नैतिक गुणों से मिलती है स्थायी सफलता

नई दिल्ली, 22 दिसम्बर (आईएएनएस)। कहा जाता है कि कामयाबी नेक इंसान की नेक कोशिशों का परिणाम होती है। नेकनीयत और ईमानदारी को सफलता की पहली सीढ़ी भी कहा जाता है। नैतिक गुण व्यक्ति को सफलता का सही पात्र और उपभोगकर्ता बनाते हैं। अच्छे नैतिक गुण मिलकर जिस चरित्र की रचना करते हैं, वह सफलता के लिए ही बना होता है।

सफलता यदि नैतिक गुणों की बुनियाद पर खड़ी होती है तो उसमें स्थायित्व अपने आप आ जाता है। नैतिकता को आधार बनाते हुए किए गए एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि सफलता को केवल वे 50 फीसदी लोग ही आगे बढ़ा पाते हैं, जिनका चरित्र बेदाग होता है।

निष्कर्षो में यह भी पाया गया कि दागदार लोग भी सफल होते हैं, लेकिन एक दौर के बाद उनकी सफलता की चमक खो जाती है। वे खुद को अपराधी महसूस करने लगते हैं और पश्चाताप से पीड़ित रहते हैं। महान विद्वान आचार्य चाणक्य ने भी अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में सफलता के लिए चारित्रिक गुणों की जरूरत बताते हुए कहा है कि 'सफलता पाना सबके हाथ में है, उसे बनाए रखना चरित्रवान के हाथ में ही है। ठीक वैसे ही जैसे चोर को मिला खजाना उसे चोर ही बनाए रखता है जबकि ईमानदार आदमी को मिला खजाना उसे धनवान बना देता है।'

इस तथ्य को इस उदाहरण से समझें- रामेश्वर जैसे छोटे से कस्बे के एक अत्यंत निर्धन परिवार के बेटे का महान वैज्ञानिक और देश का राष्ट्रपति बनना चारित्रिक गुणों की बेहतरीन मिसाल है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के संदर्भ में कहा जा सकता है कि नैतिक गुण ही इंसान को श्रेष्ठ बन सकते हैं। नैतिक गुणों को ताक पर रखकर सफलता पाने वालों की तो कोई कमी नहीं है, लेकिन वे क्षणिक पुंज होते हैं, जबकि चरित्रवान होते हैं, चमकते सूरज।

इसका अर्थ है कि ज्यादातर लोग सफलता के लिए संघर्ष के रास्ते में चरित्र को अनुपयोगी मानते हैं, लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि इंसानी चरित्र ही उसकी सफलता की पहचान है। यदि आपका चरित्र अच्छा है तो आपको मेहनत करने में कोई शर्म नहीं आएगी। इसका मतलब यह भी है कि आपको योग्य बनने से कोई नहीं रोक सकता, और जब आप योग्य बन गए , तो सफलता पाना और उसे बनाए रखना कोई मुश्किल काम नहीं।

आर्थिक विश्लेषण :

बीसवीं सदी के मशहूर ब्रिटिश लेखक और चिंतक जार्ज बनार्ड शॉ ने अपनी किताब 'द ईंटेशनल थॉट' में एक जगह लिखा है, 'निश्चित रूप से दुनिया में पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और हर सफल व्यक्ति की आवाज से बोलता है, लेकिन इसमें संदेह है कि यह आवाज कभी बूढ़ी न हो।' इसी तरह गोस्वामी तुलसीदास ने भी साधक को साधन और साध्य से ऊपर बताते हुए कहा है कि सफलता साधक की साधना में होती है, साधन में नहीं।

हालांकि इससे भी इनकार नहीं कि सफलता की सोच के रास्ते में पहला कांटा आर्थिक संकट का चुभता है, लेकिन यदि लक्ष्य निश्चित हो और कर्ता को अपने ऊपर भरोसा हो तो अर्थ संकट का समाधान हो जाता है। दुनिया में ऐसे सैकड़ों उदाहरणों से किताबें भरी पड़ी हैं जो बताती हैं कि सफलता के दरवाजे की कुंजी धनवान के नहीं, जुझारू इंसान के हाथ पहले लगती है।

सफलता की सीढ़ियां धन के ढेर पर जाकर खत्म होती है, ऐसा प्रचारित जरूर किया जाता है, लेकिन यह सच्चाई सफल व्यक्ति ही जानता है कि उसके लिए धन महत्वपूर्ण है या सफलता का स्थायित्व। राजा से रंक बनने का समय कम होता जा रहा है और हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां वाकई सफलता के मायने ज्ञान, योग्यता, क्षमता और आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति है।

आर्थिक विश्लेषण का सटीक उदाहरण है 'यूरी शारापोवा' - यूरी शारापोवा को आज रूस ही नहीं पूरी दुनिया जानती है। वजह है उनकी बेटी और नंबर वन महिला टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा। आज से एक दशह पहले यूरी एक खाली जेब, असफल इंसान और एक होनहार बेटी के पिता के अलावा कुछ नहीं था।

बेटी को टेनिस जैसे महंगे खेल का प्रशिक्षण दिलाने के लिए उसे अपना फर्नीचर बेचना पड़ा और 400 डॉलर उधार भी लेने पड़े। लेकिन, आज कुछ ही सालों में शारापोवा परिवार के पास वह सब-कुछ है, जिसे देखकर ईष्र्या हो सकती है। यही नहीं, मारिया का खेल जम रहा है। उसका संघर्ष उसे स्थायी सफलता और ऐसा मुकाम दिला रहा है, जहां कई पैसे वाले नहीं पहुंच पाए।

कई भारतीय खिलाड़ियों के परिवारों ने भी अपनी संतानों को इसी प्रकार हर प्रकार का कष्ट सहकर आगे बढ़ने में सहायता दी। आज उन परिवारों को उनकी संतानों के कारण ख्याति मिली है।

इसका मतलब है कि पैसा सफलता के रास्ते की जरूरत है, लेकिन इसे सबसे बड़ी जरूरत मानना एक भ्रम है। लोग कहते हैं, पैसा हो तो सफलता मिलना क्या मुश्किल है, लेकिन सफलता को टिकाए रखने के लिए पैसे की नहीं, समझदारी की जरूरत होती है।

दुनिया में अब तक सफल हुए अधिकांश महान लोग अमीर नहीं थे लेकिन लगभग सभी ने संघर्ष से सफलता पाई थी, और त्याग किया था। सच्चाई भी है कि दुनिया धन की माया से ज्यादा त्याग के तप को पूजती है। पैसा जरूरी है लेकिन इसका अभिमान आपकी सफलता के पहिए को जाम कर सकता है। सहज बनें और सफलता के संघर्ष को न भूलें तो आपकी सफलता स्थायी रह सकती है।

सामाजिक-व्यापहारिक विश्लेषण :

दुनिया में सदियों से कई भ्रांतियां फैली हुई हैं कि फलां नस्ल के लोग ही तरक्की करना जानते हैं। कामयाबी फलां इलाके और फलां चमड़ी वाले लोगों की ही बांदी है। दुनिया के महानगरों और मझोले शहरों को छोड़ दें, तो आम तौर पर कस्बाई मानसिकता का यही मूल तत्व है कि छोटी जगह का आदमी सफल हो ही नहीं सकता। और, यही वह सफल हो भी गया तो ज्यादा दिन रह नहीं पाएगा।

इस सोच के ठीक उलट विचार देते हुए मशहूर समाजशास्त्री एच.जी. वेल्स कहते हैं कि समाज को सफल नहीं, काबिल लोगों की जरूरत ज्यादा है, क्योंकि हर सफल व्यक्ति सबसे पहले अपने संघर्ष का हर्जाना वसूलता है।

यदि वेल्स के नजरिए से देखें, तो विश्वविख्यात मोटिवेशनल गुरु डेल कारनेगी भी इससे सहमत हैं, और विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि आपने किसी लक्ष्य को सफल बनकर पाया है, तो मैं गारंटी नहीं दे सकता कि आप उसके लायक हैं या नहीं, लेकिन यदि सुयोग्य बनकर पाया है, तो मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि आप विजेता हैं। सामाजिक तथा व्यावहारिक दोनों ही दृष्टि से सफलता का स्थायित्व व्यक्ति विशेष के गुणों पर निर्भर करता है कि वह सफलता पाने और उसे स्थायी बनाने के लिए कितना समय देते हैं।

जैसे कि तीस साल पहले दादी बलसारा नागुपर में बीमा निगम के कर्मचारी थे। उनकी तनख्वाह थी 600 रुपए महीना। वे बीमा अधिकारी के रूप में सफल नहीं हुए तो स्कॉलरशिप पर साइकोलॉजी पढ़ने अमेरिका चले गए। इसके बाद वे भी असफल हुए तो उन्होंने टीवी कार्यक्रमों में भाग्य आजमाया। यहां भी असफल हुए तो मिनरल वाटर बेचना शुरू किया। आज वे 63 देशों में करीब 7 अरब डॉलर का विशाल व्यापार साम्राज्य संचालित कर रहे हैं।

दादी बलसारा के उदाहरण से समझा जा सकता है कि साधारण से विशेष बनने का गुर सिखाने वाले और आजमाने वालों में यही फर्क होता है कि एक सिर्फ बोलता है और दूसरा उसे व्यवहार बनाता है, फिर उसके बाद सफलता बोलती है। समाज और लोग हमेशा उन्हें डराते हैं, जिन्हें अपने ऊपर भरोसा नहीं होता, या जो कोई कोशिश करने से पहले अपनी कम और दूसरों की ज्यादा सुनते हैं। यदि इस आदत को व्यावहारिक प्रयासों से बदल लिया जाए, तो सफलता का स्थायी विजेता बनने से आपको कोई नहीं रोक सकता।

(लेखक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हैं। डायमंड बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता के मंत्र' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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