प्रति घंटा अवमूल्यित हो रहे वचन-पत्र
एस. गुरुमूर्ति
नई दिल्ली, 5 दिसम्बर (आईएएनएस)। पांच साल पहले 86 अमेरिकी सेंट देकर एक यूरो खरीदा जा सकता था। आज एक यूरो की कीमत 147 सेंट हो गई है। जब एक परिवार अपनी आय से अधिक व्यय करता है, उसे 'व्यष्टिवादी-आर्थिक व्यवहार' कहते हैं। लेकिन जब वह सार्वजनिक रूप ले लेता है, तो वह 'समष्टिवादी-आर्थिक विषय' बन जाता है। इसका दूसरा कारण यह भी है कि ऐसे देश में घरेलू बचत नहीं होती है और उसे पारिवारिक उपभोग संबंधी आयात के लिए भुगतान करने के लिए बाहरी देशों से उधार लेना पड़ता है।
अमेरिका में यही हुआ है। यह एक योजना के तहत हुआ, न कि किसी अप्रत्याशित घटना के कारण। एलन ग्रीनस्पैन लगातार 27 साल तक यू.एस. फेड के प्रमुख रहे और इस अवधि में फेड ने वहीं नीतियां बनाई, जो उपर्युक्त उद्देश्य को पूरा कर सकें। फेड की नीतियों ने घरेलू वस्तुओं की बाध्य खरीद को बढ़ावा देकर आर्थिक शक्ति को परिवारों से छीनकर कंपनियों की झोली में डाल देने का काम किया।
इन नीतियों का सीधा-साधा असर यह हुआ कि संघीय सरकार को राज्य-संगठित सामाजिक सुरक्षा के जरिए घरेलू जिम्मेदारियों को संभालना पड़ा। यह एक बड़ी ही दिलचस्प, यहां तक कि दिल दहला देनेवाली कहानी है, क्योंकि यू.एस. फेड वास्तव में आज विश्वव्यापी वित्त व्यवस्था के लिए केंद्रीय बैंकर बन गया है, जिसकी नीतियों को अनेक देशों ने अपना लिया है या अपनाने के लिए उन्हें बाध्य कर दिया गया है। यह भी अपने आप में एक अलग विषय है।
बचत घाटा :
आइए देखें, यू.एस. फेड ने किस तरह का यह परिणाम हासिल किया। सन् 1981 से सन् 2001 तक 20 साल की अवधि में ब्याज-दरों में बार-बार कटौती करके, ब्याज-दरों को 20 प्रतिशत से 1 प्रतिशत तक लाकर यू.एस. फेड ने परिवारों को जरूरत-बेजरूरत खरीदारी करने का आदी बना दिया। ब्याज-दर 1 प्रतिशत हो जाने से अमेरिकी परिवारों के लिए बचत करना बेमानी हो गया। अत: कोई आश्चर्य नहीं है कि ऐसी स्थिति के चलते उन्होंने अपनी आय से अधिक खर्च करना उचित समझा।
नतीजा? अमेरिकी बचत दर, जो सन् 1970 के दशक में, सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले 18 प्रतिशत थी, सन् 1990 में घटकर पहले तो 9 प्रतिशत पर आ गई, फिर सन् 1996 से 2005 तक 10 साल की अवधि में उसका औसत 2.8 प्रतिशत रह गया, और अंतत: सन् 2006 में यह 0.6 प्रतिशत के ऋणात्मक अंक तक पहुंच गई। ब्याज-दर में भारी गिरावट की प्रवृत्ति ने सीधे ही परिवारों को प्रभावित किया और वे उधार लेकर खर्च करने के आदी हो गए।
अमेरिकी परिवारों का क्रेडिट कार्ड संबंधी कुल उधार सन् 1990 में 338 बिलियन डॉलर था, जब फेड की ब्याज-दरें 8 प्रतिशत के आस-पास थीं। लेकिन सन् 2003 में, जब फेड की दर 1 प्रतिशत हो गई, क्रेडिट कार्डो का उधार बढ़कर 1.5 ट्रिलियन तक पहुंच गया। आज क्रेडिट कार्डो पर कहानी का अंतिम भाग का कुल उधार 2.46 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। इस समय 1.2 अरब क्रेडिट कार्ड उपयोग में हैं। एक औसत अमेरिकन आदमी 13 हजार के कर्ज में फंसा है। उसके पास नौ क्रेडिट कार्ड हैं और कार्ड की और कर्ज की चार किस्तें देनी होती हैं। उन्हें इस लत से छुटकारा दिलाना बहुत कठिन है। केवल पंद्रह सालों में उसने अपना सारा धन कंपनियों को दे दिया है और वह भारतीय किसानों की तरह कर्ज में डूब चुका है।
वॉल स्ट्रीट की सनक :
ब्याज दर में कमी के दूसरे प्रभावों की चर्चा के बिना यह कहानी अधूरी रहेगी। फेड के ब्याज दर में कटौती करने के साथ अधिक-से-अधिक अमेरिकी परिवारों ने बेहतर लाभ के लिए अपनी बचत का पैसा शेयर बाजार में लगाना शुरू कर दिया। 1981 में जब फेड रेट 20 प्रतिशत था, केवल 5.7 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों के पास शेयर थे।
1990 में ब्याज दर घटकर 8 प्रतिशत हो जाने पर 25 प्रतिशत परिवार वॉल स्ट्रीट जाने लगे। 2001 में फेड ने ब्याज दर 1 प्रतिशत कर दी तो यह बढ़कर 52 प्रतिशत हो गए, यानी 20 साल में 10 गुना। परिवारों के पास जो शेयर थे, बाजार में बाजार में उनका मूल्य बढ़ जाने के साथ ही उन परिवारों ने शेयरों के अनवसूले एवं अवास्तविक मूल्यों पर उधार लेकर ज्यादा खर्च करना शुरू कर दिया। यह अप्राप्त परिसंपत्ति आधारित उधार देने और खर्च करने की प्रवृत्ति वर्तमान आय से अधिक खर्च करने का एक और कारण है।
घरेलू मूल्यों में वृद्धि, जैसे कि शेयर मूल्यों में वृद्धि ने भी परिवारों को कर्ज लेने और खर्च करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। इससे अमेरिका में सब-प्राइम संकट उत्पन्न हो गया। अत: ऐसा लगता है कि यू.एस. फेड की उस नीति ने अपना काम पूरा कर दिखाया, जिसका उद्देश्य धन को परिवारों की जेब से निकालकर कंपनियों के हाथों में देना और पारिवारिक जिम्मेवारी को परिवारों से हटाकर सरकार के ऊपर डालना था।
व्यापार उदारीकरण :
फेड की आय से अधिक व्यय संबंधी नीति ने घरेलू मुद्रास्फीति का जोखिम उठाया। इसके विरुद्ध जोखिम-मुक्ति के लिए अमेरिकी सरकार को उदारता से आयात करने, आयात शुल्क-दरों में कटौती करने और अमेरिका में विदेशी माल के आयात को सस्ता बनाने का कदम उठाना पड़ा। इस प्रकार व्यापार उदारीकरण एक विश्वव्यापी दायित्व की अपेक्षा अमेरिका की घरेलू बाध्यता अधिक बनगया, भले ही अमेरिका इसे स्वीकार करे या न करे। देय राशि 2.46 लाख करोड़ डॉलर (ट्रिलियन) से ऊपर है और इस्तेमाल किए जा रहे क्रेडिट कार्डो की संख्या 1.2 अरब।
आंकड़े बहुत चौंकानेवाले हैं। सन् 1990 से 1999 तक 10 वर्ष की अवधि में अमेरिका का कुल घाटा 300 बिलियन डॉलर था।
बाद के पांच साल में, यानी सन् 2000 से 2004 तक की अवधि में ही कुल घाटा 2.5 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया - पिछले दस वर्ष के कुल घाटे के आठ गुणा से भी ज्यादा। मतलब यह कि 2000-2004 तक पांच वर्ष के दौरान अमेरिका ने अपने चालू खाता घाटे को निपटाने के लिए दूसरे देशों से 2.5 लाख करोड़ डॉलर का कर्ज लिया।
अमेरिकी खपत की फंडिंग :
अमेरिका अपने जिस चालू खाता घाटे को संभालने के लिए विश्व भर की बचत का लगभग तीन-चौथाई उधार लेता है, जबकि उस बचत में दो-तिहाई हिस्सा एशिया का होता है - उस घाटे को विशेषज्ञ लोग मात्र एक 'सार्वभौमिक असंतुलन' मानकर खारिज कर देते हैं। अधिक निकट से देखें तो पता चलता है कि यह अमेरिकी घरेलू असंतुलन है, जो विश्व के संतुलन को बिगाड़ रहा है।
जी हां, यह सही है कि आज अमेरिका की खपत विश्व की अर्थव्यवस्था को चलाती है। लेकिन अमेरिकी खपत का निधीयन कौन करता है? वही देश जो अमेरिका को माल बेचते हैं, जैसे कि चीन और जापान, कोरिया और ताइवान, मलेशिया और इंडोनेशिया, हांगकांग और सिंगापुर, अंतत: भारत भी। उनका डॉलर भंडार अमेरिका को उधार दी गई धनराशि का प्रतीक है, ताकि अमेरिका उनसे वस्तुओं की खरीद कर सके, ठीक वैसे ही जैसे कोई दुकानदार अपने ग्राहकों को धन उधार दे और कहे कि वे उसका माल खरीदें। यह वास्तव में और भी बुरी बात है। यह तो ग्राहक के वचनपत्रों पर अपना माल उधार बेचनेवाले दुकानदार जैसा ही है।
आखिरकार, दूसरे देशों के पास 3.8 लाख करोड़ डॉलर की जो प्रतिभूतियां हैं, वे अमेरिका के मात्र वचन-पत्र (प्रो-नोट) ही तो हैं। अत: अमेरिका को जिन देशों ने माल या प्रतिभूतियों का निर्यात किया, उनके हाथ में अब तक जमा हुए 3.8 लाख करोड़ डॉलर के सिर्फ वचन-पत्र हैं। क्या वे अदत्त विक्रेता नहीं हैं, अर्थात् ऐसे विक्रेता जिन्हें भुगतान नहीं किया गया है? उनके पास जमा वचन-पत्रों का मूल्य यूरो, स्वर्ण, तेल और रुपए के मुकाबले में भी हर दिन कम होता जा रहा है।
(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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