जेपी भूदान में कैसे गए

नई दिल्ली, 25 नवंबर (आईएएनएस)। जेपी के साथ मेरा 1946 से भावनात्मक स्तर पर लगाव रहा। 1946 में ही उन्होंने चांदनी चौक पर एक भाषण दिया था कि हम पार्टिशन नहीं मानेंगे, हम जद्दोजहद करेंगे, हम आंदोलन चलाएंगे, हम सत्याग्रह करेंगे। उस समय वे एक ट्रेड यूनियन नेता थे। 1947 में वेतन आयोग आया। ऑल इंडिया रेलवे मेन फेडरेशन के अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने भारतवासियों को जो सीख दी उससे अपने आप किसी को भी उनके प्रति आस्था हो सकती थी।

जेपी के साथ कभी उस तरह हल्के तौर पर बातें नहीं हुईं, जैसा राममनोहर लोहिया के साथ होती थीं। जेपी नखरेबाज नहीं थे, रूढ़ नहीं थे जैसा कि पं नेहरू को कहा जाता है। लोहिया के साथ कभी-कभी हंसी मजाक भी हुआ करता था। जेपी के साथ कोई भी बात संजीदगी से होती थी।

1948 में हिंदू मजदूर सभा की स्थापना के बाद जेपी कई राज्यों में सोशलिस्टों की सरकार बनाना चाहते थे। केरल जो उस समय त्रावणकोर ही था, में चुनाव हुआ। कालीकट में जेपी की सभा में उस समय एक लाख लोग जमा हुए थे। स्वतंत्रता सेनानी थानुपिल्ले सोशलिस्ट पार्टी के बड़े नेता थे। पर चुनाव के बाद परिणाम विपरीत निकला।

1956-57 में जब त्रावणकोर में थानुपिल्ले के मुख्यमंत्री काल में पुलिस फायरिंग में कुछ लोग मरे तो हम लोगों ने सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उसी समय मैं, रविराय, लोहिया, मधुमिलए, प्रेम भसीन जार्ज फर्नाडिस आदि ने एक अलग पार्टी सोशलिस्ट बना ली। इसके पहले प्रजा सोशलिस्ट पार्टी थी।

जेपी इस बात से दुखी हो गए। राजनीति से अलग होकर भूदान में चले गए। अशोक मेहता कांग्रेस में चले गए। एक बार 1965-66 में राम मनोहर लोहिया ने जेपी से कहा कि जयप्रकाश कुछ करो। तुम आज भी हिंदुस्तान को हिला सकते हो। तुममे अभी भी वह दमखम है, इस तरह चुपचाप रहने से काम नहीं चलेगा। मेरा तो कुछ नहीं है। मैं तो अकेला हूं। तब जेपी ने हंसकर कहा भी था कि मेरा भी क्या है तब लोहिया ने उनसे कहा कि तुम्हारे पास प्रभावती तो है। मेरे पास तो वह भी नहीं है। यह भी एक क्षण है जब मैं जेपी के साथ ही था। डॉ. लोहिया की मृत्यु के बाद जेपी ने कहा था - कि राममनोहर तुम वहां आ गए जहां मुझे होना चाहिए था।

पंजाब में मेरे पिता भीमसेन सच्चर मुख्यमंत्री थे। वहां इलेक्टोरल मूवमेंट चला जिसका नेतृत्व उन्होंने ही किया था। जेपी उनके अभिन्न मित्र थे। जेपी ने इस आंदोलन को बहुत आगे बढ़ाया। फिर जेपी जब दिल्ली आए तो सच्चर साहब के साथ बैठक हुई। जेपी का रात में फोन आया कि इंदिरा से मिलने का समय हो गया है। कल शाम का समय तय हुआ है।

सच्चर जी भी बैठक में जेपी के साथ गए। जेपी ने इंदिरा गांधी से कहा कि गुजरात की हालत ठीक नहीं है। वहां की सरकार को समाप्त कर दो। जेपी इंदिरा जी के हाथों ही वहां की सरकार गिराना चाहते थे पर वे नहीं मानीं। 1977 में ओखला में एक बड़ी मीटिंग हुई। उस समय पूरे देश में तूफान था। जेपी को कई मायनों में जनता अपना नेता मानती थी। पंजाब में तो एक दफा लंबाई के कारण इन्हें ज्यादा भाव मिलने लगा था। लोहिया की सभा के बाद जब जेपी आए तो लोगों ने कहा कि नेता को ऐसे लम्बा होना चाहिए, चूंकि लोहिया छोटे कद के थे।

जेपी इेलेक्टोरल रिफार्म, सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी की बात कहा करते थे। युवाओं के बारे में उनकी सोच थी कि युवा ही देश को बदल सकते हैं। संपूर्ण क्रांति में भी यही मूल बात थी। वे मानवता पर बहुत जोर देते थे। हिन्दुस्तान की व्यवस्था पर उन्होंने उस समय एक लम्बा लेख लिखा था कि अगर नमक अपना स्वाद छोड़ दे तो फिर उसे कौन पूछेगा। इसी प्रकार यदि इन्सान बदलेगा तो उसे कौन पूछेगा।

जेपी में मानवता कूट-कूट कर भरी थी। जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इंदिरा गांधी को कुछ डर सा हो गया था। वे दिल्ली में ही रहना चाहती थीं। उस समय संजय गांधी ने एक फॉर्म हाउस खरीदा था। जेपी खुद इंदिरा से मिलने गए। वे उन्हें बेटी की तरह मानते थे। जेपी ने मोरार जी देसाई से कहा कि इंदिरा को सफदरजंग में ही रहने दिया जाए। उस समय कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया था। जेपी का यही दिवानापन उन्हें हर किसी का अपना बना देता था।

जनता पार्टी के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री चुना जाना था। मधु दण्डवते और जार्ज, जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे। आपातकाल के विरोध में वोट मिला था। मोरारजी देसाई के काम करने का अपना अलग ढंग था। राजनारायण चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री चाहते थे। मोरारजी ने जोर डलवाया। बुजुर्गियत की बात की और उन्हें अंतत: प्रधानमंत्री बना दिया गया। फिर राष्ट्रपति के चुनाव के समय जेपी अच्युत पटवर्धन को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे पर मोरार जी इंदिरानी रहमान को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। रहमान भरतनाट््यम की अंतर्राष्ट्रीय डांसर थी और फिर समय ने ऐसा मोड़ लिया कि तीसरा व्यक्ति नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति हो गए।

जेपी आंदोलन जिस बात को लेकर चला, वह सफल नहीं हो सका। जेपी इससे काफी दुखी थे। जिस कार्यक्रम के तहत आंदोलन हुआ, पार्टी बनी, फिर सरकार बनी वही कार्यक्रम बाद में बदल गया। जेपी में सबसे खास बात थी कि वे कभी नहीं चाहते थे कि उन्हें कोई जबरन इज्जत दे, उनके पास आए। ऐसी महत्वाकांक्षा उनके पास बिल्कुल नहीं रही। 1979 में उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया। वे दुखी रहने लगे थे। कई लोगों से उन्होंने इस बात का जिक्र भी किया था। जो लाग उनसे मिलते थे उनसे वे हाल चाल पूछते थे। वे राजनीति को समाज का ऐसा हिस्सा मानते थे जिसके इर्द गिर्द सभी कुछ घूमता है। आज वे होते तो देश में कुछ भी हो सकता था।

(डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. से प्रकाशित पुस्तक 'जे.पी. जैसा मैंने देख्रा' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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