विदेशी मुद्रा व्युत्पत्ति क्या है?
एस. गुरुमूर्ति
नई दिल्ली, 9 जनवरी (आईएएनएस)। विदेशी मुद्रा व्युत्पत्ति क्या है? कम जटिल शब्दों में कहा जाए तो तमिलनाडु के तिरुपुर में बिक्री के लिए प्रस्तुत विदेशी मुद्रा व्युत्पत्ति किसी भी अन्य बाजी की तरह एक बाजी या दांव ही है। यहां बाजी यह लगाई जाती है कि क्या यूरो या येन या स्विस फ्रैंक या फ्रेंच फ्रैंक एक-दूसरे के मुकाबले या डॉलर के मुकाबले चढ़ेंगे या गिरेंगे और इस घट-बढ़ में कितना अंतर होगा।
यदि बाजी सही पड़ती है तो निर्यातकों को लाभ होगा, यदि गलत हुई तो वे बाजी हार जाएंगे। अच्छे-से-अच्छे वित्त विशेषज्ञ भी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि कौन बाजी जीतेगा, कौन हारेगा।
व्युत्पत्ति के बारे में जानकारी देने के लिए बनाई गई वेबसाइट डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट फाइन पाइप डॉट कॉम का कहना है, "राजनीतिज्ञों, वरिष्ठ अधिकारियों, विनियामकों और यहां तक कि निवेश पोर्टफोलियो प्रबंधकों को भी इन जटिल उत्पादों की सीमित जानकारी होती है।"
बुफे-कथन
तिरुपुर या लुधियाना में तो नहीं, लेकिन पश्चिम में अवश्य ही व्युत्पत्ति उत्पादों का व्यापार कलों की तरह किया जाता है। फिर भी विश्व के सबसे धनी एवं अत्यंत कुशल वित्त विशेषज्ञ वारेन बुफे के विचार में डेरिवेटिव्स महाविनाश के वित्तीय हथियार हैं।
वारेन बुफे कहते हैं कि कुछ व्युत्पत्ति उत्पादों की योजना कुछ 'पागलों की बनाई लगती है। यदि बुफे की इन उत्पादों से डर लगता है और वह इन्हें पागलों के दिमाग की उपज मानते हैं तो जाहिर है कि तिरुपुर के उन निर्यातकों, भूतपूर्व-कृषकों को इनके बारे में कितनी जानकारी होगी, जिनमें से दो-तिहाई दसवीं तक या उससे भी कम पढ़े-लिखे थे।'
जैसे ही बैंकों ने ये जटिल मुद्रा व्युत्पत्ति उत्पाद - जिन्हें वारेन बुफे महाविनाशी अस्त्रों के रूप में देखते हैं - आर्मस्ट्रांग पलनीसामियों को बेचे, वे जानते थे कि उनके नए उत्पादों से अनभिज्ञ खरीदारों को नए, लुभावने खिलौनों के साथ खेलने के परिणामों का ज्ञान नहीं है। बैंकों द्वारा दिए गए लुभावने एवं प्रलोभनकारी आश्वासनों ने भेड़ों की मानिंद मानसिकतावाले तिरुपुर निर्यातकों को लाखों-करोड़ों डॉलर के मोहक व्युत्पत्ति उत्पादों की खरीद के लिए सामूहिक रूप से हस्ताक्षर करने के लिए राजी कर लिया, जिसके बारे में उन्हें बताया गया और उन्होंने भरोसा भी कर लिया कि उनके अचानक हुए घाटे की पूर्ति हो जाएगी।
कुछ शुरुआती सौदों में तो इन उत्पाद व्यापारियों ने निर्यातकों के नाम थोड़ा-बहुत लाभ जमा कराया, जिसके कारण वे इन सौदों में और भी ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। इस प्रकार अप्रैल 2007 से व्युत्पत्ति के चालाक-चतुर व्यापारियों ने डॉलर, यूरो, पौंड, स्विस फ्रैंक, जापानी येन में लाखों-करोड़ों के मिश्रित व्युत्पत्ति उत्पाद उन निर्यातकों को बेच दिए।
बढ़ता जोखिम
इन व्युत्पत्ति उत्पादों की योजना निर्यातकों की जोखिम-सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनके लाभ दिलाने के लिए बनाई गई थी। अत: उन्होंने निर्यातकों का जोखिम बढ़ा दिया और उन्हें डॉलर का मूल्य गिरने से होने वाली हानि के मुकाबले कई गुना ज्यादा जोखिम में डाल दिया। आर्मस्ट्रांग पलनीसामी का ही उदाहरण लें। मार्च, 2008 के आस-पास बैंकों ने उससे - आप शायद विश्वास न करें - उसे बेचे गए व्युत्पत्ति उत्पादों पर हुई हानि के रूप में 30 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करने का तकाजा करना शुरू कर दिया, जबकि शुरू में उसे आश्वस्त किया गया था कि उसे इतना लाभ अवश्य होगा कि वह डॉलर की गिरावट से हुई तीन करोड़ रुपये की हानि की पूर्ति कर सकें।
इस तरह व्युत्पत्ति ने उसकी मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया। तिरुपुर के अधिकतर निर्यातकों का वही हाल हुआ जो आर्मस्ट्रांग पलनीसामी का हुआ, फर्क इतना ही था कि किसी का अधिक नुकसान हुआ, किसी का कम। तिरुपुर को इस खाते में लगभग 600 करोड़ रुपये की हानि हुई। यह उस हानि के अतिरिक्त है जो डॉलर के मूल्य में गिरावट के कारण उन्हें हुई थी। कहानी का अगला भाग इस बारे में है कि तिरुपुर की रक्षा के लिए बनाई गई व्युत्पत्ति उत्पादों की योजना विनाशकारी कैसे हो गई?
बैंकों का सम्मोहन
तिरुपुर के पलनीसामियों को बैंकों द्वारा बेचे गए व्युत्पत्ति उत्पादों को विदेशी मुद्रा व्यापार में 'एग्जॉटिक' कहा जाता है। अंग्रेजी के उस शब्द का मतलब होता है 'विचित्र परंतु आकर्षक, सम्मोहक'। इस शब्द का प्रयोग एक विशेषण के रूप में भी किया जाता है, जैसे नाभि-उघाड़कर नृत्य करने वालों के संदर्भ में 'सम्मोहक नर्तक' आदि। सोचने की बात है कि डिराइवेटिव्ज के पहले 'एग्जाटिक' जैसे विशेषण का प्रयोग करके बैंकों ने तिरुपुर के निर्यातकों को क्या उतनी ही मार्मिकता से सम्मोहित नहीं किया होगा, जैसे नग्न-नृत्य और नाभि-नृत्य के नाम पर किशोरों को आकृष्ट किया जाता है?
विदेशी मुद्रा व्युत्पत्ति के बारे में यहां कुछ संकेत दिए जा रहे हैं, जिनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि तिरुपुर निर्यातकों को किस तरह इस जाल में फंसाया गया होगा। व्युत्पत्ति एक सुरक्षा है किसी जोखिम के विरुद्ध; वह सुरक्षा 'विदेशी मुद्रा दर से लाभ दिलाने के बजाय उसमें किसी घट-बढ़ के विरुद्ध रक्षा प्रदान करती है।'
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में मुद्रा संबंधी कानून हानि से बचने के लिए तो बाड़ लगाने यानी सुरक्षा-कवच की इजाजत देते हैं, लेकिन उससे लाभ कमाने की नहीं। वे कहते हैं कि लाभ देने वाले व्युत्पत्ति उत्पादों की योजना अवैध है। कानून की इस दृष्टि में तिरुपुर व्युत्पत्ति उत्पादों का स्थान कहां है? विदेशी मुद्रा वायदा ठेकों से आरंभ करते हैं, क्योंकि सुरक्षा कवच के रूप में इनकी निस्संदेह मंजूरी है। ऐसे ठेकों की प्रक्रिया इस प्रकार है :
यदि तिरुपुर का कोई निटवियर निर्माता 41 रुपये प्रति डॉलर के निश्चित मूल्य पर निर्यात करने का वचन देता है, तो वह 41 रुपये प्रति डॉलर के हिसाब से अपनी निर्यात आय की वायदा-बिक्री कर सकता है, ताकि बाद में डॉलर का मूल्य गिरकर यदि 39 रुपये रह जाता है, तब भी निर्यातक को 41 रुपये प्रति डॉलर के हिसाब से ही भुगतान मिले। विदेशी मुद्रा व्यापार में इसे 'वनीला' या 'सपाट वायदा' कहा जाता है, जो विदेशी मुद्रा में गिरावट के जोखिम से बचाव करता है।
बैंकों द्वारा तिरुपुर निर्यातकों के साथ किए गए सौदे उतने सरल नहीं थे। तिरुपुर व्युत्पत्ति उत्पादों के संक्षिप्त सर्वेक्षण से पता चलता है कि वे जटिल, सम्मोहक व्युत्पत्ति उत्पाद थे या देखने में ही सरल लगते थे, लेकिन उनकी कानूनी मंजूरी नहीं थी। पहले जटिल आकर्षक व्युत्पत्ति उत्पाद उन नासमझ निर्यातकों को बेचे गए, जिनमें से अधिकतर दसवीं तक ही पढ़े थे या जिन्होंने स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। यह काम वास्तव मं धोखे में रखने जैसा था, क्योंकि वित्तीय विषयों की गहरी पैठ रखनेवाले विशेषज्ञ भी ऐसे मकड़जाल को पूरी तरह नहीं समझ सकते।
भ्रामक प्रलाप
सन् 2007 की दूसरी और तिसरी तिमाही में तिरुपुर की गलियों और बाजारों में बेचे गए जटिल व्युत्पत्ति उत्पादों का एक उदाहरण देखें। सावधान! अगली पंक्तियां पढ़कर आपका दिमाग चक्कर खाने लगेगा।
मिसाल के तौर पर, 3 जुलाई, 2007 का व्युत्पत्ति उत्पादों का एक सौदा (जिसमें 'टोक्यो कट', 'यूरोपियन स्टाइल ऑप्शन' और 'अमेरिकन बैरियर्स' जैसी विशेषताएं हैं), जो 23 मई, 2008 को समाप्त होना था, कुछ ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है - 'निर्यातक बिकवाली (और बैंक की खरीद) यू.एस.डी. कॉल/सी.एच.एफ. पुट एट स्ट्राइक 1.2300 फॉर यू.एस.डी. 4 मिलियन विद नॉक आउट एट1.24000; निर्यातक बिकवाली (और बैंक खरीद) यू.एस.डी. पुट/सी.एच.एफ. कॉल एट स्ट्राइक 1.2300 फॉर यू.एस.डी. 8 मिलियन विद् नॉक आउट एट1.24, नॉक इन एट1.12; डबल वन टच ऑप्शन विद् ट्रिगर 1.2270 एंड 1.2330 विद् पे ऑफ यू.एस.डी. 50,000 परिपक्व ता पर।'
यूरोपियन स्टाइल? अमेरिकन बैरियर्स? टोक्यो कट? डबल वन-टच ऑप्शन? नॉक इन? नॉक आउट्?
तिरुपुर में स्कूल की पढ़ाई छोड़कर निर्यातक बने लोगों की समझ में कैसे आती यह विचित्र शब्दावली? इन शब्दों का मतलब, जो बड़े-बड़े दिग्गज भी आसानी से नहीं समझ सकते, इस प्रकार है, (क) यदि व्युत्पत्ति उत्पाद की एक अवधि के दौरान स्विस फ्रैंक (सी.एच.एफ.) डॉलर के बदले 1.2270 या 1.2330 फ्रैंक में बिकता है, तो निर्यातक को 50,000 डॉलर (तब के 22.50 लाख रुपए के बराबर) मिलेंगे; (ख) यदि स्विस फ्रैंक का मूल्य डॉलर की तुलना में 1.12 से नीचे रहता है, तो निर्यातक को 1.23 फ्रैंक प्रति डॉलर की दर पर 8 मिलियन डॉलर खरीदने होंगे, और इस लेन-देन में उसे 880,000 डॉलर या 4 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।
यदि डॉलर का मूल्य 1.12 स्विस फ्रैंक से नीचे चला जाता है तो यह नुकसान और भी बढ़ जाएगा, और हुआ भी ऐसा ही।
मई, 2008 में डॉलर की कीमत घटकर 1.05 स्विस फ्रैंक तक पहुंच गई। उक्त सौदे के अंतर्गत डॉलर के विरुद्ध स्विस फ्रैंक में प्रत्येक सेंट की चढ़त के साथ तिरुपुर निर्यातक को 36.37 लाख रुपए का घाटा होना था। स्विस फ्रैंक में 18 सेंट की वृद्धि हुई है और उसके फलस्वरूप निर्यातक के खाते में 6.57 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज हुआ। निर्यातक को इस बात से जोश आया था कि इस सौदे में उसे 22.5 लाख रुपये का लाभ होगा।
इस तरह के लाभ अर्जित करना कानून की नजर में अवैध है, लेकिन बैंकों ने उस निर्यातक को यह गैर-कानूनी लॉलीपॉप दिखाकर ही उक्त सौदेबाजी में घसीटा। निष्कर्ष-निर्यातक का लाभ 50,000 डॉलर तक ही सीमित था, परंतु उस सौदे में निर्यातक के नुकसान की कोई सीमा नहीं थी।
जोखिम बढ़ता गया
दूसरे, बैंकों ने तिरुपुर निर्यातकों को जिन व्युत्पत्ति उत्पादों में हाथ डालने की सलाह दी, वे उनके विदेशी मुद्रा जोखिम को कई गुणा करनेवाले थे, न कि उस जोखिम को कम करनेवाले। पुन:, जिस प्रकरण का उदाहरण दिया जा रहा है, उसमें एक नहीं, बल्कि तीन बैंकों ने 2007 के दौरान तिरुपुर के उसी निर्यातक को कई तरह के मिले-जुले व्युत्पत्ति उत्पाद बेचे थे। इन बैंकों में एक विदेशी बैंक था, एक वह जो अपने को भारतीय बताता था और एक राष्ट्रीयकृत बैंक था।
उन व्युत्पत्ति-उत्पादों के अंतर्गत निर्यातक ने 62.5 मिलियन डॉलर की खुद्ध खरीद की और अन्य मुद्राओं-यूरो 6.75 मिलियन, जी.बी.पी. (पौंडा) 27.75 मिलियन, जापानी येन 167.12 मिलियन, स्विस फ्रैंक 1.10 मिलियन और रुपये 63.95 मिलियन की शुद्ध बिक्री थी। उसे वास्तव में अमेरिकी डॉलर बेचने की जरूरत थी - न कि खरीदने की; क्योंकि उसका 90 प्रतिशत निर्यात अमेरिकी डॉलर में होता था।
यहां 62.5 मिलियन डॉलर के खरीददार ने अपने जोखिम और बढ़ा लिया, उसका बचाव नहीं किया। कानून के अनुसार, बैंकों को चाहिए कि वे निर्यातक को ऐसे विकल्पों का प्रस्ताव न करें जिनसे उसका जोखिम बढ़ जाए, लेकिन बैंकों ने तिरुपुर में इस कानूनी व्यवस्था का कतई पालन नहीं किया और निर्यातक को जोखिम में डाल दिया।
(प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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