स्वाग्रही बनें, आक्रामक नहीं
जोगिन्दर सिंह
नई दिल्ली, 8 जनवरी (आईएएनएस)। किसी पर इसके लिए दबाव नहीं डालना चाहिए कि वे वैसा ही व्यवहार करें जैसा आप चाहते हैं। स्वाग्रही का अर्थ काल्पनिकता से परे निज का वास्तविक रूप से होता है। इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि हम अपनी अस्वीकार्यता को चीखकर बताएं।
यह रचनात्मक, स्वस्थ एवं अर्थपूर्ण रिश्ते बनाना है और आत्म-स्वाभिमान एवं दूसरों से प्राप्त आदर को बढ़ाना है। यह दूसरों से अपेक्षाएं करती है जो हमें निराशा की ओर धकेलती है और हमें ऐसा लगता है कि हमारा जीवन हमारे अधिकार में नहीं है। हम दूसरों से कैसे जुड़ते हैं इस चीज का यह दबावग्रस्त बना देती है। स्वाग्रही और आक्रामक होने में जो मूल अंतर है कि आपके शब्द एवं व्यवहार दूसरों के अधिकारों एवं हित को कैसे प्रभावित करते हैं।
आप चाहे स्वाग्रही हों या उदासीन एक बात का ध्यान रहे कि आप सब पर अधिकार नहीं जमा सकते हैं। स्वाग्रही होने का मतलब नहीं है कि आप सब पर अधिकार नहीं जमा सकते हैं। यह बगैर क्षमाप्रार्थी हुए अपनी बातों को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने का एक तरीका है। दूसरों का शांतिपूर्वक सुनना और उनके तर्को को समझना भी इसमें शामिल है।
किसी काम को करने या लोगों से अर्थपूर्ण ढंग से संबंध स्थापित करने के लिए हमें उनसे संवाद स्थापित करने की आवश्यकता होती है। अच्छा संवाद हमारी प्रभाव क्षमता को बढ़ा सकता है और और बुरा इसे बर्बाद भी कर सकता है। संवाद मौखिक और शाब्दिक दोनों हो सकता है। अधिकांश समय हम केवल शाब्दिक संवाद का उपयोग करते हैं। इसका उपयोग हमारी क्षमता में अंतर ला सकता है।
हमें अपनी आवाज को विकसित करने की आवश्यकता है। आपको जोरदार एवं मधुर आवाज में सामंजस्य बैठाना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि आप एक दबी या सहमी हुई आवाज का उपयोग करें जो आपको अन्य लोगों की आक्रामकता का शिकार बना दे, चाहे वे आपके मित्र, सहकर्मी या बॉस हों।
स्पष्ट एवं सहजतापूर्वक बात करें न कि सुर में बात करें, जिसका बुरा असर होता है। यदि आप ज्यादा तेज बोलते हैं तो दुनिया आपको घबराया हुआ समझेगी जो कि अपनी बात समाप्त करने की जल्दी में है। उसी प्रकार इतना धीरे भी न बोलें की बात आपके गले में रह जाए या आप एक वाक्य पूरा बोलने में काफी लम्बा समय लेते हैं। सही तरह से अपनी आवाज का उपयोग कर फिल्म एवं टीवी कलाकार अपनी आजीविका कमाते हैं। आवाज का प्रयोग कैसे किया जाए इसे सीखने के लिए टीवी देखना या रेडियो सुनना अच्छा उपाय है।
1990 के दशक में टीवी भारत में जोरदार ढंग से आया। 1950 में अपने आवाज को सुधारने के लिए अंग्रेजी समाचार सुना करता था। मेरे आदर्श रेडियो उद्घोषक मेलवीली डी मेलो थे। वह ऐसे उद्घोषक थे जो अपनी शब्दशैली, आवाज एवं उनके माप-तौल से चीजों का बखान इस प्रकार करते थे जैसे आपको महसूस होगा कि गणतंत्रता दिवस या स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम आप अपनी आखों से देख रहे हों। उनसे मिले बगैर मैंने कई चीजें उनसे सीखी है।
भारतीय पुलिस सेवा प्राप्त करने के 20 साल बाद अपनी पत्नी जो कि उस समय भारतीय सूचना सेवा में वरिष्ठ अधिकारी थी कि वजह से इनसे एक बार मिल पाया। मैंने उन्हें मेरी संवाद कला के आदर्श होने के लिए धन्यवाद दिया। मैंने जब उनसे कहा कि वह इस कला में सबसे अधिक माहिर हैं तो वह आश्चर्यचकित हो गए। मैंने उन्हें बताया कि जीवन एवं उत्सुकता को सही शब्दों में पिरोना मैंने उन्हीं से सीखा है।
एक अच्छा शब्द-भंडार आपकी सबसे बड़ी सहयोगी हो सकती है। आपको हालांकि इसे लगातार आधुनिक करते रहना चाहिए। यदि आप किसी शब्द को लेकर संशय में हैं कि यह आपकी भावनाओं को व्यक्त कर पाएगा या नहीं तो उसका उपयोग न करें। रोज एक-दो नये शब्द सीखना एवं उसे उपयोग में लाना अच्छी बात है।
किसी से भी संवाद स्थापित करते समय आपको सुनने वाले की आंखों में देखकर बात करनी चाहिए। उसकी तरफ से अपना ध्यान न हटाएं, क्योंकि फिर ऐसा प्रतीत होगा मानो आप उन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। आपके शारीरिक हाव-भाव जैसे मुस्कान, चेहरे का हाव-भाव, बातचीत एवं आप जो कुछ कहना चाहते हैं उसके अनुकूल होना चाहिए।
आपके शब्द, हाव-भाव, टोन एवं बातचीत एक दूसरे के लिए सहायक होने चाहिए। छोटे ग्रुप के लिए कम से कम या बिल्कुल ही हाव-भाव का उपयोग न करें। यदि आपको नकारात्मक संदेश प्रेषित करना है तो मुस्कान की आवश्यकता नहीं है। आपके शाब्दिक एवं मौखिक संवाद की बेहतर स्थिति आपकी उत्पादकता को बढ़ा सकती है। हमें हर समय अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों, सहकर्मियों, बॉस आदि से संवाद करना होता है।
एक असफल संवाद का मतलब है कि काम की असफलता। हमारा गरीब या अमीर होना इस बात पर निर्भर करता है कि संवाद स्थापित करने में कितने पक्के हैं। हमारे संवाद की क्षमता ही हमारी विश्वसनीयता को स्थापित करती है।
जब तक हम अच्छी तरह संवाद नहीं करते, तब तक हम जो चाहते हैं उसे नहीं पा सकते। साधारण लेकिन प्रभावशाली संवाद चाहे वह शाब्दिक हो या मौखिक, हमें इस तरह बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम क्या कहना चाहते हैं।
पहले से अच्छी तरह सोच लें कि आप क्या प्रकट करना चाहते हैं। साथ ही साथ उद्देश्य चाहे किसी बिंदु विशेष पर ध्यानाकर्षण करना हो, जानकारी हासिल करनी हो, किसी बात पर राय जाननी हो या फिर कोई काम शुरू करना हो, के प्रति स्पष्ट रहें। किसी से भी बात करते समय धीर-गम्भीर स्वर में बात करें।
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि., नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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