विदेशी मुद्रा व्युत्पत्ति और जोखिम का हस्तांतरण
नई दिल्ली, 11 जनवरी (आईएएनएस)। कल्पना कीजिए कि व्युत्पत्ति उत्पादों का एक विशेषज्ञ एक अशिक्षित आम-उत्पादक को बिन-मांगी सलाह देता है कि वह आमों की अगाऊ बिक्री न करें, बल्कि आमों के व्युत्पत्ति उत्पाद और खरीद ले। कितनी आपराधिक होगी यह सलाह? निटवियन निर्यात के जरिए अमेरिकी डॉलर हासिल करने वाले तिरुपुर के भूतपूर्व किसानों को और अधिक डॉलर खरीदने की सलाह देना आम-उत्पादकों को दी गई ऐसी सलाह से कतई भिन्न नहीं थी।
तिरुपुर के अधिकतर मामलों में व्युत्पत्ति उत्पादों की मात्रा निर्यातक के वास्तविक निर्यात आवर्त अथवा कुल बिक्री से कई गुना अधिक है, जबकि कानून के अनुसार व्युत्पत्ति उत्पादों के लिए अधिकतम सीमा कुल बिक्री का अंश मात्र है। उदाहरणस्वरूप, जिस निटवियर निर्माता के बारे में चर्चा चल रही है, पिछले तीन वर्षो में उसके निर्यात का औसत 8 मिलियन डॉलर था, जो व्युत्पत्ति की अधिकतम सीमा है। जबकि इस सीमा के विरुद्ध, बैंकों ने 62.5 मिलियन डॉलर, यानी निर्धारित सीमा से करीब आठ गुना ज्यादा मात्रा का ठेका दिया था।
एक चेतावनी! यह सीमा केवल हानियों के विरुद्ध सुरक्षा पर लागू होती है, 62.5 मिलियन डॉलर की खरीद करने पर नहीं, क्योंकि वह कोई सुरक्षा नहीं है, बल्कि डॉलर पर लगाई गई एक बाजी है, एक दांव है। इसके अलावा, कानून इस बात पर भी बल देता है कि 8 मिलियन डॉलर की निर्धारित सीमा तक के ठेकों में से तीन-चौथाई को रद्द नहीं किया जा सकता तथा उनका सुपुर्दगी योग्य होना जरूरी है। फिर भी तीनों बैंकों द्वारा वे सौदे रद्द किए जाने, सुपुर्दगी बिना ही निपटाए जाने के इरादे से किए गए थे।
न पूरे होने वाले वायदे
बेचे गए सौदों के अंतर्गत बैंकों ने निर्यातकों से विशिष्ट मुद्राओं की खरीद का ठेका किया था, वे मुद्राएं जो उन्होंने बिल में नहीं लिखी थी और उस कारण से उनको भुगतान नहीं मिलना था।
तात्कालिक मामले में तीन बैंकों ने 6.75 मिलियन यूरो, 27.75 मिलियन पौंड, 167.12 मिलियन जापानी येन, 1.1 मिलियन स्विस फ्रैंक उस निर्यातक से खरीदने का ठेका किया था, जब उसे इनकी प्राप्ति होगी या उसके पास बेचने के लिए कोई यूरो, कोई जी.बी.पी., कोई जापानी येन और कोई स्विस फ्रैंक नहीं होगा, क्योंकि उसने अपने निर्यात बिल अमेरिकी डॉलर में बनाए थे, उन मुद्राओं में नहीं। फिर वह निर्यातक बैंकों को देने के लिए यूरो, जी.बी.पी. (पौंड) या स्विस फ्रैंक कहां से लाएगा?
बैंकों को शुरू में ही पता था कि उन्हें सुपुर्दगी नहीं देनी है, इसी कारण से उन्होंने गैर-सुपुर्दगीवाले वायदों की बिक्री की है, जबकि कानून में जिसकी अनुमति नहीं है। अकेले तिरुपुर में ही इस तरह के बड़े-छोटे सैकड़ों मामले हैं। पांचवां, कानून के अंतर्गत वही बैंक जिसके साथ कोई लघु एवं माध्यम उद्योग जुड़ा होता है, उसको व्युत्पत्ति उत्पादों की बिक्री नियमित रूप से कर सकता है। और वह भी उस स्थिति में, जब भरपूर जांच करने के बाद बैंक इस बात से संतुष्ट हो कि अमुक उत्पाद ग्राहक के लिए उचित है।
इसके अलावा विश्वभर में स्वीकार किए गए मानदंडों के अनुसार बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे बड़े या छोटे, सभी तरह के ग्राहकों को उन्हीं व्युत्पत्ति उत्पादों का प्रस्ताव करें, जो उनके लिए उचित एवं पुयक्त हों। तिरुपुर निर्यातक लघु और मध्यम दर्ज के हैं। फिर अधिकतर मामलों में व्युत्पत्ति उत्पाद विक्रेता संबंधित निर्यातकों के नियमित बैंकर नहीं थे और निर्यातक को बेचे जानेवाले उत्पाद की उपयुक्तता आंकने के लिए कोई श्रमसाध्य प्रयोग भी नहीं किया गया था।
ऐसा नहीं है कि इन गूढ़ व्युत्पत्ति उत्पादों की तलाश में तिरुपुर निर्यातक बैंकों के पास गए थे, बल्कि जो हुआ, इससे बिल्कुल उलट था, क्योंकि स्वयं बैंकर ऐसे अनभिज्ञ असावधान निर्यातकों के पीछे लगे हुए थे, उनकी खोज में थे, ताकि वे इन उत्पादों को उन्हें बेच सकें।
जोखिम का हस्तांतरण?
जिन अलग-अलग बैंकों ने अपने व्युत्पत्ति इन ग्राहकों को बेचे थे, उन्होंने संबंधित ग्राहकों द्वारा लिए गए उत्पादों की स्थिति के बारे में दूसरे बैंकों से नितांत आवश्यक पूछताछ या जांच-पड़ताल भी नहीं की।
अन्य बैंकों के साथ निर्यातकों के व्युत्पत्ति उत्पादों की स्थिति के प्रति आंखें मूंदकर व्युत्पत्ति उत्पादों के जोशीले सौदागरों ने निर्यातकों को अपना माल-बैंक द्वारा इ-मेल के जरिए भेजे गए फार्मो या प्रपत्रों पर सिर्फ इस वचन के तहत बेच दिया कि अन्य बैंक के साथ उन्होंन व्युत्पत्ति उत्पादों का कोई सौदा नहीं किया है। स्पष्टत: यह एक झूठा बयान था, जिसे बैंक अपने रिकॉर्ड में रखने के लिए लेना चाहते थे, ताकि वे अपने सौदों संबंधी योजनाओं को बेच सकें।
कुछ मामलों में बैंक इससे भी आगे चले गए लगते हैं। उन्होंने निर्यातकों के लिए सौदे भी कर डाले और निर्यातकों को भनक तक नहीं लगने दी। इन सौदों को नियमित करने के लिए बाद में उन्होंने उन हस्ताक्षरित पत्रों का इस्तेमाल किया जो उनके कब्जे में थे।
अत: इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता है कि जो निर्यातक ऐसी सौदेबाजी के लिए कभी पूरी तरह तैयार नहीं थे या उसकी समझ नहीं रखते थे, उनको जाल में फांसने के लिए बड़ी बेरहमी और सोची-समझी साजिश के तहत कानून को तोड़ा-मरोड़ा गया। लेकिन क्यों? क्या सिर्फ एक शुल्क के लिए? ऐसा नहीं हो सकता। इसके पीछे अवश्य ही कोई बड़ा कारण या प्रयोजन रहा होगा।
जोखिमों का थोक के भाव मूल सौदागर के तौर पर करार करने के बाद क्या बैंकों ने बिना सोचे-विचारे अपना जोखिम बाजार-निर्माताओं के रूप में आरक्षित निर्यातकों को आगे बेच दिया? परदे के पीछे बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं देता। क्या भारतीय रिजर्व बैंक जागेगा, जांच कराएगा और सच्चाई को सामने लाएगा?
(प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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