आप खुद बनाते हैं अपने रास्ते
जोगिन्दर सिंह
नई दिल्ली, 25 दिसम्बर (आईएएनएस)। हम सभी के जीवन में ऐसी घटनाएं होती हैं, जब हम महसूस करते हैं कि हमसे गलती हो गई। बाद में परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि लगता है, वही सबसे सही था। 1960 में जब मैंने 20 वर्ष की उम्र में भारतीय पुलिस सेवा परीक्षा के लिए आवेदन किया तो मैसूर राज्य जो कि अब कर्नाटक हो गया है, को अपनी नौकरी के लिए पसंद किया।
अपने गृह राज्य पंजाब से दूर उस बात की कोई संभावना न थी कि कोई मुझ पर किसी सिफारिश को मानने का दबाव बनाएगा। मैंने यहां की स्थानीय भाषा कन्नड़ भी सीख ली। इससे भी ज्यादा मैंने इस जरूरत को पूरा किया कि व्यक्ति को स्वावलंबी होना चाहिए, क्योंकि वहां न तो परिवार के लोग थे न ही दोस्त थे जो मेरी मदद करते।
मुझे अपना जीवन खुद चलाना पड़ता था और यहां तक कि खाना भी बनाना पड़ता था। मैंने जो सबसे महत्वपूर्ण चीज सीखी वो ये थी कि जब आप मुश्किलों में अकेले होते हैं आप अपने रास्ते खुद ही बना लेते हैं। साथ ही कोई भी परेशानी इतनी बड़ी नहीं होती जिस पर विजय न प्राप्त की जा सके।
गलतियां किसी को बर्बाद नहीं करतीं, पर अपने आप पर तरस खाना आपको दुखी जरूर कर सकता है। जिस चीज से हमें अपने आप को बचाना चाहिए वो है कि हम पीड़ित की मानसिकता में न चले जाएं। खुद पर तरस खाने से आपका स्वाभिमान खत्म हो जाता है और आप अपना आत्मविश्वास भी खो देते हैं।
हमें ऐसी अवस्था से बचना चाहिए, क्योंकि ये हमारे अंदर के उत्साह को खत्म कर देती हैं। जो भी गलतियां हम करते हैं उनसे कुछ सीख प्राप्त कर हमें उसे अपने अनुभव के खजाने में रख लेना चाहिए। हमें अपनी बेहतरी एवं खुशी के लिए अपनी गलतियों पर पछताना बंद कर देना चाहिए और जिंदगी से सारे गिले-शिकवे खत्म कर देने चाहिए। पछताना, दुखी रहना एवं पीड़ित की तरह बर्ताव करना चीजों को ठीक करने में बिल्कुल भी मददगार नहीं होती है।
ऐसा संभव है कि ऐसी भावनाएं आपको न्यायोचित लगे, लेकिन अपने से पूछिए कि क्या ये चीजें आपके जीवन की बेहतरी के लिए मददगार हैं। इस चीज को बदलने की जरूरत है।
हम सभी पर निर्भर करता है, कि किसी समस्या को हम कैसे लेते हैं और उससे कैसे निपटते हैं या जीते हैं। साथ ही साथ हमें ये भी ध्यान रखना चाहिए कि हर विकल्प चुनकर सही परिणाम की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। यदि हम अपने हाथ आग में डालेंगे तो हाथ का जलना लाजिमी है।
कई लोग हैं जो अपने काम को पूरा न करने या बिल्कुल ही न करने के लिए कई बहाने जैसे समय नहीं था आदि का सहारा लेते हैं। विज्ञान, साहित्य या किसी भी क्षेत्र में महान सफलता हासिल करने वाले लोग जैसे शेक्सपियर, माइकल एंजलो, और वैज्ञानिक आइंस्टीन, सर सी.वी. रमन या रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि के पास भी भगवान के दिए उतने ही घंटे थे जितने मेरे और आपके पास हैं।
कभी-कभी सफल एवं असफल में यही अंतर होता है कि सफल व्यक्ति तब तक हार नहीं मानता, जब तक वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति न कर ले। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि उसके निमित्त लगातार प्रयास किया जाए। मुश्किलों का सीधे-सीधे मुकाबला किया जाना चाहिए। अधूरे मन से किए गए प्रयास अधूरे परिणाम ही लाते हैं। जो भी करना चाहते हैं उसे पूरे उत्सुकता एवं भाव से किया जाना चाहिए।
हमारी उत्सुकता ही इस बात की श्रेष्ठ परिचायक है कि हम अपने लक्ष्य को कितना महत्व देते हैं। जब हम अपने सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति कर लेते हैं तो हम सबसे अच्छा महसूस करते हैं। अपनी भावनाओं के स्रोत हम ही हैं और हम स्वयं अपनी प्रतिक्रियाओं एवं भावनात्मक प्रत्युत्तर के लिए जिम्मेदार होते हैं।
सच यह है कि आप अपनी भावनाओं के लिए दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते। हमारा मस्तिष्क हमारे जीवन को स्वर्ग या नरक बना सकता है जो कि इस बात पर निर्भर करता है कि यह किसी समस्या या लक्ष्य को कैसे लेता है और उसके लिए कैसे प्रयास करता है।
ज्यादातर लोग अपने माया के नहीं, बल्कि अपने दिमाग के गुलाम हैं। किसी समस्या को हल करने का तरीका हमारे दिमाग की उपज है। यदि आप किसी चीज को नहीं समझ पा रहे मगर इसकी तीव्र इच्छा है तो अपने आप से पूछिए कि आप इस बारे में क्या और क्यों महसूस करते हैं। इस बात पर भी चिंतन कीजिए कि ऐसी स्थिति कैसे उत्पन्न हुई और क्या इसे दूसरों पर थोपकर आप अपनी कमजोरियों को छुपा रहे हैं?
हम जो करते हैं या किया जाना चाहिए था, केवल उसी के लिए जिम्मेवार नहीं है बल्कि जो नहीं करते हैं उसके लिए भी जिम्मेवार हैं। कोई भी अन्य स्थिति आपके कृत्य के प्रति जबावदेही को खत्म नहीं कर सकती है।
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि., नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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