बिहार आंदोलन में कैसे आए जेपी

नई दिल्ली, 23 नवंबर (आईएएनएस)। जेपी के जीवन को तीन हिस्सों में देखा जा सकता है। पहला हिस्सा है जब जेपी क्रांतिकारी छवि वाले थे। दूसरा हिस्सा है जब वे सर्वोदयी दिखते थे। तीसरा हिस्सा है जिसमें वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण माने गए। इसी हिस्से में जेपी वियोगी के रूप में हैं। उस वियोगी जेपी की लम्बी कहानी है। उसका फिलहाल एक छोटा सा हिस्सा आपके सामने है। यह पूरी तस्वीर नहीं है, उसका एक पहलू है।

बिहार आंदोलन पर भरपूर साहित्य उपलब्ध है। जेपी की जन्मशती पर भी काफी कुछ लिखा जा चुका है। तब कई पत्र-पत्रिकाओं ने लोगों की याद्दाश्त को ताजा बनाया था। फिर भी यह मानना पड़ेगा कि बिहार आंदोलन अतीत के गर्भ में समा गया है। वही आंदोलन एक चरण के बाद जेपी आंदोलन के रूप में जाना गया। यह जानने में कुछ लोगों की दिलचस्पी हो सकती है कि वे आंदोलन में कैसे आए?

आंदोलन के दौरान एक बार नानाजी देशमुख ने सलाह दी थी कि डायरी रखा करो। वे अक्सर ऊंची सलाह देते थे। इसके अनेक उदाहरण है। उनकी एक सलाह को सारा देश जानता है। जब वे 60 साल के हुए तो खुद इसे अपनाया और सलाह दे डाली कि हर राजनैतिक नेता को 60 साल तक पहुंचते-पहुंचते सक्रिय राजनीति से अलग हो जाना चाहिए। आप जानते हैं कि नानाजी की सलाह किसी ने नहीं मानी। उनकी डायरी रखने की सलाह भी साधारण सी बात लगती होगी पर है मुश्किल कोम। अगर डायरी लिखने की आदत होती तो मैं यह कहता कि जो लेख लिख रहा हूं वह डायरी के पन्नों से है। इसे मेरा दावा माना जाता। यह बात अलग है कि यह दावा मेरा अपना होता, दूसरों के लिए नहीं होता। फिलहाल जो किस्सा बताने जा रहा हूं वह महज याद्दाश्त से है।

जेपी के बारे में कई किताबें छपी हैं। उनको पढ़ने से कुछ तथ्य सामने आते हैं। 1972 में जेपी को पत्नी -वियोग झेलना पड़ा। उनके साथी महसूस करने लगे कि वे शायद उस शोक से कभी उबर नहीं पायेंगे। उन दिनों के जेपी को जिन-जिन ने देखा है, वे यह सोचकर हैरान होते होंगे कि वह क ौन ऊर्जा शेष बची थी जिसने जेपी को आंदोलन करने की हिम्मत दी। ऐसे ही कई सवाल हैं जो आज भी उत्तर चाहते हैं।

एक अजीब संयोग है कि 1973 के उत्तरार्ध में समानांतर कई घटनाए हो रही थीं। गुजरात में छात्र अपना आक्रोश प्रकट कर रहे थे। सरकार ने ज्यादती कि तो लड़ने के लिए सड़क पर आ गए। उससे जो आंदोलन निकला वह नवनिर्माण आंदोलन कहलाया। गुजरात के सोचने को एक ढंग है। उसी से यह नामकरण निकला होगा। हम जानते हैं कि नवनिर्माण नाम के लिए ही था। उसका हकीकत से कोई लेना देना नहीं था। लेकिन नवनिर्माण आंदोलन से काफी पहले बिहार में छात्र आंदोलन की तैयारियां हो रही थी। उसके लिए संपर्क और बातचीत एक छोटे से समूह में चलाई जा रही थी। इसकी जानकारी समय समय पर जेपी को दी जाती थी। वे सुन लेते थे। बताने वाले को यह संतोष होता था कि हमने एक इतिहास पुरूष को अपनी कोशिशें बता दी हैं।

जेपी अस्वस्थ रहा करते थे। प्रोस्टेट की तकलीफ रहा करती थी। उनकी अस्वस्थता को उनके मन पर असर नहीं दिखता था। यह अहसास उन सबको होता था जो जेपी से मिला करते थे। वे उदासीन नहीं थे। सक्रिय न होते हुए भी दिलचस्पी से बातों को सुनते थे। जो लोग उन्हे बताने आते थे उनके लिए यही संतोष को विषय था कि जेपी ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

ऐसे जेपी को हम नवंबर 1973 से लगातार जानकारी देते आ रहे थे। छात्र आंदोलन की तैयारियों के बारे में उनसे बात होती थी। इसमें ठोस प्रगति तब हुई जब धनबाद के सम्मेलन में समाजवादी युवजन सभा और यूथ कांग्रेस (संगठन) के प्रतिनिधि शामिल हुए। रघुनाथ गुप्त और वशिष्ठ नारायण सिंह की हिस्सेदारी से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का धनबाद सम्मेलन आंदोलन का हरावल दस्ता बन गया। जो लोग उस सम्मेलन में आये उन्हें लक्ष्य और दिशा का स्पष्ट आभास था। वह पहला कदम था जो बिहार आंदोलन की दिशा में उठा। उसकी कड़ी में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ ने राज्य स्तरीय छात्र नेता सम्मेलन बुलाया। उसमें आंदोलन की प्रारम्भिक रूपरेखा बनी। उसी सम्मेलन में राजनीति ने अपना रंग दिखाया। ऑल इंडिया स्टूडेंटस फेडरेशन ने सम्मेलन को तोड़ा वह सीपीआई का छात्र संगठन था। अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर एआईएसएफ ने जो लाइन ली वह आंदोलन विरोधी थी और इंदिरा गांधी की कोंग्रेस के पक्ष में थी। इन घटनाओं को जेपी दूर से पर बहुत बारीकी से गौर कर रहे थे। उन्हे अपने नये साथी, सहयोगियों और सिपाहियों की खोज थी। इस मायने में उनकी खोज दृष्टि सराहनीय मानी जायेगी। यह भी मानना पडेगा कि जेपी ने अपने दरवाजे न तो किसी के लिए अनावश्यक खोले थे न ही किसी के लिए बेवजह बंद किए थे। वे सर्वथा खुले हुए थे। कुछ लोगों को अब भी याद होगा कि आंदोलन का कार्यालय उन दिनों भावेशचंद्र प्रसाद के घर में खुला हुआ था।

एक बात जो याद्दाश्त के बिना किसी खंडनीय खतरे के कही जा सकती है वह है जेपी की आशावादिता। इसकी गहराई जानने के लिए यह जरूरी है कि उन दिनों विपक्ष की मानसिकता क्या थी? विपक्ष यानी चार दलों का महागठबंधन। आपको याद होगा कि 1971 में इन चार दलों (जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, संसोपा और भाक्रांद) ने कांग्रेस ई के खिलाफ महागठबंधन बनाया। उसी के बैनर तले चुनाव लड़ा। नतीजा बहुत खराब था। इन दलों की हिम्मत जवाब दे गई। इनके चेहरे सालों तक उतरे रहे। बड़े नेताओं ने खुद को सम्भाल लिया होगा लेकिन राज्य स्तरीय नेताओं की हालत आंदोलन से पहले तक इस कदर पतली थी कि वे अपनी छाया से भी डरते थे। कर्पूरी ठाकुर, कैलाशपति मिश्र, और सत्येंद्र नारायण सिंह आदि उस महागठबंधन के बिहारी नेता थे। जब छात्रों ने आंदोलन के लिए कमर कसी तो इन नेताओं से जब-जब मुलाकात हुई, वे पूछते थे कि विधानसभा के घेराव मे कितने छात्र आ रहे हैं? इस सवाल में उनकी तरफ से कोई उत्साहजनक निमंत्रण नहीं था और न ही कोई आश्वासन था। था तो बस उनकी मानसिक निराशा का संदेश और वह यह कि भले लड़को कहां पत्थर से सर टकराने की हिमाकत कर रहे हो। उन्हे यह भरोसा ही नहीं होता था कि हजारों की संख्या मे छात्र अपनी पहल पर पटना पहुंच जायेंगे। बिहार विधानसभा को सचमुच घेर लेंगे। बिहार विधानसभा की भुजाए जितनी आज लम्बी हैं उतनी ही तब भी थीं। छात्रों ने उस चुनौती को स्वीकारा। राजनैतिक नेताओं को इस कारण भी भरोसा नहीं होता था क्योंकि उनकी कोई भूमिका नहीं थी वे अजीब उहापोह में थे। भला यह कैसे हो सकता है कि विपक्षी दलों के सहयोग के बिना कोई आंदोलन खड़ा हो जाए?

ऐसा हुआ। यही बिहार आंदोलन की अपनी विशेषता थी। शायद इस एक कारण ने जेपी को रिझाया। 18 मार्च 1974 को एक छोटा सा जुलूस पटना विश्वविद्यालय छात्र-संघ से चला। यह बिहार विधानसभा तक पहुंच भी नही पाया था कि घेराव का कोलाहल पूरे शहर में फैल गया। राज्यपाल विधानसभा में पहुंचे पर बमुश्किल। अब्दुल गफूर की पुलिस को पूरी ताकत झोंक देनी पडी तब कहीं जाकर राज्यपाल राजभवन से निकल पाए। विधानसभा ही नही घेरी गई उस दिन छात्रों के घेरे में पूरा राजतंत्र था। छात्रों की पटना में वैसी धमक पहले कभी महसूस नहीं की गई होगी। उस दिन अनेक हिंसा एवं आगजनी की घटनाए हुईं। उन्हीं घटनाओं में से एक ने सर्चलाइट और प्रदीप अखबारों को स्वाहा कर दिया।

यह 19 मार्च की घटना है। जहां तक याद है बोरिंग रोड मे आंदोलन के कुछ साथी पुलिस से बचते बचाते एक जगह जुटे। वहीं से जेपी से संपर्क का प्रयास हुआ। उनके निजी सचिव ने बड़ी व्यग्रता से सूचना दी कि जेपी सुबह से कई बार पूंछ चुके हैं। वे बात करना चाहते हैं जल्दी पहुंचो। हम कुछ साथी चरखा समिति पहुंचे। उसकी पहली मंजिल पर जेपी अपनें कमरे में बिस्तर पर लेटे हुए थे। हम उनके पैरों की तरफ खड़े हो गए। उनके सिरहाने एक छोटा सा कागज था। हमारे पहुंचते ही उन्होंने उसे उठाया। चश्मा लिया और मनोगत ढंग से पढने लगे। जब पढना पूरा हुआ तो बात शुरु की। अब उनको उस कागज के टुकडे की आवश्यकता नही थी। जैसे सब कुछ उनके दिमाग में दर्ज हो गया हो। 18 मार्च की घटनाओं में खासकर हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बार में उन्होंने सिलसिलेवार पूछताछ की। उनके सवाल पुलिस या जांच एजेंसी जैसे नही थे। वह सत्यांवेषण के लिए थे। हमने उनके सवालों पर भरसक वही बातें बताईं जो जानकारी में थी। बातचीत लंबी चली। नही कह सकता कि जेपी उस वक्त हमारे बातों से सहमत हुए या नहीं। वे कई बार दूसरे साथियों के बोलने पर भड़के भी।

सम्भवत: जेपी को सरकारी और गैर-सरकारी माध्यमों से 18 मार्च की घटनाओं के बारे में सूचनाएं मिली थीं। उनमें छात्रों पर हिंसा और आगजनी का आरोप था। एक क्रांतिकारी नेता जानता है कि राज्य तंत्र कैसे आरोप लगाता है। जेपी छात्रों के प्रतिनिधियों से बात कर अपनी राय बताना चाहते थे। वे एक कसौटी पर आंदोलन को परख रहे थे। दो दिन बाद जब उनकी जांच एक नतीजे पर पहुंची तो उसकी भनक राज्य सरकार को भी लगी। उससे जो बेचैनी हुई वही बिहार आंदोलन की प्रतिरोधक दीवार बनी। जेपी ने अपनी जांच में पाया कि 18 मार्च को हिंसा व आगजनी के लिए छात्र दोषी नही हैं। इसका ही नतीजा था कि जेपी ने बिहार आंदोलन को सहारा देने का फैसला किया। पहले सहयोग दिया और थोड़े दिन बाद उसका नेतृत्व संभाला।

(डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. से प्रकाशित पुस्तक 'जे.पी. जैसा मैंने देखा' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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