सुसुप्त मन को जगाएं, आनंद पाएं

बी. के. चंद्रशेखर

नई दिल्ली, 20 नवंबर (आईएएनएस)। वह प्रत्येक सुबह देर से उठता है और कहता है, "ओह मैं अच्छी तरह नहीं सोया।" वह अच्छी तरह सोने न देने और बेड-टी न देने के लिए सभी पर चिल्लाता है।

वह अपना नाश्ता नहीं खाता और कहता है, "मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूं।" जैसे ही वह ऑफिस पहुंचता है उसे सरदर्द होता है और कहता है, "मैंने ठीक से खाया नहीं, यह इसी कारण है।" इसलिए वह कुछ फ्रेंचफ्राई और मैकडोनॉल्ड के एक हैम्बर्गर (बर्गर) का आर्डर देता है और उन्हें बड़ी तेजी से ठंडी कोल्डड्रिंक के साथ खा लेता है।

वह अपने अधीनस्थों पर दिए गए काम पूरे न करने के कारण चिल्लाता है। उसे एसीडिटी हो जाती है और वह आदतन एसीलॉक की गोली लेता है। लंच टाइम पर ऑफिस कैंटीन में वह मसालेदार चिकन बिरयानी खाता है और टाइम पास करने के लिए गपशप करता है।

वह अपने काम को खत्म करने में असफल रहता है और कहता है "सरदर्द और एसीटीडी ने उसे काम नहीं करने दिया।" वह ऑफिस के समय में तनाव को कम करने के लिए लगातार धूम्रपान करता है और गर्म कॉफी के कई कप पीता है।

वह निराशा होकर घर जाता है और कहता है, "मेरे ऑफिस का बचा हुआ काम मुझे परेशान कर रहा है।" वह पत्नी के साथ झगड़ा करता है और बच्चों को पीटता है। फिर वह तनाव कम करने के लिए तीन-चार आलू चिप्स और एक सिगरेट के पैक के साथ वाइन के दो बड़े ग्लास पी जाता है।

वह मसालेदार और स्वादिष्ट मांसाहारी डिनर के साथ फिल्म देखता है और कहता है "मैं अपनी उदासी से निकलना चाहता हूं, फिर वह अगली सुबह देर से उठता है..।"

एक भयानक जीवन शैली! यह वही है जिससे 'किलर डॉक्टर' दिन-प्रतिदिन सामना करवाता है। वह एक दुखी और निराश जीवन चक्र में फंस जाता है और एक दिन अपने ही द्वारा पोषित आदतों और चाहतों का दास बन जाता है। वह उन्हें बदलने के लिए मन की शक्ति का प्रयोग करना भी भूल जाता है।

प्रत्येक सुबह वह दो विकल्पों के साथ जगता है : या तो वह खुश रह सकता है या दुखी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से वह दुख को चुनता है और उसकी जीवनशैली उसे निराशा और खतरनाक बीमारियों जैसे कैंसर, डायबीटिज (मधुमेह), कोरोनरी धमनी अवरोध, मानसिक असंतुलन, उच्च तनाव, उच्चतर अम्लता, इरीटेटिव बाउल सिंड्रोम आदि में ला पटकती है।

वह अपना स्वास्थ खोकर बहुत-सा धन कमाता है और अब वह उस धन को खोकर अपने स्वास्थ्य को पुन: प्राप्त करने में लगा होता है।

* आंतरिक चिकित्सक या इनविजिबल डॉक्टर, मन और आत्मा की अवधारणा आधुनिक विज्ञान से परे है।

आंतरिक चिकित्सक, मन और आत्मा की अवधारणा आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र से परे एक जटिल घटना है, क्योंकि विज्ञान मूल रूप में भौतिक विश्व के साथ जुड़ा हुआ है, तत्व से संबंध रखता है आध्यात्म से नहीं। इसीलिए आधुनिक विज्ञान पदार्थ से परे जीवन के सत्य की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। जिस चीज को भौतिक, विवेक व तर्क के द्वारा नहीं समझा जा सकता है, उसे अस्वीकार करने की एक प्रवृत्ति लोगों में पाई जाती है। कभी-कभी सामान्य जीवन में भी जिन चीजों की व्याख्या नहीं की जा सकती, उन्हें भी ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति के साथ जोड़ दिया जाता है।

ज्ञान की प्राप्ति के दो रास्ते हैं। पहला है पांचों इंद्रियों द्वारा इकट्ठा करना। यह ज्ञान विस्तार में सीमित और विषय में स्थूल होता है। जितने समय तक एक मानव जीवित है, अभिमुखी और दुनिया की ओर उसका झुकाव रहता है। वह केवल अल्पकाल के लिए सुख का अनुभव कर सकता है। दुनिया के साथ हमारा संबंध केवल भौतिक शरीर के कारण है। मानव मन ऐंद्रिक सुखों में डूबा रहता है और हमारे जीवन के वास्तविक उद्देश्य को अनदेखा करता है। लेकिन समय आ गया है हमें अपने सुसुप्त मन को जगाने का।

केवल पांच इंद्रियों द्वारा जो इंद्रिय गोचर है, वह अपूर्ण है। दूसरा चैनल (रास्ता), जिसे द्वारा मन का प्रबोधन और जागृति होती है, वह सामान्य मानसिक जागृति के नीचे रहता है। तर्क और सामान्य विवेक इसे बांध कर नहीं रख सकते। अर्धचेतन मन (अंत: प्रज्ञायुक्त या अंत: चेतना) के मानक साफ्टवेयर को क्रियाशील करके जीवन के सत्य को अनुभव किया जा सकता है।

सामान्य मन द्वारा जो समझना मुश्किल है, उसे अंत: प्रज्ञायुक्त मन या अंत: करण द्वारा समझा जा सकता है, जिसे हम अदृश्य डॉक्टर कहते हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह स्वीकार किया था कि उनका सापेक्षिकता का सिद्धांत अंत: प्रज्ञा युक्त मन या अंत:करण की सहायता से ज्ञात किया गया था। विवेकपूर्ण ज्ञान पांच इंद्रियों तक सीमित है जबकि अंत: प्रज्ञा इसके पार चली जाती है। वर्तमान में विवेकपूर्ण ज्ञान का विशाल भंडार रखने वाले अधिकतर शिक्षित लोग जीवन के सत्य की व्याख्या करने और जीवन की समस्याओं के हल करने में असफल होते हैं।

पूर्ण स्वास्थ्य के लिए आत्मा या स्वयं का वास्तविक मित्र और पूर्ण मार्गदर्शक इनविजिबल डॉक्टर (अंत: प्रज्ञायुक्त मन या अंत: करण में अंतनिर्मित गुण) है। जब हम आत्मचेतन होते हैं, या स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझते हैं तभी हमारे अंदर के मौलिक गुण, सत्य, शांति, प्रेम, खुशी, पवित्रता, शक्ति, परमानंद साथ ही साथ आते हैं। इससे ईश्वरीय सद्गुण की विशेषता सामान्यत: हमारे मस्तिष्क के पटल पर इच्छा, दृष्टि अनुभव आदि जैसे विचारों की तरह उभर आते हैं।

प्राथमिक और द्वितीयक विशेषताओं में अंर्तसबंधों के कारण, अपना ध्यान और बुद्धि इन विशेषताओं में से किसी एक पर केंद्रित करके कुछ समय के लिए हम अपनी चेतन अवस्था की दशा को बदलने के योग्य हो जाते हैं, जो हमें संपूर्ण स्वास्थ्य और खुशी के आनंद का उपयोग करने के योग्य बनाता है।

(डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. से प्रकाशित पुस्तक 'इनविजिबल डॉक्टर' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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