कश्मीर में 25 फीसदी सैन्य कटौती की घोषणा, सेना का इंकार

नई दिल्ली। केंद्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लै ने शुक्रवार को घोषणा की कि केंद्र सरकार अगले 12 महीनों में जम्मू एवं कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में 25 फीसदी तक की कमी कर सकती है। सेना प्रमुख ने हालांकि सैन्य संख्या में किसी तरह की कटौती से इंकार किया।

जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पिल्लै के बयान का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इससे स्थिति में सुधार होगा। नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय द्वारा "व्हाट इज द वे फारवर्ड इन जम्मू एंड कश्मीर' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में पिल्लै ने कहा, "अगले 12 महीनों के दौरान जम्मू एवं कश्मीर में सुरक्षाबलों की संख्या में 25 फीसदी कटौती की जाएगी, खासतौर से घनी आबादी वाले इलाकों में।"

उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया जाएगा, ताकि अधिक सुरक्षा बलों की मौजूदगी से लोग परेशान न हों। उनके इस बयान पर सेना ने तुरंत अपनी असंतुष्टि जाहिर की। थलसेना प्रमुख ने कहा, "केंद्रीय गृह मंत्रालय किस परिस्थिति में सुरक्षा बलों की संख्या में कटौती की बात कही जा रही है, यह मेरी समझ से परे है। मैं इस पर कोई टिप्पणी करना नहीं चाहता। भविष्य में यदि सरकार अर्धसैनिक या पुलिस बल की संख्या में कटौती चाहता हो तो इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता।" उन्होंने कहा कि जहां तक सशस्त्र बलों की संख्या का सवाल है, उनकी मौजूदगी कम करने की जरूरत नहीं है।

सिंह ने वार्षिक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हमने सीमा और नियंत्रण रेखा पर आवश्यकता का विश्लेषण करने के बाद सैनिकों की तैनाती की है। इसी तरह भीतरी इलाकों में शांति बहाली तथा आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाने के लिए सैनिकों को तैनात किया गया है। इस वक्त हम महसूस नहीं करते कि जवानों की संख्या में कटौती करनी चाहिए।"

पिल्लै के अनुसार सरकार जवानों की संख्या में कमी करना चाहती है। राज्य के विभिन्न संगठनों और अलगाववादी राजनीतिक पार्टियों की यही प्रमुख मांग भी है, लेकिन विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इसका विरोध कर रही है।

गौरतलब है कि सुरक्षा बलों की संख्या में कटौती का प्रस्ताव तब दिया गया था, जब जून, 2010 से शुरू गर्मियों के 100 दिनों के भीतर तनाव बढ़ गया था और 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इसके बाद समस्या के राजनीतिक समाधान का आधिकारिक वादा किया गया था।

केंद्रीय गृह सचिव ने कहा कि अगले कुछ महीनों के भीतर श्रीनगर से कुछ सुरक्षा चौकियों को भी हटाया जाएगा। उन्होंने कहा कि घनी आबादी वाले इलाकों से सुरक्षाबलों को हटाना उस आठ सूत्री एजेंडे का हिस्सा है, जिसे कश्मीरियों का विश्वास जीतने के लिए पिछले साल सरकार ने मंजूरी दी थी। पिल्लै ने आईएएनएस से कहा, "हम राज्य में सुरक्षाबलों की मौजूदगी जितना संभव हो सके उतना कम करना चाहते हैं।"

पिल्लै ने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन को विवादास्पद सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां कानून (एएफएसपीए) को हटाने के बारे में फैसला करना चाहिए। यह कानून आतंकवाद निरोधक कार्रवाई के दौरान सेना को विशेष अधिकार प्रदान करता है। पिल्लै ने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर के पुलिस अधिकारी और सैन्य कमांडर जल्दी ही अस्थिर क्षेत्र कानून (डीएए) पर विचार करने के लिए एक बैठक करेंगे। यह कानून राज्य में आतंकवादी गतिविधि शुरू होने के बाद 1990 में लागू किया गया था।

माना जा रहा है कि गृह मंत्रालय उन क्षेत्रों में यह विशेषाधिकार समाप्त करना चाहता है, जहां हालत में काफी सुधार हुआ है। उधर, रक्षा मंत्रालय इसलिए इसे लागू रखने के पक्ष में है। पिल्लै ने कहा कि केंद्र सरकार वार्ताकारों की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। वार्ताकारों ने लगभग 100 समूहों से बातचीत की है। उन्होंने 60 वर्ष पुराने इस मुद्दे का राजनीतिक समाधान तलाशने के लिए उन लोगों से भी बात की है। अंतिम रिपोर्ट इस वर्ष अप्रैल में आने की संभावना है।

पिल्लै ने कहा कि लगभग 18,00 से 2,500 कश्मीरी युवा जो कि पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं, आत्मसमर्पण के लिए तैयार हैं। जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को राज्य में तैनात सुरक्षा बलों की संख्या में 25 फीसदी कटौती करने के केंद्र सरकार की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि इससे हालात को सुधारने में मदद मिलेगी।

एक निजी टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में अब्दुल्ला ने कहा, "कटौती रातोंरात नहीं होने जा रहा है..धीरे-धीरे संख्या में कमी लाई लाएगी।" उन्होंने कहा, "यदि हम प्रक्रिया पर दृढ़ रहें तो हम जरूर आगे बढ़ेंगे।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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