एकाग्र मन का करें निर्माण
नई दिल्ली, 21 नवम्बर (आईएएनएस)। प्रेजेंट माइंडेड (वर्तमान विचारक) बनने के बाद आप बनते हैं सिंगल माइंडेड यानी एकाग्रता या एकाग्रहकता, जो एक नाथ, एकलव्य के पास थी। एकाग्रहकता का अर्थ है, आप एक ही सत्य के लिए ग्रहणशील (ट्यूंड) हैं।
वर्तमान विचारक हर सकारात्मक चीज के लिए ट्यूंड होता है। आपके चारों ओर बहुत सी सकारात्मक और नकारात्मक चीजें हैं। आपको एकाग्रता के साथ अनावश्यक चीजों के अंदर आने नहीं देना है। जैसे- आप मच्छरदानी लगाते हैं, क्योंकि आप मच्छरों से बचना चाहते हैं। आपको नुकसान पहुंचाने वाली चीजें नहीं चाहिए। मच्छरों से बचने के अलावा आपको ऑक्सीजन चाहिए तो आप उसके लिए मच्छरदानी में छेदों की व्यवस्था करते हैं। ऑक्सीजन आपको जिंदा रखती है, आपको जिंदा रहना है, जिंदा महसूस करना है। एकग्रित होकर आपको यह सोचना है कि आपको क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए।
एकाग्रहकता जो एकनाथ के पास थी, वे सेवा में एक ही चीज के प्रति एकाग्र थे। एकलव्य ने एकाग्रता की वजह से धनुर्विद्या सीखी। एकलव्य ने गुरु की मूरत सामने रखकर अपनी ग्रहणशीलता बनाए रखी।
मीरा एकतारा बजाती थीं, क्योंकि वे एक ही सत्य के प्रति ग्रहणशील थीं। इसे कहते हैं एकाग्र विचारक बनना वरना इंसान दोहरा विचारक ही रहता है। दोहरा विचारक यानी जो डबल माइंडेड है, दो विपरीत विचारों की दुविधा में है। उसे बहुत तकलीफ है क्योंकि अभी-अभी उसे लग रहा था, 'मैं यह काम करूंगा', फिर दूसरा विचार आने पर वह यह सोचता है कि 'यह काम कल करेंगे।' जो दोहरे व्यक्तित्व वाले लोग होते हैं, वे कार्य कल पर छोड़ते हैं। ऐसे लोगों में एकाग्रहकता नहीं होती है। उन्होंने अपने जीवन में पक्का नहीं किया होता है कि वे क्या चाहते हैं। जो लोग एकाग्र विचारक बन जाते हैं, उनकी अनेक समस्याएं सुलझ जाती हैं। वे लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ जीते हैं।
एकाग्र विचारक बनें, अखंड जीवन जीएं
इंसान डबल माइंडेड होने की वजह से ही दु:खी है, क्योंकि उसका एक मन कहता है, 'यह करें', दूसरा मन कहता है, 'नहीं यह बाद में करें, पहले यह कर डालते हैं।' फिर वह कार्य करने गया तो उसे तीसरा विचार आकर रोक देता है। इस तरह बहुत से लोग अनेकों व्यक्तित्व के साथ जीते हैं।
जिन लोगों का भाव अलग होता है, विचार अलग होते हैं, वाणी से लोगों के सामने वे कुछ अलग कहते हैं, क्रिया कुछ अलग ही करके आते हैं, जिनका संबंध न भाव से था, न विचार, न वाणी से ऐसे लोगों का जीवन खंडित होता है। किस कार्य के लिए आप गए और क्या करके लौटे? कौन-सा सिनेमा देखने गए थे और कौन-सा देखकर आ गए?
अब आपको एकाग्र विचारक बनना है। रेडियो पर आपने विविध भारती की ट्यूनिंग की है तो आप वहीं सुनते हैं। विविध भारती में प्रोग्राम तो विविध हैं, मगर हमें तय किए हुए समय पर विशेष कार्यक्रम सुनना है।
एकाग्र विचारक में मन-न-मन
जब एकाग्र विचारक होने का अनुभव शुरू होगा तब सच्चाई व अच्छाई आपके अंदर आएगी। जब एकाग्र विचारक हो गए तो ही यह मन-न-मन होनेवाला है। फिर आप प्रार्थना करेंगे, 'ईश्वर ही चाहिए, ईश्वर से कम नहीं चाहिए।' यह प्रार्थना मन को न-मन करनेवाली है। जैसे ही मन न-मन हुआ तो हमारे जो अनेक विचार चल रहे थे, वे सब समाप्त हो जाएंगे।
इंसान एकाग्र विचारक हो गया, यानी वह केवल सत्य अंदर ले रहा है। लोग जब सुन रहे होते हैं तब उनके अंदर वार्तालाप चल रहा होता है। उनके अंदर जितना ज्यादा वार्तालाप चलेगा, उतना ही वे एकाग्रता को खोएंगे। जब आप लोगों से बातचीत करते हैं तो आपके अंदर क्या चलता है? क्या आप यह सोचते हैं कि सामने वाला कब बोलना बंद करे तो मैं कुछ कहूं। कुछ लोग बिना सांस लिए बोलते ही चले जाते हैं और सामने वाला पूरी तैयारी करके बैठता है कि कब ये चुप हो तो मैं बोलूं। देखने वाले को लगता है कि सुनने वाले लोग कितने ग्रहणशील हैं, कितने ध्यान से सब सुन रहे हैं परंतु वे कुछ नहीं सुनते हैं। उनके मन में वार्तालाप ही चलता है।
वार्तालाप के दौरान इतनी देर उसका मन कहां था? एकाग्रहकता कहां थी? उसके अंदर कुछ भी नहीं गया। सत्य जब पूरा अंदर जाएगा तो बहुत आसानी से मन न-मन हो जाएगा। मन और सत्य के बीच जो कंकड़ - मैं, मेरा, मुझे, तू, तेरा, तुझे; वह, उन्हें; हैं, वे हट गए क्योंकि वे कंकड़ जीवन को नरक बना देते हैं। नरक का अर्थ स्वर्ग-नरक से न समझ लें। स्वर्ग का अर्थ स्व का अर्क। नरक का अर्थ जब अर्क नहीं है, न-अर्क है। नमन यानी जब मन नहीं है, न-मन है।
बुढ़िया और गाजर की कहानी
एक बुढ़िया के मरने के बाद जब उसका हिसाब-किताब देखा गया तो उसे कहा गया, 'तुमने कोई पुण्य नहीं किया है इसलिए तुम नरक में जाओगी।' बुढ़िया ने कहा, 'मैंने एक पुण्य किया है, मैंने एक बार एक गाय को गाजर खिलाई थी।' उससे कहा गया कि 'अच्छा! फिर गाजर को बुलाओ, वही तुम्हारी मदद करेगी।'
ऐसी कहानियां हमें कुछ समझाने के लिए होती हैं, इसलिए कहानियों में न उलझें, बल्कि उसके पीछे छिपे अर्थ को समझने की कोशिश करें।
गाजर उड़ते हुए वहां आई तो बुढ़िया से कहा गया कि 'उस गाजर से लटक जाओ, वह स्वर्ग में जा रही है। अगर तुम अपने आपको संभाल पाई तो इस पुण्य की वजह से स्वर्ग में पहुंच जाओगी।' बुढ़िया उस गाजर को पकड़कर लटक गई और स्वर्ग की ओर जाने लगी। रास्ते में उसे जो भी मिला उसने भी बुढ़िया की टांग पकड़ ली कि लगे हाथ हम भी स्वर्ग पहुंच जाएंगे। इस तरह एक के बाद एक बुढ़िया के साहरे कई लोग गाजर को पकड़र, एक दूसरे के नीचे लटकते जा रहे थे।
जब उस बुढ़िया ने नीचे देखा कि इतने सारे लोग, उसकी वजह से स्वर्ग जा रहे हैं उसने कहा, 'छोड़ो, यह मेरी गाजर है।' बुढ़िया के ऐसा कहते ही गाजर नीचे गिर पड़ी, गाजर की ताकत ही खत्म हो गई। हालांकि स्वर्ग में जाने की ताकत उस गाजर में थी। मगर बुढ़िया ने जैसे ही 'मेरी' शब्द जोड़ा, 'मैंने पुण्य किया था' तब गाजर की सारी ताकत ही खत्म हो गई। गाजर के नीचे गिरते ही वे सब लोग भी नीचे गिर गए, जो उसके पकड़े हुए थे। उस गाजर से कितना बड़ा चमत्कार हो सकता था मगर नहीं हुआ।
बुढ़िया का जब अहंकार (मन) जागृत हुआ तब वह स्वर्ग से वंचित रह गई। जब मन दो अति में जीता तब वह नमन नहीं होता।
विश्व में दोहरे विचारक घूम रहे हैं। लोग दो की अति में डबल माइंडेड (दोहरे विचारक) होकर जी रहे हैं। जैसे नेता वादे कुछ करते हैं और करते कुछ और हैं। पूरे विश्व में यही तकलीफ है कि डबल माइंडेड लोग घूम रहे हैं। उन्हें पक्का ही नहीं है कि उन्हें क्या करना चाहिए।
मन को गुरु नहीं बनाना है, वह हमेशा दो में ही रहता है। इसे खुश करें या उसे खुश करें, इनका वोट भी चाहिए, उनका वोट भी चाहिए, दोनों को खुश करेंगे। यह राजनीति सदा चलती ही रहती है।
मन के पास बहुत वेराइटी है, उसे यह भी चाहिए, वह भी चाहिए। मन के पास हजारों चीजें हैं। इंसान डबल माइंडेड होकर ही पूरा जीवन काट लेता है। इसलिए उसके जीवन में चमत्कार नहीं होता। चमत्कार होने ही जा रहा था तो दूसरा विचार शुरू हो जाता है। पानी से भाप बनने ही वाली थी कि गैस (स्टोव) बंद कर दिया, दूसरा गैस ऑन कर दिया। जिंदगी भर गैस बदलते रहे, डबल माइंडेड रहे। शायद इधर चाय बने, शायद उधर चाय बने। चाय कहीं भी नहीं बनी। जीवन में कुछ हुआ नहीं।
मनन करें :
* एकाग्र बनना यानी एक चीज के प्रति एकाग्र होना। एकनाथ, एकलव्य जैसे लोग एक ही के प्रति ग्रहणशील थे।
* दोहरा विचारक (डबल माइंडेड) यानी एक साथ अनेक बातों पर सोचने वाला विचारक। वह एक निर्णय नहीं ले पाता है और हमेशा परेशानियों में ही जीता है।
* अबसेंट माइंडेड यानी उस इंसान को अपने ही बारे में बातें याद नहीं रहतीं। हमें अबसेंट माइंडेड से एकाग्र विचारक बनकर, एक को ही ग्रहण करना है।
* दोहरे विचारक लोगों के भाव, विचार, वाणी और क्रिया में तालमेल नहीं होता है।
* मन को नमन करने के लिए एकाग्र विचारक बनें। एकाग्र विचारक होकर ही आप सत्य अंदर ले पाएंगे।
* आपको नवनाथ से एकनाथ बनना है। बहुत सारे प्रोग्राम हैं, लेकिन तय किए हुए समय पर ही आपको प्रोग्राम देखना है।
(डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'आत्मविश्वास सफलता का द्वार' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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