दर्पण में पूछिए खुद से सवाल
लुइस एल. हे
नई दिल्ली, 19 नवंबर (आईएएनएस)। अपने मित्रों को अकेला छोड़ दो। अक्सर अपने आप में परिवर्तन लाने के लिए मेहनत करने की बजाय हम यह सोचते हैं कि हमारे किन मित्रों को बदलने की जरूरत है, यह भी प्रतिरोध है।
मेरे काम के शुरुआती दिनों में, मेरे पास एक महिला आती थी जो मुझे अस्पताल में पड़े अपने मित्रों के पास उनकी समस्याओं को हल करने के लिए भेजती थी। मैं हाथ में टेप रिकॉर्डर लेकर वहां पहुंचती थी और आम तौर पर बिस्तर पर किसी ऐसे शख्स को पाती थी, जो यह नहीं जानता था कि मैं वहां क्यों हूं। वह यह समझ नहीं पाता था कि मैं क्या कर रही हूं। उस समय मैंने यह नहीं सीखा था कि किसी के अनुरोध करने पर ही उसका उपचार करना है।
जब कोई चीज हमारे लिए कारगर होती है तो हम अक्सर उसे दूसरों के साथ बांटना चाहते हैं। लेकिन शायद वे उस समय और उस जगह बदलाव के लिए तैयार न हों। जब हम परिवर्तन के लिए तैयार हों, उस समय पर्वितन करना काफी कठिन होता है। लेकिन किसी और को बदलने की कोशिश करना, जब वह ऐसा नहीं करना चाहता, असंभव है और यह एक अच्छी मित्रता को खत्म कर सकता है। मैं अपने ग्राहकों पर जोर डालती हूं, क्योंकि वे मेरे पास आते हैं। मैं अपने मित्रों को अकेला छोड़ देती हूं।
दर्पण हमारे चेहरे पर तैरतीं हमारी भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है। यदि हम एक खुशहाल संतोषजनक जीवन चाहते हैं तो वह स्पष्ट रूप से परिवर्तन किए जाने योग्य चीजों को दिखाता है।
मैं लोगों से कहती हूं कि वे जब भी किसी दर्पण के पास से निकलें तो हर बार अपनी आंखों में देखें और अपने बारे में कुछ सकारात्मक बोलें। किसी दर्पण में देखकर आप आने निश्चय को जोर-जोर से बोलें। आपको तत्काल प्रतिरोध के बारे में पता चल जाता है तथा आप शीघ्रता से उससे निपट सकते हैं। इस लेख को पढ़ते समय एक दर्पण अपने पास रखना अच्छा है। अक्सर उसे कोई दृढ़ निश्चय करने के लिए इस्तेमाल करें और जांचें कि आप कहां पर प्रतिरोध कर रहे हैं और कहां पर स्वतंत्र व गतिशील हैं।
अब दर्पण में देखिए और अपने आपसे कहें, 'मैं बदलना चाहता हूं।' महसूस कर रहे हैं या बस बदलना नहीं चाहते तो अपने आपसे उसका कारण पूछें। आप किस पुरानी धरणा को पकड़े बैठे हैं? यह अपने आपको फटकारने का समय नहीं है। बस ध्यान दीजिए कि क्या हो रहा है और कौन सा विचार उभरकर सामने आता है। यही वह विचार है, जो आपके लिए समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। क्या आप पहचान सकते हैं कि वह कहां से आया है?
जब हम प्रतिज्ञाएं करते हैं और वे सही नहीं लगतीं या कुछ होता हुआ नजर नहीं आता तो यह कहना आसान है, 'ओह, ये प्रतिज्ञाएं काम नहीं करतीं।' ऐसा नहीं है कि प्रतिज्ञाएं काम नहीं करतीं, बस हमें प्रतिज्ञाएं करना शुरू करने से पहले एक और कार्य करने की जरूरत होती है।
हमारी हर आदत के लिए हम बार-बार जिस अनुभव से गुजरते हैं, हम जिन तरीकों को दुहराते हैं, उनकी हमारे भीतर आवश्यकता होती है। वह आवश्यकता हमारी किसी धारण के अनुरूप होती है। यदि आवश्यकता नहीं होती तो हम उसे नहीं अपनाएंगे नहीं करेंगे या वैसे नहीं बनेंगे। हमारे अंदर कुछ है, जिसे मोटापे की, खराब रिश्तों की, विफलताओं की, सिगरेटों की, गुस्से की, गरीबी की, शोषण की या हमारी जो भी समस्या है, उसकी आवश्यकता है।
हमने कितनी बार यह कहा, 'मैं कभी फिर ऐसा नहीं करूंगा।' इसके बाद वह दिन बीतने से पहले हम केक का वह टुकड़ा खा लेते हैं, सिगरेट सुलगा लेते हैं, अपने प्रियजनों से बुरी बातें कहते हैं इत्यादि। फिर हम अपने आपसे यह कहते हुए पूरी समस्या को और बढ़ा देते हैं, 'ओह, तुम्हारे पास कोई इच्छा-शक्ति नहीं है, कोई अनुशासन नहीं है, तुम बस कमजोर हो।' यह उस अपराध-बोध के बोझ को और बढ़ा देता है, जो हम पहले से ढो रहे होते हैं। इसका इच्छाशक्ति या अनुशासन से कोई लेना-देना नहीं है।
(प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'यू कैन हील योर लाइफ' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


Click it and Unblock the Notifications