ऐसे करें आलोचना का सामना
नई दिल्ली, 29 दिसम्बर (आईएएनएस)। महात्मा गांधी ने कहा है, "आलोचना करने से अधिक महत्वपूर्ण है अपनी आलोचना सुनकर आत्म सुधार करना। आलोचक आपके शत्रु ही नहीं, मित्र भी होते हैं।" जीवन में दो बातें निश्चित हैं, बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते थे, "अप्रिय बात है मृत्यु और टैक्स! लेकिन एक तीसरी अप्रिय बात भी निश्चित होती है, वह है आलोचना। इससे कोई भी पूरी तरह बच नहीं पाता। अक्सर हमारा कॅरियर, हमारी भावनात्मक स्थिरता, हमारा सुख इस बात पर निर्भर करता है कि आलोचना सुनकर हम कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।"
आलोचना दो प्रकार की होती हैं, पहली सौम्य, तर्कपूर्ण लेकिन रचनात्मक, जो लोगों को कम ही मिल पाती है। तीखी, चोट करने वाली, शत्रुतापूर्ण आलोचना यही लोगों को ज्यादातर मिलती है। यहां इस दूसरे प्रकार की आलोचना पर चर्चा की जा रही है। अगर आप संवेदनशील इंसान हैं, आप ईमानदार हैं तो आप आलोचना से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। आपको आलोचना का सामना तीन स्तर पर करना होगा। वे स्तर हैं भावनात्मक, तर्कसंगत एवं व्यावहारिक स्तर।
अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना सबसे कठिन होता है। आलोचना आपके आत्मविश्वास पर प्रत्यक्ष आक्रमण की तरह है। इसीलिए क्षोभ और गुस्से के साथ इसकी प्रतिक्रिया सामने आना स्वाभाविक है। लेकिन ऐसा करने से आपका ही नुकसान होता है, अगर आप अपने आलोचक का मुंह बंद करने के लिए ऐसा करते हैं तो भी क्षति आपको ही पहुंचती है। चौदहवीं लोकसभा की सबसे युवा सांसद एवं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी.ए. संगमा की पुत्री अगाथा संगमा कहती हैं, "आलोचना से निपटने के लिए पहला कदम यही है कि आप शांत बने रहें। यह आसान नहीं है, मगर ऐसा किया जा सकता है।"
अपने जमाने में काफी आलोचना झेलने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर से पूछा गया, 'आपने धर्यपूर्वक आलोचनाओं का सामना किस तरह किया?'
हूवर ने कहा, "इस सवाल के दो संभावित उत्तर हो सकते हैं, पहला उत्तर है कि एक इंजीनियर होने के नाते समस्याओं को सुलझाने के लिए मुझे प्रशिक्षित किया गया है। मैं जानता हूं कि राष्ट्रपति पद पर आसीन होने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आलोचना का सामना करना ही पड़ता है, इसीलिए जब मैं ह्वाइट हाउस में आया तो आलोचना का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होकर आया। दूसरा उत्तर यह है कि मैं अपनी धुन में रहने वाला इंसान हूं।"
जो मनुष्य अपनी धुन में मग्न रहता है, वह भीतर की शांति में विश्वास करता है। भीतर की शांति तभी हासिल की जा सकती है जब आप अपने हृदय से क्रोध और कड़वाहट को बाहर निकाल देंगे। अगर व्यक्ति के भीतर ऐसी ईश्वर-प्रदत्त शांति बसती हो तो वह दूसरों की आलोचना से हरगिज विचलित नहीं हो सकता।
हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि अपने निंदक के लिए प्रार्थना करो, जो तुम्हें चोट पहुंचाए, उसके लिए मंगलकामना करो। इसी तरह संत कबीर दास ने कहा है -
'निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय'
आलोचना होने के बाद साधारण व्यक्ति के लिए ऐसा करना आसान नहीं हो सकता, मगर जो ऐसा करते हैं वे महसूस करते हैं कि अपने निंदक को क्षमा कर अपनी पीड़ा की अनुभूति को दूर किया जा सकता है।
अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए यह विश्वास रखें कि हमेशा सक्षम स्त्रियों और पुरुषों को ही आलोचना का सामना करना ही पड़ता है। अगर आपके जीवन का कोई ठोस लक्ष्य है, अगर आप अपने लक्ष्य को पाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और आप नए मार्ग का निर्माण करना चाहते हैं तो निश्चित रूप से आपको विरोध एवं शत्रुता का सामना करना पड़ेगा। दुनिया के समस्त महान पुरुषों को आलोचना का सामना करना पड़ा है, अपने समकालीनों की शत्रुता का सामना करना पड़ा है।
आलोचना का सामना करने का दूसरा कदम है बुद्धिसंगत होना। आलोचना को सुनें और फिर उसके उद्देश्य पर विचार करें। आधुनिक भारत में औद्योगिकीकरण के स्तंभ जे.आर.डी. टाटा ने कहा था, "लोग असहमति के स्वर में जो कुछ कहते हैं उनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं, चूंकि वे हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं। जबकि प्रशंसा हमें खुश ही कर सकती है।"
अपने आप से यह सवाल ईमानदारी के साथ पूछें कि क्या आलोचना में सच्चाई निहित है? बहानेबाजी या गलती को औचित्यपूर्ण ठहराने से बचें, चूंकि ऐसा करने से आपकी गलती को औचित्यपूर्ण ठहराने से बचें, चूंकि ऐसा करने से आपकी गलती और भी संगीन बन सकती है।
अगर आप इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि आपका निंदक सच कह रहा है तो बेहतर होगा कि आप अपनी गलती को स्वीकार कर लें। ऐसा करने से आपका निंदक अपने आप शांत हो जाएगा। चूंकि आप उसकी बात से सहमत हैं, उसके बाद वह और क्या कह सकता है? इसके अलावा लोग ऐसे व्यक्ति की साफगोई से प्रभावित होते हैं जो खुले दिल से अपनी गलती को स्वीकार कर सकता हो।
एक और बुद्धिसंगत तरीका यह है कि आप अपने निंदक की योग्यता की पड़ताल करें। क्या वह प्रतिष्ठित और गंभीर किस्म का शख्स है? अगर वह ऐसा है तो बेहतर यह होगा कि तत्काल उसकी बातों को नकारने से बचें। वह ईष्र्या के चलते आलोचना कर रहा है या वह आपका हितैषी है? इस बात पर विचार करने के बाद उसकी आलोचना का जवाब दे सकते हैं।
मर्यादित चुप्पी आलोचना का सबसे उत्तम उत्तर कहलाती है। कभी-कभी, बेशक, अगर आलोचना झूठी और क्षतिकारक किस्म की हो तो निश्चित रूप से आपको जवाब देना चाहिए। लेकिन ऐसा करते वक्त सहजतापूर्वक तथ्यों का उल्लेख करें, बदला लेने का प्रयास न करें।
एक और बात याद रखें कि जब आलोचना आपको कानों तक पहुंचती है, तब उसके मूल स्वरूप में काफी तब्दीली आ चुकी होती है। लोगों को नमक-मिर्च लगाकर बढ़ा-चढ़ाकर बातें बनाने की आदत होती है। ऐसे लोग आलोचना के शिकार व्यक्ति को उत्तेजित करने के लिए झूठ का सहारा भी ले सकते हैं।
आपको इस तरह से उकसाने वाले, तमाशबीनों से सावधान रहना चाहिए। जिस तरह हाथ की उंगलियां एक समान नहीं होतीं, उसी तरह मनुष्य भी एक समान नहीं होते। लोग बेवजह एक दूसरे की आलोचना करते रहते हैं, इसे मानव व्यवहार का एक दोष समझा जा सकता है।
आलोचना का सामना करने के लिए क्या व्यावहारिक स्तर पर कुछ किया जा सकता है? जी हां, ऐसा करके, आप अपने निर्देशक की सहायता करने की कोशिश कर सकते हैं। आलोचना दोधारी तलवार की तरह होती है और जो व्यक्ति ऐसे तलवार का संचालन करता है वह स्वयं तलवार के जहरीले हिस्से से घायल भी होता है।
उदाहरण के तौर पर जो लोग अफवाहें फैलाते हैं वे ईष्र्या और असुरक्षा की भावना से ऐसा करते हैं। छोटे लोग अपने व्यक्तित्व का विकास करने की जगह दूसरों की निंदा करने में अधिक रुचि लेते हैं लेकिन बदले में उन्हें क्या हासिल होता है? कोई उनके ऊपर भरोसा नहीं करता। अंत में वे अविश्वसनीय जीव बनकर रह जाते हैं।
धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जो बुराई करता है, हमें उसके साथ भलाई करनी चाहिए। यह उपदेश यूं ही नहीं दिया गया है। संकीर्णता की तुलना में उदारता अधिक शक्तिशाली होती है। विलियम मैकीनली जब अमेरिकी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे तब एक अखबार उनके खिलाफ अनर्गल बातें छाप रहा था। उस अखबार के रिपोर्टर को मैकीनली के साथ रेलयात्रा पर यह हिदायत देकर भेजा गया था कि वह मैकीनली के खिलाफ केवल नकारात्मक खबरें ही लिखकर भेजेगा।
शुरू-शुरू में रिपोर्टर ने वैसा ही किया और इस बात की सूचना मैकीनली को मिल गई। एक दिन सर्दी से ठिठुरता हुआ रिपोर्टर अपनी सीट पर सो गया। उसी समय मैकीनली उसके पास आए और अपना ओवरकोट उतारकर उसके शरीर को ढक दिया। जब रिपोर्टर नींद से जागा और उसे असलियत का पता चला तो उसने फौरन अखबार को अपना त्यागपत्र भेज दिया। अपने प्रति हमदर्दी दिखाने वाले व्यक्ति की निदा करने के लिए वह अब तैयार नहीं था।
ध्यान रखिएगा कि लगातार आलोचना करने वाले लोग कमजोर और दु:खी किस्म के होते हैं, जो किसी तरह अपनी तरफ सबका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। वे अपनी कमजोरियों पर परदा डालने के लिए दूसरों के जीवन में खामियां ढूंढ़ते रहते हैं।
डिजरायली का कथन है, "सही बात कहने की तुलना में आलोचना करना आसान होता है।" धर्मग्रंथों में कहा गया है, "अगर कोई तुम्हारे प्रति बैर भाव रखता है तो उसके गुस्से की वजह का पता लगाओ और उस वजह का निदान करो। इस तरह तुम्हारे शत्रु की मदद होगी और तुम्हारी भी मदद होगी।"
दुनिया में हमेशा निदंक रहेंगे। उनमें कुछ रचनात्मक किस्म के होंगे तो कुछ क्रूर भी होंगे। आप अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया को नियंत्रित कर, बुद्धिसंगत रवैया अपनाकर और निदंक को गुस्से से छुटकारा दिलाने में मदद कर आलोचना का सामना कर सकते हैं।
(लेखक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि., नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता के अचूक मंत्र' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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