हितैषी भी होते हैं आलोचक

नई दिल्ली, 2 जनवरी (आईएएनएस)। किसी व्यक्ति द्वारा की गई आपकी आलोचना कितनी सार्थक या निर्थक है, इसका आकलन आप इस बात से कर सकते हैं कि आलोचना करने का उसका तरीका और लहजा क्या है? खुद उस व्यक्ति के अपने तौर-तरीके कैसे हैं और आलोचना करने वाला स्वयं कितना व्यवस्थित है?

कई लोग सिर्फ इसलिए आलोचना करते रहते हैं कि उनके पास करने के लिए कुछ और नहीं होता है, जबकि कुछ लोग आपसे ईष्र्यावश आपकी आलोचना करते हैं और कुछ आपके शुभचिंतक होने के कारण। जो सचमुच आपका शुभचिंतक होगा वह कभी भी कोई काम बिगड़ जाने के बाद यह कहता आपके पास नहीं आएगा कि आपने ऐसा क्यों किया? आपको ऐसा करना चाहिए था, बल्कि पहले वह आपको सांत्वना देगा और बाद में आपकी बात सुनकर बताएगा कि आपको ऐसा करके देखना चाहिए था या भविष्य में ऐसा करके देखें। आपके अच्छे काम की आलोचना तो वह करेगा ही नहीं, भले उसका नतीजा कुछ न हो या खराब ही क्यों न हो।

इसके विपरीत ईष्र्यालु व्यक्ति अक्सर बिना किसी बात के ही आपकी आलोचना करता रहेगा। अगर कोई काम बिगड़ गया तब तो वह जले पर नमक छिड़कने तुरंत पहुंचेगा। मौका मिलते ही वह आपकी टांग खींचने से नहीं चूकेगा।

इसके अलावा कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो हमेशा खीजे हुए से रहते हैं। उनका स्वभाव होता है शिकायत में जीना। वे अगर आपको कभी कुछ सलाह देंगे तो वह भी खींजे हुए होने की मुद्रा में और शिकायत तो खर करेंगे ही, खीज से भरपूर। वास्तव में यह उनके अपने स्वभाव की बात होती है और यह स्वभाव बनता है स्थायी किस्म के असंतोष से। ऐसे लोगों की बात पर कोई खास ध्यान न ही दें, तो ठीक।

मंतव्य को समझिए

इस संदर्भ में सबसे ज्यादा जरूरी होता है, आलोचना करने वलो के मंतव्य को समझना। स्वस्थ मन से आलोचना बहुत कम ही लोग करते हैं। अधिकतर आलोचकों के संबंध में पश्चिम के प्रख्यात दार्शनिक राल्फ वाल्डो इमर्सन की बात ही सही साबित होती है। वह कहते हैं, चिंदियां वही लोग निकालते हैं जो स्वयं किसी चीज का निर्माण नहीं कर सकते।

निंदक आम तौर पर नाखुश और असंतुलित लोग ही होते हैं। ऐसे लोग जो आपके मुकाबले खुद को कमतर समझते हैं और आपके प्रति बेवजह ईष्र्या से भरते चले जाते हैं। ईष्र्या हीनभावना की ही उपज है। जिसमें उत्तरहीन भावना आती है, उसमें आत्मविश्वास की कमी होती है। जब यह जाहिर हो जाए तो कभी भी ऐसे आलोचकों की किसी भी बात को तवज्जो न दें।

इसके विपरीत कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ लोग आपके सचमुच हितैषी होते हैं। वह आपकी और आपके भविष्य की परवाह भी करते हैं। ऐसे लोग जब आलोचना करते हैं, तो वह आलोचना कम सलाह ज्यादा होती है। वे आपको सिर्फ आपकी कमियां नहीं बताते। ऐसे लोग यह भी सोचते हैं कि आप उन कमियों से कैसे उबर सकते हैं और उबरने का वह रास्ता भी बताते हैं। ऐसे सलाहों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

आत्म-विश्लेषण करें

अब सवाल उठता है कि उस आलोचना का क्या करें, जो निर्थक है, इसके लिए स्वामी विवेकानंद की एक बात पर ध्यान देना उपयोगी होगा। वह कहते हैं कि जब भी आप किसी क्षेत्र में बेहतर कार्य करेंगे, आलोचना के शिकार होंगे। जब भी आप अपने समय से आगे की बात सोचंगे या कोई नया प्रयोग करेंगे तो आप पर प्रहार किए जाएंगे। वह कहते हैं, जब आप कोई नया विचार देंगे तो उसे तीन दौर से गुजरना होगा, सबसे पहले अस्वीकार, फिर उपहास और अंत में स्वीकार।

अगर इसे समझ लें, तो अपनी आलोचना से निबटना आपके लिए आसान हो जाएगा। अगर आप निंदकों की बातों को अपने पर नकारात्मक असर करने देने की अनुमति देंगे तो ऐसा असर आप पर होगा। इसके विपरीत अगर आप उनकी बातों का स्वयं विश्लेषण करेंगे तो यह आलोचना ही आपके लिए आत्मप्रबंधन का एक महत्वपूर्ण मानक बन जाएगा। जब भी कोई कुछ कहे तो उसे सुनें, आत्म-निरीक्षण करें और अगर पाएं कि सही है तो उन गलतियों को ठीक कर लें, अन्यथा जाने दें।

(लेखक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि., नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता के अचूक मंत्र' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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