घर-परिवारों को दिवालिया बनाने की तरकीब

नई दिल्ली, 4 दिसम्बर (आईएएनएस)। अमेरिकन टेलीविजन गेम शो 'दि प्राइस इज राइट' पर धन को कई गुणा करने का एक खेल दिखाया जाता है, जिसे 'ग्रैंड गेम' कहा जाता है। इसमें हर रोज 10,000 डॉलर की राशि दांव पर लगाई जाती है। यह एक जुआ है - मानवजाति का चिर-परिचित प्राचीनतम खेल। ऐसा ही एक खेल और भी है, लेकिन वह खेल आधुनिक है।

अमेरिका के लाखों-करोड़ों परिवार इस खेल के शिकार हैं और इसमें लाखों-करोड़ डॉलर दांव पर लगते हैं। वह यू.एस. फेड नीति द्वारा चलाया गया एक खेल है, जिसमें पहले तो वास्तविक धन को कल्पित धन के रूप में कई गुणा किया जाता है और फिर इसे वास्तविक, लेकिन उधार लिए गए धन के बदले गिरवी रखकर बहुगुणित कल्पित धन को वास्तविक धन में बदल दिया जाता है।

इस नए खेल का एक और पहलू है। 'ग्रैंड गेम' में जो खिलाड़ी अपना धन दांव पर लगाता है, वह बहुत कुछ जीत सकता है या लगाई गई अपनी बाजी हार सकता है, लेकिन फेड के धनवर्धक खेल में मैच का फैसला पहले से ही तय होता है। अपना धन दांव पर लगाने वाले खिलाड़ी, यानी अमेरिकी परिवार को हारना ही होता है, और किसी अन्य - जीत के लिए पहले से ही चुनी गई - अमेरिकी कंपनी - को अवश्य ही जीत हासिल होती है।

अमेरिका में खेला गया यह खतरनाक खेल सभी अन्य देशों को विश्वव्यापी वित्तीय एकीकरण के एक हिस्से और एक सार्वदेशिक आदर्श या उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा है। प्रत्यक्ष में कहानी यह है कि घर-परिवारों को दिवालिया बनाने वाली और कंपनियों को धनाढ्य करने वाली फेड नीति के कुचक्र को किस प्रकार आधुनिक अर्थशास्त्र के उत्तम एवं परिष्कृत उद्देश्य के रूप में आगे बढ़ाया जाता है।

पिछले दशक में, विशेषकर 1990 के दशक के आरंभ में वैश्वीकरण की शुरुआत के साथ ही लगता है यू.एस. फेड ने अमेरिकी परिवारों के धन को संभालने के लिए कंपनियों को मुख्य माध्यम के रूप में चुन लिया था। अमेरिकी कंपनियों के बारे में बैंक के लिए तर्काधार शायद यह था कि परिवार अपने धन, अपनी धन-संपत्ति, को दोगुना-चौगुना नहीं कर सकते, जबकि कंपनियां कर सकती हैं।

धन बहुगुणित करने वाले

सामान्य गृहस्थ धन की सिर्फ बचत करते हैं, उसमें कई गुणा वृद्धि करने के बारे में नहीं सोचते। लेकिन कंपनियां जानती हैं कि धन को दोगुना-चौगुना कैसे किया जाता है। धन को बहुगुणित करने की यू.एस. फेड नीति-संचालित जॉन मेनार्ड केन्स द्वारा प्रतिपादित की गई यह योजना वास्तविक, न कि कल्पित धन गुणक योजना से बहुत अलग थी। नए खेल या कहें कि नई चाल की लघुकथा अब शुरू होती है।

मान लो कि फेड की ब्याज-दर 10 प्रतिशत है और यह कि उस दर पर अमेरिकी परिवार 400 बिलियन डॉलर बचाने की क्षमता रखते हैं। 400 बिलियन डॉलर की यह राशि कोई काल्पनिक संख्या नहीं है। यदि अमेरिकी परिवारों की बचत का हिस्सा कुल का 80 प्रतिशत जारी रहता, जैसा कि सन् 1980 के आरंभ में था, तो फेड की 10 प्रतिशत ब्याज-दर के हिसाब से इस बचत की रकम सन् 2006 में 400 बिलियन डॉलर हो जाती, ठीक वैसे ही जैसे सन् 1980 के दशक में हमने माना। उस स्थिति में अमेरिकी परिवारों ने 400 बिलियन डॉलर की अपनी इस बचत का अधिकांश हिस्सा सुरक्षित एवं निश्चित दर के निवेशों में रखा होता।

कहानी का अगला अंक अब शुरू होता है। फेड दर ब्याज-दर में कटौती करता है और मान लो, ब्याज-दर को 1 प्रतिशत या 2 प्रतिशत कर दिया जाता है, जो दर सन् 2002 से 2004 तक था - तो इसका मतलब होगा बचत करने वालों को दूर करना और खर्च करने वालों को न्योता देना। अमेरिकन लोग जापानियों की तरह नहीं है, जो कोई ब्याज न मिलने पर भी बचत करेंगे। अमेरिकावासी ब्याज की बहुत कम दरों को स्वीकार करने के बजाय बचत की अपेक्षा खर्च करना अधिक पसंद करते हैं। और जो थोड़ा-बहुत वे बचा पाते हैं, उसको वे बैंक में नहीं रखते बल्कि बड़ी कंपनियों के शेयरों में निवेश करते हैं, ताकि जोखिम के बावजूद अधिक लाभ मिल सके। पेंशन तथा अन्य निधियों के जरिए उनकी अप्रत्यक्ष बचत का अधिकांश हिस्सा भी शेयरों में निवेश हो जाता है।

अमेरिका सरकार द्वारा शासन के नियंत्रणाधीन दी जाने वाली सामाजिक सुरक्षा भी घर-परिवारों को संकट की घड़ी के लिए बचाकर रखने की उनकी पारंपरिक आवश्यकता से भी मुक्त रखती है और उन्हें अपनी बचत के साथ जोखिम उठाने लायक बनाती है। अत: फेड की निम्न दर व्यवस्था के चलते परिवारों को बचत करने और बैंक में रखने की आदत ही नहीं पड़ी और इसका नतीजा यह हुआ कि वे जो कुछ बचा पाते, उसे भी बड़े-बड़े बाजारों, शॉपिंग सेंटरों में जाकर खर्च कर देते हैं, जिनके जरिए लोगों का धन कंपनियों के रिजर्व में पहुंच जाता है और उनकी आय में शामिल हो जाता है और उनकी पूंजी में चला जाता है या वाल स्ट्रीट के माध्यम से बाजार पूंजीकरण के रूप में खप जाता है। परिवारों की जेब से निकाला गया धन कंपनियों के जरिए किस तरह बढ़ता है और किसके लाभ के लिए?

(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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