अमेरिका विश्व में सबसे अधिक ऋणग्रस्त देश

एस. गुरुमूर्ति

नई दिल्ली, 27 दिसम्बर (आईएएनएस)। अमेरिका की सरकार ने कर लगाकर उसके बदले में अमेरिकियों को सामाजिक सुरक्षा दे दी। इस प्रकार ऐच्छिक बचत और निवेश का स्थान कर ने ले लिया है। इस कदम ने अमेरिकियों को बचत करने और अपनी बचत की देख-भाल करने की आवश्यकता से बड़ी राहत पहुंचाई है।

अमेरिकियों के निजी वित्तीय साधन आज घाटे में है, इस स्थिति के चलते अमेरिका आज विश्व में सबसे अधिक ऋणग्रस्त देश बन गया है, जबकि सन् 1982 में अमेरिका का शुद्ध अंतर्राष्ट्रीय निवेश 7 प्रतिशत था। इसका शुद्ध निवेश विदेशी देनदारियों में बदल गया, जिसका स्तर 2.5 लाख करोड़ डॉलर या सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) के 25 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

लेकिन असली कहानी तो अब शुरू होती है। जापान ने अमेरिका की नकल की और खपत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ब्याज-दरों में कटौती की। भारत ने निवेश और जोखिम पूंजी को प्रोत्साहित करने के लिए दरों में कमी की। क्या ब्याज-दरों में कटौती का जापान और भारत में वही असर हुआ जो अमेरिका में देखने को मिला?

इस संदर्भ में 'दि इकोनॉमिस्ट' पत्रिका की यह रिपोर्ट पढ़ें, जिसमें लिखा है कि जापान की वित्तीय परिसंपत्ति, जो सन् 1990 में 4 लाख करोड़ डॉलर से कुछ अधिक थी, आज तीन गुना होकर 12.5 लाख करोड़ डॉलर तक जा पहुंची है। इसमें से अधिकांश सुरक्षित है, जोखिमी निवेश नहीं है। जापान ने अपने बचत करने के आदी लोगों को खर्च करने के लिए बाध्य करने की दृष्टि से ब्याज-दरों में नियमित रूप से कटौती की और सन् 1990 में 6 प्रतिशत के आस-पास घूम रही ब्याज-दर को कम करते-करते अंतत: 2001 में शून्य (जी हां, जीरो) कर दिया और पांच साल तक यही स्थिति रही।

सन् 2006 में जापान ने ब्याज की दर 0.25 प्रतिशत तय कर दी और फरवरी 2007 में उसे दोगुना यानी 0.5 प्रतिशत कर दिया। इस शून्य या नगण्य ब्याज पर जापानियों की क्या प्रतिक्रिया रही? ब्याज-दरों में भारी कटौती के बावजूद उन्होंने तीन गुणा से भी ज्यादा बचत की।

अमेरिकियों के विपरीत वे न तो बड़े-बड़े शॉपिंग केंद्रों में जाकर कतार में खड़े हुए और न ही निक्की यानी शेयर बाजार की ओर दौड़े। ब्याज-दर शून्य या नगन्य होने के बावजूद उनकी बचत का 56 प्रतिशत सुरक्षित ढंग से जमा है, यानी बैंकों में जमा है और मुद्रा के रूप में है। उनकी बचत का केवल 5.9 प्रतिशत ही शेयरों में लगा हुआ है।

बचत करना उनका मंत्र है :

भारतीयों ने भी कुछ ऐसा ही किया। सन् 1996-97 तक भारत सरकार के बंधपत्रों (बांड) पर ब्याज की दर बहुत ऊंची अर्थात् 13 प्रतिशत तक थी। कुछ साल पहले यह ब्याज घटकर उसके आधे से भी कम, यानी 6 प्रतिशत रह गई। फिर भी परिवारों की बचत, जो सन् 1990 के दशक में 18.5 प्रतिशत थी, धीरे-धीरे बढ़कर सन् 2005-06 में 22.3 प्रतिशत तक पहुंच गई। जापानियों की तरह भारतीयों ने भी निम्न ब्याज अर्थशास्त्र के विपरीत व्यवहार किया। इसके अलावा ब्याज-दरों में भारी गिरावट के बावजूद उन्होंने भी जापानियों की भांति शेयर बाजार की ओर रुख नहीं किया।

सन् 2001-02 में उन्होंने अपनी बचत का केवल 2 प्रतिशत शेयर बाजार में लगाया, जो पहले से आधा था। सन् 2004-05 में यह 2.6 प्रतिशत हो गया। भविष्य के लिए तैयार किए गए आंकड़ों से भी नहीं लगता कि दलाल स्ट्रीट में कोई खास उमंग की लहर आएगी, क्योंकि वर्ष सन् 2012 तक भारतीय अपनी बचत का 4 प्रतिशत से ज्यादा शेयर बाजार में नहीं लगाएंगे। आज से तीन साल आगे तक, सन् 2012 में भी, उनके लिए बचत का सबसे विश्वसनीय माध्यम अल्प बचत ही रहेगा। यह तथ्य भारत और जापान को एक-दूसरे के निकट लाता है, लेकिन दोनों को अमेरिका से दूर रखता है।

मिलन बिंदु :

अमेरिकी पद्धति भारत और जापान में विफल क्यों होती है? इसका उत्तर दोनों देशों की पारिवारिक संस्कृति में है। उनके परिवारों का झुकाव आत्मनिर्भरता की ओर होता है, न कि सरकार पर आश्रित रहने की ओर। न ही वे शेयर बाजार-धन आधारित सामाजिक सुरक्षा पाने के लिए बेचैन रहते हैं। बचत और निवेश वे बिंदु हैं। हां, व्यष्टिवादी और समष्टिवादी अर्थशास्त्र, दोनों का मिलन होता है।

परिवार आधारित समाजों में हालांकि व्यष्टिवादी आर्थिक व्यवहार संस्कृति और परिवार से प्रभावित होता है, फिर भी राज्य की समष्टिवादी आर्थिक नीतियों पर अमेरिकी नेतृत्ववाली वैश्विक संस्थाओं का प्रभाव पड़ता है और इस तरह दोनों के बीच एक बेमेल स्थिति बन जाती है। अमेरिका के ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में अर्थशास्त्री बॉसवर्थ ने पता लगाया कि बचत की प्रवृत्ति के बारे में एशिया और अमेरिका के बीच वैषम्य विरोधाभ्यास का कारण 'सांस्कृतिक भिन्नता' है।

बॉसवर्थ लिखते हैं कि बचत के संबंध में एशियाई वंशगत दृष्टिकोण रखते हैं, अर्थात् वे अपने परिवारों के लिए और यहां तक कि कई भावी पीढ़ियों के लिए भी जीवनर्पयत धन-संग्रह करते रहते हैं, जबकि अमेरिकी केवल अपनी सेवानिवृत्ति, यानी सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचते हैं, उसके आगे के बारे में बिल्कुल भी नहीं। इससे लगभग सारी बात स्पष्ट हो जाती है। तब फिर क्या अमेरिका के स्थान पर भारतीय आर्थिक विवरण उसको अपनी ब्याज प्रणाली, बचत और निवेश संबंधी नीतियों के निर्माण में मार्गदर्शन प्रदान करेगा?

पश्च-लेख

लगता है सन् 2001 से अमेरिका में भी निम्न ब्याज-शेयर बाजार द्वैतवाद बाजार में मंदी के चलते कमजोर सा पड़ने लगा है, क्योंकि शेयरों में अमेरिकी परिवारों का निवेश सन 2001 में 52 प्रतिशत की तुलना में सन् 2005 में घटकर 47.5 प्रतिशत रह गया है।

इसके अलावा किए गए अध्ययनों में इस सिद्धांत पर भी सवाल किया गया है कि शेयर बाजार पूंजी का आवंटन बैंकों की अपेक्षा अधिक उचित रूप से करता है। इसी के आधार पर शेयर बाजारों का समर्थन किया गया है, लेकिन उन्हीं अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि अमेरिका और ब्रिटेन में शेयर बाजारों द्वारा गैर-वित्तीय क्षेत्रों को आवंटित पूंजी सन् 1970 से 1989 तक की अवधि के दौरान ऋणात्मक रही है। फिर भी अमेरिका शायद दुबारा सोच-विचार न करें। पर हमें विचार करना होगा।

(प्रभात प्रकाशन लि., नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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