विदेशी मुद्रा सम्बंधी धोखाधड़ी
नई दिल्ली, 8 जनवरी (आईएएनएस)। 'आर्मस्ट्रांग' पलनीसामी तिरुपुर के बुने कपड़ों के विश्वव्यापी केंद्र में एक ठेठ स्वदेशी उद्यमी है। एक किसान का लड़का, जिसने स्कूल के बजाय खेत पर अधिक समय बिताया।
तिरुपुर के अन्य कई लड़कों की तरह वह भी प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स में फेल हो गया था। सन् 1960 के दशक के मध्य में उसने तिरुपुर में बुनाईवाले कपड़ों की एक यूनिट में दाखिला ले लिया। बुने कपड़ों के व्यवसाय में यह एक खुला (ओपन-एअर) एम.बी.ए. कोर्स था।
अपने बराबरवाले लोगों की तरह, जल्द ही उसने भी बुने कपड़े बनाने का अपना काम शुरू कर दिया। उस समय नील ऑर्मस्ट्रांग चांद पर उतर चुका था। अंतरिक्ष-यात्री का नाम हर किसी के होंठों पर था, तिरुपुर के लोग भी उनमें शामिल थे।
आर्मस्ट्रांग
नए उद्यमी ने अमेरिकी बाजार में जगह बनाने के लिए अपनी बनियानों और टी-शर्टों पर 'आर्मस्ट्रांग' छाप लगा दी। जल्दी ही उसका अपना नाम भी वही पड़ गया। 'आर्मस्ट्रांग पलनीसामी' आज विश्व विख्यात तिरुपुर उद्यमियों का एक उदाहरण है। दो दशाब्दियों में ही तिरुपुर में उसके जैसे बड़े और छोटे सैकड़ों उठ खड़े हुए थे। डा. शरद चारी ने अपने बड़े ही श्रमसाध्य शोध लेख 'भ्रात्रीय पूंजी : प्रादेशिक भारत में कृषक-कामगार स्वनिर्मित इंसान और उदारीकरण' (स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) में लिखा है कि तिरुपुर के अधिकतर उद्यमी किस तरह का एक ही समुदाय 'कांगू गौंडर' के हैं।
एक समूह के रूप में उनकी भारी प्रगति का वैज्ञानिक आधार यह है : संक्रामक प्रतिस्पर्धात्मक भावना, जिसने उनको समुदाय के अंदर ही दूसरों की नकल और उनके साथ स्पर्धा करने के लिए बाध्य किया। यही भावना व्यावसायिक होड़ और भ्रातृत्व सहयोग के समाज-वैज्ञानिक मिश्रण में परिवर्तित हो गई, जिसके फलस्वरूप तिरुपुर में एक जातीय उद्यम विकास का मॉडल विकसित हुआ।
सामाजिक पूंजी
तिरुपुर उद्यमी इस तरह विकसित हुए : कपास की खेती से कपास की ओटाई तक, ओटाई से कताई तक, कताई से बुनाई तक पहुंचे और अंतत: बुने वस्त्रों के निर्यातक बन गए और उनके बनाए वस्त्रों ने शीघ्र ही दुनिया भर में नाम कमा लिया।
विश्वबैंक ने अपनी विश्व विकास रिपोर्ट-2001 में गौंडर समुदाय का नाम प्रकाशित किया और एक समुदाय-तात्पर्य 'सामाजिक पूंजी' - प्राय: जिसे जाति मान लिया जाता है - की प्रशंसा करते हुए लिखा कि इस समुदाय ने अपनी ही आंतरिक क्षमताओं के बल पर बुने वस्त्र निर्माताओं के रूप में विश्वभर में ख्याति प्राप्त की है।
बैंक ने इस बात का भी पता लगाया कि गौंडरों ने किस प्रकार अपनी बचत को अंदर-ही-अंदर वितरित करने, अपेक्षित पूंजी पाने और जमा करने के लिए अपनी ही परंपरागत व्यवस्था पर भरोसा किया न कि आधुनिक बैंकों पर।
गौंडर समुदाय के लोगों ने अपने अंदर की उत्कट पारस्परिक स्पर्धा में शामिल होने और तरक्की करने का मार्ग अपनाया। उद्यमी बनने के लिए उन्हें किसी भारतीय प्रबंधन संस्थान (आई.आई.एम.) में जाना नहीं पड़ा।
शरद चारी ने बड़ी मेहनत से तैयार किए गए अपने शोधपत्र में लिखा है कि आर्मस्ट्रांग पलनीसामी जैसे निटवियर निर्माताओं में से दो-तिहाई दसवीं तक या उससे भी कम पढ़े-लिखे हैं, केवल एक-तिहाई ने कॉलेज में शिक्षा पाई और किसी ने भी व्यावसायिक अर्हता या डिग्री प्राप्त नहीं की। यह तथ्य शिक्षा और उद्यमशीलता के बीच उलटा सम्बंध बतलाता है।
निर्यात विकास
सन् 1985 में तिरुपुर से निटवियर का 15 करोड़ रुपये का निर्यात होता था, जो अब बढ़कर 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा क्षेत्र के उदारीकरण और निर्यात को सस्ता बनाने के लिए रुपये का मूल्यह्रास करने के जोश ने एक दशाब्दी में डॉलर का मूल्य बढ़ा दिया और रुपये का मूल्य करीब 450 प्रतिशत कम कर दिया। इस बदलाव ने तिरुपुर के विकास को तीव्र गति दी।
रुपये के मुकाबले डालर जैसे-जैसे मजबूत होता गया, वैसे-वैसे निटवियर के निर्यात में भी वृद्धि होती चली गई। सन् 1991 में डॉलर का मूल्य 13 रुपये होता था, जो सन् 2002-03 में 50 रुपये तक पहुंचा। तदुपरांत डॉलर का मूल्य सभी मुद्राओं के मुकाबले और रुपये के मुकाबले भी कम होने लगा, फिर भी रुपये के मुकाबले यह गिरावट उतनी नहीं थी। इसका श्रेय भारतीय रिजर्व बैंक की रुपये को सस्ता रखने की नीति को जाता है।
सन् 2007 के आरंभिक महीनों में, डॉलर का मूल्य लगभग 44 रुपये था। तब तक तिरुपुर निर्यातकों के लिए सबकुछ अच्छा चल रहा था। लेकिन अप्रैल 2007 के बाद से इतिहास पलट गया। मार्च 2007 में एक डॉलर के बदले जहां 44 रुपये मिलते थे, चार माह के अंदर ही डॉलर का मूल्य घटकर 40 रुपये हो गया। इस तरह निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ा।
यदि मार्च 2007 में किसी निर्यातक ने पांच डॉलर प्रति टी-शर्ट के हिसाब से जून 2007 में 100,000 टी-शर्ट सप्लाई करने का ठेका लिया, तो उसका निर्यात बिल 500,000 डॉलर का होगा और माल की सुपुर्दगी पर 44 रुपये प्रति डॉलर के हिसाब से उसे 2.20 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे। लेकिन जब जून तक डॉलर घटकर 40 रुपये के समतुल्य रह गया तो निर्यातक को कम पैसा मिलेगा सिर्फ 2 करोड़ रुपये। तिरुपुर से सालाना 2.2 अरब डॉलर का निर्यात होता है, जिसे देखते हुए जो माल पहुंचाया जाना है या जिसका भुगतान मिलना है, उस माल की कीमत किसी भी समय 75 करोड़ डॉलर से अधिक या 3,300 करोड़ रुपये होगी।
यदि डॉलर 45 रुपये से घटकर 40 रुपये हो गया तो उनका नुकसान 300 करोड़ रुपये के बराबर होगा। इस उम्मीद में कि डॉलर का मूल्य चढ़ेगा, कम नहीं होगा, बहुत से निर्यातकों ने माल की बिक्री के बदले डॉलर में प्राप्त आय को डॉलर खाते में जमा करा दिया था। नतीजा यह हुआ कि अप्रैल-जून 2007 में डॉलर के गिरते ही उक्त खाते में जमा रकम का भी मूल्य घट गया। तिरुपुर निर्यातकों को इस तरह अनुमानत: 400 करोड़ रुपये की हानि हुई।
विदेशी मुद्रा के डेरिवेटिव्य (व्युत्पत्तियां)
कहानी अब शुरू होती है। हालात अचानक और अप्रत्याशित रूप से बदल जाने के कारण जब तिरुपुर निर्यातक हैरान-परेशान थे, तब कुछ बैंकों, अधिकतर नए प्रकार के निजी बैंकों ने अपने कुछ बोलने में अत्याधिक सक्षम और आधुनिक विदेशी मुद्रा व्युत्पत्तियों के सेल्समैनों को साधारण सीधे-सादे निर्यातकों के पास भेजा। उन्होंने उनके सामने एक जादुई सुरक्षा जाल पेश किया।
उन्होंने निटवियर निर्यातकों को यह न सोचने की सलाह दी कि वे निटवियर निर्यात जैसे कठिन काम से ही धन कमा सकते हैं। उन्हें बताया कि वे विदेशी मुद्रा बाजार में व्युत्पत्ति उत्पादों के जरिए बाजी लगाकर और भी ज्यादा कमाई कर सकते हैं।
उन्होंने निर्यातकों को यह भी भरोसा दिलाया कि विदेशी मुद्रा व्युत्पत्ति उत्पादों की खरीद एवं बिक्री से उन्हें जो कमाई होगी, वह डॉलर मूल्य में गिरावट के कारण उन्हें हुई हानि की पूरी भरपाई कर देगी। ये बैंक तिरुपुर तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि वे प्रत्येक ऐसे समुदाय-प्रधान औद्योगिक समूह में गए, जैसे कि लुधियाना, सूरत, राजकोट, बड़ौदा, कोयंबतूर, तिरुपुर, करूर आदि। लेकिन यह कहानी तिरुपुर की है।
उत्साही बैंकरों द्वारा प्रस्तुत जोशीले दृश्य ने निराशाग्रस्त निर्यातकों के कानों में जादुई मंत्र फूंक दिया। बैंकों ने उन्हें यह भी बताया कि व्युत्पति उत्पादों की योजना नोबल पुरस्कार पाने वाले अर्थशास्त्रियों द्वारा बनाई गई है। डॉलर के प्रहार से आहत तिरुपुर के आर्मस्ट्रांग पलनीसामी जैसे निर्यातकों के लिए यह प्रस्ताव बहुत ही लुभावना था।
(प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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