अमेरिका का अनदेखा चेहरा

एस. गुरुमूर्ति

नई दिल्ली, 14 नवंबर (आईएएनएस)। यदि सभी देश विकसित हों तो कौन बचत करेगा और कौन अमेरिका को उधार देगा? बैंकर लोगों की बचत करने की आदत पर जीते हैं।

केंद्रीय बैंकर बैंकों के नियामक तथा संरक्षक के तौर पर लोगों की बचत को कुछेक अच्छे कारणों से बैंकों में लाने के लिए काम करते हैं। पहला, मितव्ययिता खपत को नियंत्रण में रखती है और बचत मूल्यों को संतुलित करती है, जो केंद्रीय बैंक का एक महत्वपूर्ण कार्य है।

दूसरा, बैकिंग व्यवस्था में बचत को नकदी के रूप में बैंक की तिजोरी में रखने के अलावा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि अस्थिरता पैदा करनेवाले उत्पाती धन को नियंत्रण में रखा जाए।

यहां हम चर्चा कर रहे हैं एक केंद्रीय बैंक- अमेरिका के फेडरल रिजर्व सिस्टम और एक केंद्रीय बैंकर एलन ग्रीनस्पैन की, जो अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक के 28 वर्षो तक अध्यक्ष रहे। वास्तव में, ग्रीनस्पैन को यह पसंद नहीं था कि धन बैंक की तिजोरी में भरा रहे। इसकी बजाय वह उस धन को शेयर बाजार की ओर मोड़ने के पक्ष में ज्यादा थे।

कुछ ऐतिहासिक कारणों सहित भिन्न-भिन्न कारणों से, अमेरिका का फेडरल रिजर्व सिस्टम न केवल अमेरिका की, बल्कि सारे विश्व की वित्तीय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालता है। पहला कारण यह है कि अमेरिका, जो विश्व का सबसे बड़ा ऋणदाता हुआ करता था, आज विश्व का सबसे बड़ा कर्जदार है और इस सच्चाई के बावजूद अमेरिका आज भी उतना ही प्रभावशाली बना हुआ है जितना वह बीसियों वर्ष पहले सबसे बड़ा साहूकार के रूप में हुआ करता था।

दूसरा कारण है कि अमेरिकी फेड से आया जरा सा भी संकेत देश की सीमाओं के पार, अर्थात् दूसरे देशों को प्रभावित कर सकता है। एक उदाहरण लें- यू.एस. फेड के तत्कालीन चेयरमैन एलन ग्रीनस्पैन की जापान के संदर्भ में की गई संक्षिप्त टिप्पणी 'बेतुका उल्लास' और 'अनुचित रूप से बढ़ते शेयर मूल्य' के फलस्वरूप सन् 2006 में एक दिन में ही जापानी शेयरों के मूल्य 3.2 प्रतिशत नीचे आ गए।

तीसरा कारण यह है कि अन्य केंद्रीय बैंकों की तरह यह पूरी तरह अमेरिकी सरकार के अधीन नहीं है। यह एक प्राइवेट बैंक है, जिसका पूर्ण स्वामित्व एवं आंशिक नियंत्रण बड़े-बड़े वित्तीय घरानों के हाथों में है। जब यू.एस. फेड का गठन किया गया था। इसका परिणाम यह हुआ कि फेड के द्वारा अमेरिकी सरकार नहीं, बल्कि वाल स्ट्रीट विश्व को प्रभावित करती है।

बाजार की लत : परंपरागत बैंकों को वित्त व्यवस्था का आधार मनाने की जो धारणा विश्व के अधिकतर देशों, विशेषकर पूर्वी देशों में थी, वह धारणा 1970 के दशक की उत्तरावधि से अमेरिका में चलन से बाहर होने लगी और वह प्रक्रिया अब लगभग पूरी हो चली है।

यह दिखाने के लिए कुछ सांख्यिकीय आंकड़े ही काफी होंगे कि अमेरिकी वित्त व्यवस्था किस सीमा तक शेयर बाजारों की आदी और उन पर निर्भर हो चुकी है।

सन् 1978-1995 के दौरान, अमेरिका की वित्तीय परिसंपत्तियों में बैंकों की हिस्सेदारी आधी होकर 32 प्रतिशत रह गई और उसके साथ ही वाल स्ट्रीट शेयरों का हिस्सा दोगुने से भी अधिक बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया।

सेवानिवृत्ति निधि (जिसमें कुल 16 लाख करोड़ डॉलर की राशि जमा थी) में बैंकों का हिस्सा सन् 1990 के 42 प्रतिशत का सन् 2006 में केवल 7 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में म्यूचअल फंडों और दलालों के जरिए शेयरों में उनका निवेश 52 से बढ़कर 85 प्रतिशत हो गया।

इसके अलावा अमेरिकी बैंकों ने घर-परिवारों को बचत करनेवालों के बजाय कर्ज लेनेवाला बना दिया है। यू.एस. फेड, विशेषकर ग्रीनस्पैन अमेरिका की वित्त व्यवस्था में ऐसे बदलाव का उदाहरण कैसे कायम कर पाए?

गीनस्पैन ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'दि एज ऑफ टर्बुलेंस' में इसका उत्तर स्वयं दे दिया है। ग्रीनस्पैन अपनी पुस्तक में यह सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं कि बचत करने की प्रवृत्ति- आप मानें या न मानें- अल्प विकसित होने का संकेत है। विकाशील देशों में, यानी वे देश जो पूरी तरह विकसित नहीं हैं, 'लोगों को दुर्दिन तथा सेवानिवृत्ति के बाद के दिनोंके लिए मजबूरन बचत करनी पड़ती है।'

इसकी तुलना में वह दिखाना चाहते हैं कि विकसित देश किस तरह व्यापक वित्तीय तंत्र के जरिए उपभोक्ताओं के एक बड़े वर्ग को अपनी वर्तमान आय से अधिक खर्च करने लायक बनाते हैं। यहां ग्रीनस्पैन महोदय की सोच प्राचीन भारत में चार्वाक के उस दर्शन से बहुत मेल खाती है, जिसने हजारों साल पहले घर-परिवारवालों को उधार लेने, खर्च करने और खुश रहने की सलाह दी थी।

ग्रीनस्पैन महोदय यहां इस सच्चाई से कतराने का प्रयास कर रहे हैं कि विकासशील देशों में जहां लोगों को संकट की घड़ी के लिए बचत करने हेतु 'बाध्य' किया जाता है, वहीं अमेरिका में उपभोक्ताओं को अपनी सामाजिक सुरक्षा, यानी अपने दुर्दिनों से निपटने के लिए जबरन 'कर' देना पड़ता है, जो अनिवार्य बचत के बदले में प्रपीड़क कर-वसूली का एक उदाहरण है। फिर भी वह बचत को 'बाध्यता' के रूप में देखते हैं और उसे अल्प विकसित होने का प्रमाण मानते हैं।

विकास और बचत : इसके अतिरिक्त ग्रीनस्पैन का यह सिद्धांत कि विकास लोगों को कम बचत करना सिखाता है, अंग्रेजीभाषी देशों, यथा अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के अलावा किसी अन्य देश से मेल नहीं खाता है, क्योंकि इन्हीं देशों में बचत ऋणात्मक है। फिर उनकी यह धारणा भी जापान या सिंगापुर और हांगकांग जैसे विकसित देशों के संदर्भ में ठीक नहीं बैठती कि विकसित देशों के साख-पत्र उपभोक्ताओं को अपनी आय से अधिक खर्च करने योग्य बनाते हैं, क्योंकि इन देशों में न केवल आय ज्यादा है, बल्कि बचत का स्तर भी काफी ऊंचा है।

विकास नहीं, कुछ ही है, जिसके कारण लोग बचत कम करते हैं या खर्च अधिक करते हैं। उस सूत्र को जानने के लिए यह समझना होगा कि विकसित जापान के लोग सरकार के इस निर्णय के बावजूद बचत क्यों करते हैं कि उनका 'जमाराशि' पर कोई ब्याज या लाभ 'नहीं दिया जाएगा?' इसके दो कारण हैं। एक कारण है परिवार और दूसरा, सरकार का परिवार की जिम्मेदारी नहीं लेना।

ग्रीनस्पैन फिर अपना निशाना चूक गए लगते हैं, जब वे कहते हैं कि हाल के दिनों में लंबी अवधि की ब्याज-दरों में कमी का कारण यू.एस. फेड दरें नहीं बल्कि विश्वव्यापी नकदीकरण है। विश्वव्यापी नकदी-अनिवार्यत: चालू खाता अधिशेष अर्थात भिन्न-भिन्न देशों की आरक्षित एवं अल्पकालिक विदेशी मुद्रा निधियां-किस तरह दीर्घावधि ब्याज दरों को नीचे ले आएगी, यह बात स्पष्ट नहीं है।

इसके विपरीत, सच तो यह है कि विभिन्न देशों की विदेशी मुद्रा धारित राशि दीर्घावधि ब्याज-दरों की अपेक्षा अल्पकालिक ब्याज-दरों को अधिक प्रभावित करती है। आंकड़ें बताते हैं कि यू.एस. फेड की दरों में परिवर्तन, जैसा कि ग्रीनस्पैन दावा करते हैं, विश्वव्यापी नकदी प्रवाह के अनुकूल नहीं, बल्कि उसके विपरीत रहा है। विशिष्ट मुद्राओं में घोषित विश्वव्यापी विदेशी मुद्रा की आरक्षित राशि सन् 2001 की पहली तिमाही में 1.5 लाख करोड़ डॉलर थी, जो सन् 2007 की दूसरी तिमाही में बढ़कर 3.65 लाख करोड़ डॉलर हो गई, इससे पता चलता है कि छह वर्षो में नकदी-निधि में 142 प्रतिशत की जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई और साल-दर-साल 15 प्रतिशत की वृद्धि भी।

विश्वव्यापी विदेशी मुद्रा में डॉलर : यदि फेड की ब्याज-दरें प्रवाह के अनुकूल होतीं, तो नकदी में बढ़ोतरी के साथ उनमें गिरावट होनी चाहिए थी। इसके विपरीत, फेड ने इस अवधि में पहले तो दरों में कटौती की, फिर ब्याज-दर को बढ़ा दिया। यू.एस. फेड की ब्याज-दर, जो सन् 2001 के आरंभ में 6 प्रतिशत थी, उसे सन् 2002 में एकदम घटाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया गया और सन् 2003 में यह ब्याज-दर 1 प्रतिशत रह गई। इस कटौती के फलस्वरूप विश्व स्तर पर विदेशी मुद्रा आरक्षित निधि में डॉलर की हिस्सेदारी, जो सन् 2001 में 72 प्रतिशत थी, घटकर 67 प्रतिशत रह गई।

यह गिरावट उस समय देखी गई जब विश्वव्यापी नकदी-निधि में प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत की वृद्धि हो रही थी। इस गिरावट ने फेड को सन् 2005 की पहली तिमाही में ब्याज-दर धीरे-धीरे 3.25 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए बाध्य कर दिया। लेकिन उस उपाय से भी विश्वव्यापी विदेशी मुद्रा धारित राशि में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी की गिरावट रूक नहीं पाई, क्योंकि यह हिस्सेदारी घटकर 65.4 प्रतिशत रह गई और यू.एस. फेड को विवश होकर सन् 2005 की चौथी तिमाही में ब्याज-दर बढ़ाकर 4.25 प्रतिशत करनी पड़ी।

इस बढ़ोतरी से अमेरिकी डॉलर का हिस्सा कुछ समय के लिए बढ़कर 70.5 प्रतिशत तो पहुंच गया, लेकिन सन् 2006 की पहली तिमाही में फिर घटकर 66.4 प्रतिशत और चौथी तिमाही में उससे भी कम 64.1 प्रतिशत हो गया, बावजूद इसके कि फेड की ब्याज-दर बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दी गई थी।

प्रवाह के विपरीत : इसका मतलब था कि यू.एस. फेड की दरें प्रवाह के विपरीत जा रही थीं और अब भी उसके विपरीत हैं, न कि प्रवाह के अनुकूल। दीर्घावधि ब्याज-दरों में गिरावट का उच्च अल्पकालिक नकदीकरण (लिक्वि डिटी) से कोई सरोकार नहीं है। इसका संबंध इस सच्चाई से है कि अभीष्ट निवेश, जैसा कि ग्रीनस्पैन का कहना है, अभीष्ट बचत से कम था और इसका परिणाम यह हुआ कि विश्वव्यापी नकदी-निधि में अनपेक्षित वृद्धि होती चली गई।

इतना ही नहीं, आशावादी ग्रीनस्पैन को पक्का यकीन हो गया लगता है कि चूंकि अन्य सभी देशों की 'जोखिम-समायोजिता' ब्याज-दर अमेरिका द्वारा दिए जानेवाले लाभ या प्रतिफल से कम रहेगी। शेष जगत् बचत करेगा और अपने धन को अमेरिकी डॉलरों में निवेश करके रखेगा तथा यह भी कि यह निवेश अमेरिकी खपत और चालू खाता घाटों का वित्त-पोषण करेगा।

लेकिन ऐसा लगता है कि यहां वह जापान के उदाहरण को भूल गए हैं, जिसकी शासकीय ब्याज-दर सन् 2001 से सन् 2005 तक 'शून्य' रही है और अब 0.5 प्रतिशत है, जबकि यू.एस. फेड की जोखिम-समायोजित दर 1 प्रतिशत से बढ़कर 5.5 प्रतिशत हो गई, जिससे यह सिद्ध होता है कि जापानी पूंजी ज्यादातर अपने देश में ही रही, जापान से बाहर नहीं गई।

ऐसी प्रत्यक्ष प्रवृत्तियों को अनदेखा कर ग्रीनस्पैन महोदय आगे यह भी कहते हैं कि एक ओर बचत और दूसरी ओर खर्च एवं निवेश से विश्व-स्तर पर संतुलन की स्थिति बन जाएगी। अतएव श्री ग्रीनस्पैन यह कहना चाहते हैं कि अमेरिका को चिंता करने की जरूरत नहीं है, वहां के लोग बचत किए बिना खर्च करते रह सकते हैं।

ये सारी बातें अब एक अंतिम प्रश्न की ओर ले जाती हैं, जो ग्रीनस्पैन के सिद्धांत की परस्पर-विरूद्धता में विरोधाभास को प्रकट करती हैं। जैसा कि ग्रीनस्पैन का कहना है, यदि आत्मविकसित देश जो बचत करते हैं और अमेरिका को उधार देते हैं, विकसित हो जाने के बाद बचत करना बंद कर देंगे, उस दशा में फिर कौन बचत करेगा और अमेरिका की खपत एवं चालू खाता घाटों की भरपाई यानी उनका वित्त-पोषण कौन करेगा?

(प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार। )

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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