शेयर बेचेंगी। अत: यह नीति निजी स्वामित्ववाली कपंनियों के लिए ही बनाई गई है। उनमें से अधिकतर कंपनियां इसके लिए पुरजोर कोशिश करती रही हैं।
सारी दिल्ली उन्हें जानती है। लेकिन उन्होंने जनसंचार माध्यम (मीडिया) को यकीन दिला दिया कि वे एफ.डी.आई. के समर्थन में अपने प्रभाव का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे लोग प्रभाव डाल रहे हैं जो उन्हें रोकने का प्रयास कर रहे हैं और यह तक मीडिया के गले उतर गया। तब वित्त मंत्री इन गुटों, यानी प्रभाव का इस्तेमाल करने वालों के आगे यह कहते हुए झुक गए है कि सुरुचिपूर्ण भाषा और ऊंचे तत्वज्ञान की आड़ लेकर कि देश को आधार-तंत्र के क्षेत्र में एफ.डी.आई. (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) की आवश्यकता है।
(प्रभात प्रकाशन प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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