अच्छे बच्चे होते हैं सबसे पीछे
जोगिन्दर सिंह
नई दिल्ली, 18 दिसम्बर (आईएएनएस)। एक कहावत है कि आवाज करने वाले पहिये सारा ग्रीज ले लेते हैं और अच्छे बच्चे सबसे पीछे होते हैं। हर रोज हम ऐसी चीजें देखते हैं, जहां अच्छा बनने के चक्कर में हम टैक्सी दूसरों के लिए छोड़ देते हैं या अपनी सीट या छाता किसी और को देकर इंतजार करते हैं और कभी-कभी इंतजार ही करते रह जाते हैं। तब हम महसूस करते हैं कि ऐसा सही नहीं है।
अच्छा बनने में कोई बुराई नहीं है। मगर खतरा यह है कि यदि आप सबके लिए अच्छे हैं तो आप ऐसा अपने समय, ऊर्जा एवं कभी-कभी अपने पैसे के मूल्य पर कर रहे हैं। इसका मतलब है कि आप अपने लिए अच्छे नहीं हैं।
अंतत: स्वयं के लिए अच्छा न होना आपके लिए अहितकारक हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि दूसरों की बातों को सीधे जानने के बजाय उस पर विचार करें। आपको सदा दूसरों का हितकारी होने की आवश्यकता नहीं है। इतना मत झुकिए कि सबको खुश कर दें पर स्वयं को ही न कर पाएं।
सभ्य एवं विनम्र बनें पर ऐसी परपोषी रिश्ते से दूर रहें, जिसमें आप हमेशा देने का काम करते हैं। किसी भी रिश्ते की आयु लम्बी हो इसके लिए जरूरी है कि फायदा हर पक्ष को हो।
यदि आपसे कोई कुछ ऐसा करने को कहता है, जिसको लेकर आप असहज महसूस करते हैं तो आपको पूर्ण अधिकार है कि आप खेद प्रकट कर दें। मुझे कई कार्यक्रम, सेमिनार आदि में शामिल होने के आमंत्रण आते रहते हैं। मेरा पहला जवाब होता है कि मेरा कार्यक्रम मेरे निजी सचिव तय करते हैं।
मैं सलाह देता हूं कि आप लिखित या ई-मेल के जरिए अपना निवेदन भेज दें, मैं जवाब दे दूंगा। यह सलाह मुझे निवेदन को स्वीकारने या नकारने के फायदे-नुकसान सोचने का अवसर देती है और उसी तरह से मैं हां या ना कह देता हूं। आप एक समस्या पर चारों तरफ से विचार करके ही सही निर्णय तक पहुंच सकते हैं।
किसी भी मामले के हर पक्ष पर विचार करने के बाद ही आपको अपने अनुकूल क्या सही या गलत है, फैसला लेना चाहिए। किसी खास परिस्थिति में कुछ चीज जो दूसरों के लिए सही हो, ऐसा जरूरी नहीं है कि आपके लिए भी सही हो। इसलिए मामले की तह तक जाइए ताकि बाद में पछताना न पड़े।
आपको अपना दिमाग खुला रखना चाहिए और किसी भी स्थिति से अवगत होने के लिए प्रश्न पूछने चाहिए। यह केवल प्रश्न पूछना एवं उत्तर प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उसके जरिए आप स्थिति एवं दूसरों की सलाहों को पूरी तरह समझ सकते हैं।
कोई भी सर्वज्ञ नहीं हो सकता है। जिज्ञासु होने में कोई हर्ज नहीं है। यह आपको मामले को समझने में मदद करेगा। चूंकि हर मुद्दे पर हर किसी को अपनी राय होती है इसलिए आपकी भी अपनी सोच हो इसमें कोई हानि नहीं है। मगर आप खुला दिमाग रखें ताकि दूसरों की सुनें एवं चर्चा कर सही निर्णय पर पहुंच सकें। साथ ही साथ दूसरों के विचारों एवं सोच का आदर करें। प्रश्न पूछ कर ही आप किसी भी मसले को पूरी तरह समझ सकते हैं।
बगैर किसी शंका, गलत योजनाओं और गलत दोषारोपण के दिमाग किसी भी समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिए सर्वोत्तम है। कोई भी योजना या सिद्धांत पूर्णत: दोषरहित नहीं है। ये सभी संशोधन के पात्र हैं। हमारा दिमाग संकुचित सोच का स्थान नहीं होना चाहिए।
मूलत: आप को दूसरों के हर सुझाव को मानना बंद कर देना चाहिए जब तक आप उससे सहमत नहीं हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने तथाकथित बुद्धिजीविता एवं श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए हर किसी की बात को नकार देते हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर भी बहस करते हैं। कोई भी ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता क्योंकि वे गर्दन में दर्द की तरह व्यवहार करते हैं।
इस प्रकार बात करें कि आपकी असहमति का डर द्वेषपूर्ण या अप्रिय न लगे। लोगों को इस बात की छूट न दें कि वे आपका तिरस्कार कर सकें। आपको अपने लिए स्वयं खड़ा होना होगा। आप किसी और से आपके लिख खड़े होने की उम्मीद न करें। इस बात का ख्याल रखें कि आपके मित्र, सहकर्मी या वरिष्ठ आपको यूं ही न लें। यह अच्छी बात है कि आप अच्छे बनें मगर कोई भी रिश्ता दो-मुंही गाली है।
यदि आप हमेशा अच्छा बनने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि लोग अपना काम स्वयं न करके आप पर थोप देंगे। ऐसी सलाह सीधे-सीधे स्वीकार न करें। उनसे कहें कि आप देखेंगे कि यह आपके काम के बोझ एवं कार्यक्रम में कहीं फिट हो पाता है या नहीं। 1950 की अमेरिका की मशहूर नायिका मर्लिन मुनरो ने एक बार सही कहा था : पैट को नमस्कार करो, जैक को नमस्कार करो और खुद को नमस्कार करो, क्योंकि आप एक अच्छे बच्चे हैं।
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि. से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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