अमेरिका का तरीका जापान और भारत में सफल क्यों नहीं?
एस. गुरुमूर्ति
नई दिल्ली, 26 दिसम्बर (आईएएनएस)। पाठ्य-पुस्तक का नियम बताता है कि ब्याज-दर में कटौती के दो परिणाम होते हैं। पहला, यह बचत करने वाले को निरुत्साहित करती है और खर्च करने वाले का जोश बढ़ाती है, ताकि बैंकर दु:खी हों और व्यापारी खुशी मनाएं।
दूसरा परिणाम अधिक सूक्ष्म है। नियम बतलाता है कि ब्याज में कटौती केवल ब्याज से जुड़ी बचत में बाधक होती है, लेकिन यह शेयर बाजारों के जरिए जोखिम-उठाऊ बचतों को बढ़ावा देती है। यह कैसे होता है, यह बताने के लिए किसी द्नष्टा की आवश्यकता नहीं है।
निम्न ब्याज-दर के चलते बहुत ही कम लाभ मिलने के कारण बचतकर्ता बेहतर लाभ की आशा में बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हो जाते हैं। वास्तव में, निचली ब्याज-दर एक बचतकर्ता को उद्यमी अर्थात् जोखिम उठाने वाला बना देती हैं। अत: जब ब्याज-दरों में कटौती की जाती है, तब शेयर दलाल व्यापारी की जमात में शामिल हो जाता है। इस प्रकार, दिया गया नियम हमें यकीन करा देता है कि ब्याज-दर में गिरावट के कारण बचत करने और खर्च करने की संभावना को साथ-साथ बढ़ावा मिलता है।
चेतावनी है कि यदि मांग ज्यादा हो जाए और पूर्ति कम रहे, तो निम्न ब्याज-दर मुद्रास्फीति की समस्या उत्पन्न कर सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ब्याज-दर में वृद्धि करके उस संकट से निपटा जा सकता है। अन्यथा उनका कहना है, ब्याज-दरें नीची रहने से सभी के लिए खुशी का माहौल बनता है - बचतकर्ताओं और व्यापारियों के लिए, शेयर का व्यवसाय करनेवाले और उत्पादकों के लिए तथा सबसे ज्यादा तो विश्वभर में कुख्यात उधार लेनेवाली सरकारों के लिए भी। निम्न ब्याज-दर व्यवस्था ने एक समाज यानी अमेरिका के वित्तीय स्वभाव का पुनर्गठन कैसे किया, और क्या इसके अनुभव का सार्वजनीकरण सार्थक होगा, यह आगे की कहानी है।
अमेरिका वह पहली प्रयोगशाला बना, जहां निम्न ब्याज के नमूने की परख हुई। यह प्रयोग 1981 के मध्य में शुरू हुआ, जब निम्न स्तरीय फेड फंड टार्गेट रेट 20 प्रतिशत था। यह दर जून 1981 में 14.5 प्रतिशत और उसके बाद सितंबर 1982 में 10 प्रतिशत की गई। तब से लेकर आज तक 25 साल की अवधि में, सन् 1983 की दूसरी तिमाही में छोड़कर 10 प्रतिशत की यह सीमा कभी भी भंग नहीं हुई है।
निरंतर काट-छांट
इसकी तुलना में, यू.एस. फेड ने ब्याज-दरों में इस सामंजस्य के साथ कटौती की कि सन् 1985 और 1990 के बीच यह दर 8 प्रतिशत के नीचे रही, सन् 1989 को छोड़कर, जब ब्याज-दर का आंकड़ा 9 प्रतिशत के आस-पास था। जनवरी 1991 में, फेड दर को घटाकर 6.75 प्रतिशत, फिर दिसंबर 1991 में 4 प्रतिशत और 1992 तथा 1993 में 3.75 प्रतिशत से भी कम कर दिया गया। सन् 1994 में यह 5.5 प्रतिशत या उससे कम और सन् 2000 के आरंभिक दौर में 6.5 के बीच रही।
उसके बाद यू.एस. फेड ने भारी कटौतियां की। फेड ने 6 प्रतिशत से आरंभ करके लगभग हर महीने ब्याज में कमी की और सन् 2000 के अंत में ब्याज दर 1.75 प्रतिशत रह गई, फेड दर सन् 2002 एवं 2003 में 1 प्रतिशत और 2.25 के बीच रही तथा सन् 2004 से 2006 के दौरान 2.25 प्रतिशत के बीच रही तथा सन् 2004 से 2006 के दौरान 2.25 प्रतिशत व 5.25 के बीच। अब यह दर 31 अक्टूबर, 2007 से 4.5 प्रतिशत है।
फेड ने पिछले 27 वर्षो में ब्याज-दर 68 बार घटाई है और 45 बार उसमें वृद्धि की है। लेकिन असल में इसका प्रभाव यह हुआ कि फेड की ब्याज-दर 20 प्रतिशत से घटते-घटते 1 प्रतिशत पर आ गई और अब यह दर 4.5 प्रतिशत है। इस प्रकार हम देखते हैं कि निम्न ब्याज आज अमेरिकी व्यवस्था का अपरिवर्तनीय आधार बन गया है।
क्रेडिट कार्डो पर निर्भरता
जानने की बात यह नहीं कि ऐसा कैसे या क्यों हुआ, बल्कि यह है कि निम्न ब्याज ने अमेरिका को क्या दिया? एक बात, दर में कटौती अमेरिकियों को खर्च करने, यहां तक कि उधार लेने के लिए उत्साहित करती है। नतीजा, सन् 1980 दशक के मध्य से अमेरिकी परिवार क्रेडिट कार्डो पर अधिक निर्भर रहने लगे। बाद में वे उन्हीं के आसरे जीने लगे।
इस समय लगभग 21 करोड़ अमेरिकी 1.2 अरब क्रेडिट और रिटेल कार्डो का उपयोग करते हैं या कहें कि हर व्यक्ति के पास करीब 6 कार्ड होते हैं। परिणाम-उपभोक्ता ऋण, जो अधिकतर क्रेडिट कार्डो पर था, बहुत अधिक बढ़ गया। सन् 1990 में यह आधार 338 बिलियन डॉलर था, जो सन् 2007 की पहली तिमाही तक बढ़कर 2.46 लाख करोड़ डॉलर हो गया। यह वृद्धि 17 वर्ष से कम अवधि में सात गुणा से भी ज्यादा थी।
आज प्रत्येक कार्ड पर 8562 डॉलर से अधिक का ऋण है। ब्याज-दरों में कटौती ने उन्हें खर्च करने के लिए आकृष्ट किया। क्रेडिट कार्डो ने अमेरिकी लोगों को काउंटर पर नकद भुगतान करने के कष्ट से मुक्त रखकर खर्च करना ज्यादा आसान कर दिया। निम्न ब्याज-दर ने अमेरिकियों को बैंकों से दूर कर दिया और उन्हें वॉल स्ट्रीट में धकेल दिया।
परिणामस्वरूप वित्तीय परिसंपत्तियों में बैंक जमाराशियों का हिस्सा सन् 1978 में 57 प्रतिशत की तुलना में 1995 में घटकर 32 प्रतिशत रह गया और इसी अवधि में पेंशन तथा मुच्युअल फंडों का शेयर-बाजार में निवेश 20 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत शेयरों में लगाया।
मुख्यत: इन निधियों के जरिए, अमेरिकी परिवारों का वॉल स्ट्रीट शेयरों में निवेश सन् 1980 में 5.7 प्रतिशत की तुलना में सन् 1990 में बढ़कर 25 प्रतिशत हो गया और सन् 2001 में 52 प्रतिशत तक पहुंच गया। उनके वॉल स्ट्रीट शेयरों की वसूली न गई मूल्यवृद्धि ने उन्हें अवास्तविक दौलत का धनी बना दिया, जिसके आधार पर उन्होंने अपने दैनिक व्यय के लिए उधार लेना शुरू कर दिया।
बाद में यह लत इस हद तक पहुंच गई कि उन्होंने अपने घरों की मूल्यवृद्धि के द्वारा अवास्तविक धन के आधार पर और भी अधिक उधार लेने का रास्ता अपना लिया। इसी के फलस्वरूप बहुचर्चित सब-प्राइस संकट उत्पन्न हो गया है।
इसके अलावा नीची ब्याज-दर बचत के आड़े आने और शेयर मूल्यों में अनवसूली मूल्यवृद्धि से खर्च करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलने के कारण अमेरिका की बचत, जो 1970 दशक के उत्तरार्ध में कुल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का लगभग 8 प्रतिशत थी, घटकर नगण्य हो गई। अंतत: सन् 2004 में अमेरिकी बचत सन् 1930 में महामंदी के समय से पहली बार ऋणात्मक हो गई। लेकिन निम्न ब्याज इस विषम कहानी का केवल एक पहलू है।
(प्रभात प्रकाशन लि. द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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