वास्तविक धन आखिर किसके हाथों में
नई दिल्ली, 12 दिसम्बर (आईएएनएस)। मान लीजिए कि 200 बिलियन डॉलर या 400 बिलियन डॉलर बचत राशि का 50 प्रतिशत बचतकर्ताओं द्वारा सीधे ही या पेंशन या अन्य निधियों के माध्यम से शेयरों में लगा दिया जाता है और 50 प्रतिशत को उपभोग के खर्च में डाल दिया जाता है।
शेयर बाजार में 200 बिलियन डॉलर का नया निवेश होने से शेयरों के मूल्यों और बाजार सूचकांक में उछाल आ जाएगा या कंपनियों की तिजोरियां नए स्टॉक में अंशदान की सीमा तक भर जाएंगी। इसके फलस्वरूप बाजार में शेयरों के लिए अतिरिक्त मांग उत्पन्न होगी और इससे शेयर मूल्यों तथा सूचकांक में बढ़ोतरी होगी।
इस तरह शेयरों में नए निवेश से उच्चतर, लेकिन मन में परिवर्तित न किए गए शेयर मूल्यों के रूप में कल्पित धन कई गुणा हो जाता है। फिर 200 बिलियन डॉलर के अतिरिक्त उपभोग से व्यय भी कई गुणा बढ़ जाता है, जिसका श्रेय डॉलर के उच्च संचलन वेग को जाता है। डॉलर के वर्तमान संचलन वेग को देखते हुए, जो 10 या उससे अधिक हो सकता है, यानी एक वर्ष में डॉलर जितनी बार एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है - 200 बिलियन डॉलर का खपत व्यय कंपनियों के लिए दस गुणा यानी 2,000 बिलियन डॉलर (200 बिलियन डॉलर गुणा 10) की कुल आय में परिणत हो जाता है।
मान लें कि अगर बिक्री पर 10 प्रतिशत लाभ प्राप्त होता है, तो 2,000 बिलियन डॉलर की कुल आय पर कंपनी का कर-पूर्व लाभ 200 बिलियन डॉलर होगा। चूंकि इसका एक-तिहाई कर भुगतान में चला जाता है, कर-पश्चात लाभ 133 बिलियन डॉलर होगा। अमेरिका के शेयर बाजार में प्रति शेयर मूल्य-अर्जन अनुपात का अंकगणितीय औसत 16 लिया जाए, तो इसके फलस्वरूप शेयर मूल्यों में 2.133 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर की वृद्धि हो जाएगी।
अत: शेयर बाजार में पूंजी के रूप में लगाई गई और कंपनियों के लिए आय के रूप में 400 बिलियन डॉलर की राशि का एक गुणक प्रभाव होता है, जो कल्पित धन को वास्तविक से कई गुणा बढ़ा देता है। लेकिन इस खेल का चरम बिंदु तो अभी आना है। वास्तविक धन जो कई गुणा कल्पित धन में परिणत होता है, पुन: वास्तविक धन में बदल दिया जाता है, जैसे कि कोई जादुई छड़ी का कमाल हो।
ऐसा परिसंपत्ति मूल्य-आधारित उधार के कारण होता है, जहां उधार लेने वाला कल्पित मूल्यों को जमानत के रूप में पेश करता है, ताकि वह उधार ले सके, उपभोग पर अधिक खर्च करने या शेयरों में निवेश करने के लिए ज्यादा कर्ज हासिल कर सके।
इसके फलस्वरूप उधार लिए गए वास्तविक धन का कल्पित धन में गुणन का एक और चक्र, एक और सिलसिला आरंभ हो जाता है। इस गुणन-खेल में कल्पित और वास्तविक मूल्यों के बीच अंतर मिट जाता है। इसका परिणाम होता है - सब-प्राइम संकट तथा वैसा ही कुछ और।
कपंनी नियंत्रण :
वास्तविक धन आखिर किसके हाथों में बढ़ता है? उन परिवारों में नहीं, जिनका धन दांव पर लगा होता है और न ही यह उनके लाभ के लिए होता है। फेड योजना या चाल यह सुनिश्चित करती है कि वह धन-दौलत अमेरिकी कंपनियों के पास और उनके नियंत्रण में ही रहे। आंकड़ें बोलते हैं कि सन् 1960 से 1980 तक, राष्ट्रीय बचतों में अमेरिकी परिवारों का हिस्सा 70 प्रतिशत होता था और शेष 30 प्रतिशत कंपनी बचत का था।
सन् 1980 वाले दशक के आरंभ में परिवारों का हिस्सा बढ़कर 80 प्रतिशत से भी अधिक हो गया तथा कंपनी क्षेत्र का हिस्सा केवल 20 प्रतिशत रह गया। यह बात तब की है जब फेड की ब्याज दरें चोटी पर थीं - अधिकतर 10 प्रतिशत से ज्यादा, ताकि परिवारों को बचत करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
मुद्रास्फीति दर 1 प्रतिशत होने के बावजूद फेड ने सन् 1987 लागू 6-7 प्रतिशत की ब्याज-दरों को सन् 1989 में बढ़ाकर 9 प्रतिशत और उससे भी अधिक कर दिया। सन् 1990 में फेड दर 7-8 प्रतिशत थी, पारिवारिक बचत का हिस्सा 71 प्रतिशत था और कंपनी का हिस्सा 29 प्रतिशत।
बस यहीं से शुरू होती है नई योजना, नई चाल। फेड ब्याज-दरों में धीरे-धीरे कमी करता जाता है और सन् 2002 में ब्याज-दर को मात्र 1 प्रतिशत पर ले आता है। इसके फलस्वरूप पारिवारिक बचत का हिस्सा 71 प्रतिशत से घटते-घटते सन् 2006 में ऋणात्मक हो जाता है, यह 22 प्रतिशत ऋणात्मक रह जाता है। इन ऋणात्मक आंकड़ों से पता चलता है कि अमेरिकी परिवारों ने अपनी आय से 22 प्रतिशत अधिक खर्च किया, जिसका मतलब है कि वे उधार पर जी रहे थे।
इस अवधि के दौरान कंपनियों की कुल बचत का हिस्सा सन् 1990 में 30 प्रतिशत की तुलना में 2006 में बढ़कर राष्ट्रीय बचत का 122 प्रतिशत हो गया। कंपनी अधिशेष में आया 22 प्रतिशत अतिरिक्त धन का स्रोत प्रत्यक्षत: उस ऋण में है जो परिवारों ने कंपनी वस्तुओं एवं सेवाओं पर खर्च किया है।
वास्तव में, अमेरिकी परिवारों की बचत की जो कुल रकम सन् 1990 में 299 बिलियन डॉलर थी, वह शून्य तक आ गई और फिर सन् 2006 में 112 बिलियन डॉलर के नकारात्मक आंकड़ों तक पहुंच गई। इसके मुकाबले कंपनी बचत, जो सन् 1990 में 123 बिलियन डॉलर थी, सन् 2006 में गगनचुंबी वृद्धि के साथ 512 बिलियन डॉलर की विशाल राशि तक पहुंच गई।
इस अवधि के दौरान अमेरिकी परिवारों का क्रेडिट कार्डो पर उधार सन् 1987 में 686 बिलियन डॉलर की तुलना में सितंबर, 2006 तक बढ़ते-बढ़ते 2,339 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। नतीजा? सन् 1990 से 2006 के बीच पारिवारिक बचत में 138 प्रतिशत की कमी आई और उनके कर्ज में 341 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन कंपनियों की बचत 416 प्रतिशत बढ़ गई।
इन आंकड़ों का मतलब समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका के लिए और विश्व के लिए इसका क्या अर्थ है, यह अपने आप में एक विषय है। निष्कर्षत: यू.एस. फेड ने अमेरिकी कंपनियों को धनाढ्य बनाने की खातिर अमेरिकी परिवारों को दिवालिया बना दिया है। यह न केवल पारिवारिक धन के साथ, बल्कि परिवार की मूल धारणा के साथ किया जा रहा छल है।
(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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