अपने सपनों को दें मजबूती

नई दिल्ली, 28 दिसम्बर (आईएएनएस)। ऐसे कई लोग हैं जो कुछ भी करते समय खुद को कम आंकते हैं। शायद इसका एक कारण है कि वे दूसरों को सुनहरे चश्मों से देखते हैं। यह उनके अंदर एक प्रकार की भावना का विकास करती है कि वे उनसे अच्छे हैं।

जब मैंने अपनी भारतीय सिविल सर्विस की लिखित परीक्षा 1960 में पास की तो विश्वास करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था कि मैंने पहली बार में ही ऐसा किया और वो भी एक विद्यार्थी के रूप में। केवल जब मेरे प्रोफेसर ने मुझे बताया कि तुम खुद को आदतन कम आंकते थे, तब मुझे यह एहसास हुआ कि यह उनके मूल्यांकन का वैध पक्ष है। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम परिश्रमी एवं लगनशील हो, तुम तब तक नहीं छोड़ सकते जब तक कि तुम सफल न हो। लेकिन मैंने खुद को इस नजर से नहीं देखा था।

यह वो चीज है जो कि जीवन में या व्यवसाय में कहीं भी सफलता के लिए सर्वप्रथम चाहिए।

हमें चाहिए कि हर समय के साथ खुद के काम एवं जीवन के प्रति नजरिये का मूल्यांकन करें। हमें खुद को देखना चाहिए कि क्या हम उस तरह के लोग हैं जो सफलता मिलने के बाद भी बमुश्किल संतुष्ट हो पाते हैं। एवं अपने प्रदर्शन की बारीकियों को देखते हैं तब भी जब जीत मिली हो, बड़ी जीत। क्या हम अपनी गलतियों को खुद से ढूंढ रहे हें कि हम अच्छा कर सकते हैं? क्या हमने इसे खुद को आंकने की कसौटी या खांचा बना रखा है?

लक्ष्य की तरफ अग्रसर होना अच्छी बात है, मगर हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि हमारे जीवन के लिए यह एक दर्दनाक बोझ न बन जाए। यदि हम अपने जीवन के प्रति नजरिए की जांच सावधानी से नहीं कर रहे हैं तो यह एक रुकावट बन सकता है, न कि समर्थन। यदि आप निरंतर यह महसूस करते हैं कि आपका प्रदर्शन कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है, तो आप अपने आत्मविश्वास का गला घोंटकर खुद को दुखी एवं तनावपूर्ण बना देते हैं।

जब आप खुद से निराश एवं गुस्सा होते हो, आप और ऐसे ही करते जाते हैं खुद से भी और दूसरों से भी। आप खुद से पूछें कि 1 से 10 के स्केल में आप कहां आते हैं? यह आपको बताएगा कि आप आक्रामक हो, उत्कट हो और क्रूर हो या खुद के प्रति विनम्र और क्या बदलाव चाहिए। इसे अपनी सोच एवं मन:स्थिति में शामिल करें। यह अच्छा होता है कि आप दूसरों की आलोचना न करें, किसी गलती के लिए भले ही उसने किया हो, आप खुद की किसी गलती के लिए निंदा करें।

आपको खुद के स्वाभिमान को ऊंचा उठाने के लिए ईमानदारी से मेहनत करना चाहिए जो कि बाहरी परिवेश पर नहीं पर आपके भीतरी स्थितियों के आधार पर हो। अपने आप को ज्यादा ऊंचा समझना शान की गारंटी नहीं है कि आप खुश हैं एवं सफल हैं। इसका केवल यह अर्थ है कि आप किसी चुनौती का सामना जोश के साथ कर सकते हैं और बिना इस भावना के कि आप नाउम्मीद हैं और आपको दूसरों की इजाजत चाहिए। महत्वपूर्ण एवं अन्य उद्देश्यों के साथ बढ़ने के स्रोत हैं। इसका यह अर्थ भी है कि आप अपने जीवन को शांति के साथ अपने मूल्यों पर जीएं।

यदि किसी कारण से हमें दूसरों के बनाए पथ का अनुसरण करने के लिए दबाव डाला जाता है तो इससे न केवल हम निराश बल्कि उदास भी महसूस करते हैं। संक्षेप में कहूं तो आपको खुद का पक्ष लेना चाहिए, चाहे जैसी भी परिस्थिति हो। एवं कभी स्वयं को नकारात्मक सुझाव नहीं देना चाहिए। जैसे मैं इस काम में मूर्ख था या मैं बहुत अच्छा कर सकता था या मुझे यह पहले सोचना चाहिए था मैं इतना बेवकूफ कैसे हो सकता हूं।

इस प्रकार के वाक्यों से अच्छा है कि कैसे हम अपने प्रदर्शन को सुधारें या मैं सफल हो जाऊंगा या क्या और कहीं चीजों को और अच्छे ढंग से या अलग ढंग से किया जा सकता है या क्या पाठ मैं इससे पढ़ सकता हूं जो कि मुझे मेरे प्रदर्शन में सुधार करने में सहायक रहेगा या मुझे सही पथ पर रहने में मदद करेगा।

सकारात्मक एवं नकारात्मक दो अलग एवं विपरीत दिशाएं हैं, अपने फैसला करना है आप किसे चुनते हैं। हमारे जीवन में निर्णायक कारक है एवं चाहे यह सकारात्मक हों या नकारात्मक। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किधर जाना चाहते हैं एवं मस्तिष्क को क्या अधिकार प्रदान करना चाहते हैं लेकिन यह दिमाग में रखना कि नकारात्मक सोच, जहर लेने के समान है जो कि आपके जोश, जुनून एवं उत्साह को कम कर देती है, परंतु उसी समय सकारात्मक सोच ही पर्याप्त नहीं है। उसे सकारात्मक कार्यो से अनुसरण भी करना चाहिए।

जब आप अपने विचारों एवं सोच को नियंत्रित कर सकते हैं तो आप अपने जीवन को भी नियंत्रित कर सकते हैं। एक दिन मैं सुबह टहलते समय एक पत्थर से ठोकर खा गया। परिणाम मेरे दांतों व मसूड़ों में चोट लग गई और खून निकलने लगा। मैंने तुरंत टिशू पेपर व रुमाल निकाला और खुद को व मुंह को साफ कर लिया। मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि कोई भी व्यक्ति मेरे घर जाने के क्रम में बहते हुए खून को न देख सके।

घर पर मैंने अपने चोट को साफ किया एवं एक साफ रुमाल मैंने अपने मुंह में तब तक डाले रखा जब तक खून रुक नहीं गया। मैंने पांव के मोच के बारे में भी नहीं सोचा। शाम में जैसा कि मैंने पहले ही स्वीकार किया था भाषण के लिए गया। मैंने यह निश्चय किया कि मैं अपनी किसी भी चोट को सकारात्मक उपस्थिति के बीच नहीं आने दूंगा। मैं दृढ़ था कि मैं अपने जीवन के प्रति बर्ताव में कोई बदलाव नहीं लाऊंगा। हमारी उपस्थिति अच्छे व बुरे का मिश्रण है। यदि आपकी इच्छा सही रहने की है तो आपको विपरीत चीजों को भी पूरे आत्मविश्वास के साथ स्वीकार करना चाहिए।

जीवन में प्रत्येक मिनट क्रॉस रोड पर खड़े होते हैं जो दो तरफ जाती है एक मरुस्थल को ले जाती है एवं दूसरा हरियाली व सुसंस्कृत जगह पर। यह हम पर है कि हम कौन सा मार्ग चुनना चाहते हैं। साधारणत: हम अपनी परिस्थितियों और खास कर विपरीत परिस्थितियों को यह अनुमति दे देते हैं कि वो हमारे विचारों एवं मूड को प्रभावित करें। हमें इनसे मानसिक व भावनात्मक रूप से उबरना है। यही एकमात्र रास्ता है जिससे हम उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। सफलता किसी व्यवसाय में खुद चल कर तुम तक नहीं आती, आपको इसके लिए जाना होता है।

(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि.,नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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