अपने भाग्य को कोसना छोड़ें

डॉ.रमेश पोखरियाल 'निशंक'

नई दिल्ली, 19 दिसम्बर (आईएएनएस)। महर्षि वेद व्यास ने कहा है, 'किया हुआ कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता, जैसे कर्म किए जाएंगे वैसा ही फल प्राप्त होगा।' कई लोग कहते हैं, मेरा तो भाग्य ही खराब है- ये शब्द अमूमन आपने सुने होंगे या कभी न कभी कहे भी होंगे, क्योंकि अक्सर जब हम कोई कार्य करना चाहते हैं, तो अचानक कोई घटना या संकट हमें यह कहने पर मजबूर कर देता है- मेरा तो भाग्य ही खराब है। तब हम परिस्थितियों को कोसने और दु:ख मनाने में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि उस पल मिली अच्छी यादों या खुशियों के बारे में सोचना भी भूल जाते हैं।

आइए, इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं। रवि को सोमवार की सुबह टूर पर पूरे एक सप्ताह के लिए बाहर जाना था। उसने अपनी सारी तैयारी (टिकट वगैरह) पहले से ही कर रखी थी, ताकि आखिरी समय पर भागदौड़ से बचा जा सके। इसलिए उसने रविवार रात को ही अगले दिन सुबह एयरपोर्ट जाने के लिए अपने शहर में उपलब्ध टैक्सी सेवा से सोमवार सुबह सात बजे की टैक्सी बुक करवाई और अलस्सुबह उठकर टैक्सी की हेल्पलाइन पर फोन कर टैक्सी की उपलब्धता सुनिश्चित कर ली।

अब देखिए कहानी में किस प्रकार उलटफेर होता है। सुबह सात बजे टैक्सी के कॉल सेंटर से फोन आता है कि वे टैक्सी उपलब्ध नहीं करवा सकते। बस हो गई भाग-दौड़ी शुरू, क्योंकि एयरपोर्ट पर रिपोर्टिग समय पर पहुंचना जरूरी था, नहीं तो फ्लाइट छूटने का डर था। खर, घर से टू व्हीलर निकाल उस पर अटैची तथा लैपटॉप बैग लाद एवं पीछे पत्नी को बैठा, भागा ऑटो रिक्शा स्टैंड की ओर और ऑटो पकड़ गंतव्य की ओर रवाना हुआ। पर जनाब, अभी यह उधेड़बुन खत्म कहां हुई। एयरपोर्ट से कुछ दूर पहले ट्रैफिक जाम था। ऑटो छोड़ रवि ने सामान उठाकर पैदल ही दौड़ लगाई और आखिरकार अपनी फ्लाइट पकड़ ही ली।

अभी कहानी यहां खत्म नहीं हुई। फ्लाइट अपने निश्चित समय पर रायपुर पहुंच गई और वहां से रवि को तिल्दा तक रेल से जाना था। अत: रायपुर एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन के लिए टैक्सी कर ली, जो कि बेहद आराम से निश्चित समय पर रेलवे स्टेशन तक पहुंच ही जाती, परंतु बीच में शायर किसी मंत्री का काफिला आ गया और चारों ओर से ट्रैफिक रोक दिया गया। ट्रेन छूटने का भय और रास्ते में पड़ते ट्रैफिक सिग्नलों ने रवि के दिल को धड़कन को बढ़ा दिया, क्योंकि ट्रेन छूटने का मतलब था पूरे सप्ताह के प्लान का बिगड़ना।

खर, सारी मुसीबतों से लड़ते-भिड़ते ट्रेन मिल गई, क्योंकि वह 10 मिनट की देरी से चल रही थी। ट्रेन में समान रखते हुए माथे का पसीना पोंछते हुए लंबी-सी सांस खींचकर रवि ने कहा, "थैंक्स गॉड, आई एम लकी।" चौंक गए न, क्योंकि रवि को तो कहना चाहिए था कि मेरा तो भाग्य ही खराब है। परंतु रवि का उन घटनाओं को देखने का नजरिया सकारात्मक था, क्योंकि इतनी विषम परिस्थितियों के होते हुए भी यदि आप सफलता प्राप्त कर लेते हैं, तो आपका भाग्य खराब नहीं है। आप तो बेहद भाग्यवान हैं। विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए लगातार आगे बढ़ते रहने वाला खुद को भाग्यवान मानता है और थककर बैठ जाने वाला खुद को दुर्भाग्यशाली।

आपके जीवन में आई कोई भी छोटी-बड़ी चुनौती ईश्वर द्वारा की गई केवल परीक्षा मात्र है, जिसमें सफलता प्राप्त करने वाला कहलाता है- भाग्यवान। अपने भविष्य और भाग्य के निर्माता स्वयं आप हैं। अत: नकारात्मक सोच को स्वयं से दूर रखकर हर विपरीत परिस्थिति में भी कुछ न कुछ सकारात्मक खोजें और कहें- मैं भाग्यवान हूं।

(लेखक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हैं। डायमंड बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता के अचूक मंत्र' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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