मन की गांठें खोलें, बनें धर्यवान

लुइस एल. हे

नई दिल्ली, 14 नवम्बर (आईएएनएस)। हम अपने जीवन में जो कुछ भी छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, वह केवल एक लक्षण, बाहरी प्रभाव है। कारण को समाप्त करने का प्रयास किए बिना लक्षण को समाप्त करने का प्रयास करना व्यर्थ है। जिस पल हम अपनी इच्छा-शक्ति या अनुशासन को छोड़ते हैं, उसी पल वह लक्षण फिर से उभर जाता है।

आवश्यकता को छोड़ने की इच्छा : मैं ग्राहकों से कहती हूं, 'आपकी इस अवस्था के लिए आपके अंदर जरूर कोई आवश्यकता है, अन्यथा आपके साथ ऐसा नहीं होता। चलिए, एक कदम पीछे चलें और उस आवश्यकता को छोड़ने की इच्छा पर काम करें। जब वह आवश्यकता समाप्त हो जाती है तो आपको सिगरेट पीने या अधिक खाने या नकारात्मक विचारों की कोई इच्छा नहीं होगी।'

सबसे पहले यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए- 'मैं प्रतिरोध या सिरदर्द या कब्ज या अत्यधिक वजन या धन का अभाव आदि की आवश्यकता को छोड़ने के लिए तैयार हूं।' यह कहें, 'मैं..की आवश्यकता को छोड़ने के लिए तैयार हूं।' यदि आप इस समय प्रतिरोध करते हैं तो आपकी दूसरी प्रतिज्ञाएं काम नहीं कर सकतीं।

हम अपने आसपास जो जाले बुनते हैं, उन्हें खोलने की आवश्यकता होती है। यदि आपने कभी किसी धागे के गोले को खोलने की कोशिश की है तो आप जानते होंगे कि खींचने तथा जोर देने से वह और उलझता है। आपको बहुत सौम्यता और धर्य से गांठों को खोलना पड़ता है। जब आप अपने मन में लगी गांठों को खोलते हैं तो आप अपने साथ सौम्य और धर्यवान रहें। जरूरत हो तो मदद लें। सबसे पहले इस प्रक्रिया में अपने साथ प्रेम रखें। पुराने को त्याग देने की इच्छा ही सबसे महत्वपूर्ण है। यही इसका रहस्य है।

जब मैं कहती हूं, 'समस्या की आवश्यकता' है, तो मेरा मतलब होता है कि हमारे कुछ खास वैचारिक तरीकों के अनुसार हमें कुछ बाहरी प्रभावों या अनुभवों की 'आवश्यकता' होती है। हर बाहरी प्रभाव एक अंदरूनी विचार-प्रारूप की स्वाभाविक अभिव्यक्ति होता है। केवल बाहरी प्रभाव या लक्षण से लड़ना अपनी ऊर्जा व्यर्थ करना है तथा अक्सर इससे समस्या और बढ़ जाती है।

'मैं काम का नहीं हूं' से टाल-मटोल उत्पन्न होती है। यदि मेरी एक अंदरूनी धारणा या विचार यह है कि 'मैं किसी काम का नहीं हूं', तो मेरा एक बाहरी प्रभाव शायद टाल-मटोल करने की आदत होगा। आखिरकार हम जहां जाना चाहते हैं, वहां जाने से रोकने का एक तरीका 'टाल-मटोल' है। टाल-मटोल करनेवाले अधिकतर लोग अपना काफी समय और ऊर्जा टाल-मटोल के लिए खुद को दोषी ठहराते हुए खर्च करते हैं। वे खुद को आलसी कहेंगे और आम तौर पर अपने आपको ऐसा महसूस करने के लिए प्रेरित करेंगे कि वे 'बुरे' हैं।

किसी और के सुखी होने का दु:ख : मेरे पास एक ग्राहक था, जो अपनी ओर ध्यान खींचना पसंद करता था और आम तौर पर देर से कक्षा में आता था, ताकि वह कुछ हलचल पैदा कर सके। वह 18 बच्चों के बीच सबसे छोटा था और कोई भी चीज सबसे बाद में उसे मिलती थी। जब वह बच्चा था तो वह हर किसी को कुछ पाते देखता था, जबकि उसे अपनी चीज के लिए इंतजार करना पड़ता था। अब भी जब किसी की किस्मत अच्छी होती थी, तो वह उसके लिए खुश नहीं होता था। इसकी बजाय वह कहता था, 'ओह! काश, यह मुझे मिल पाता' या 'ओह! यह मुझे क्यों नहीं मिलता?'

उनकी किस्मत पर उसका दु:ख उसकी अपनी प्रगति और परिवर्तन में बाधक था।

अपनी काबिलियत कई द्वार खोलता है : 79 वर्षीय एक ग्राहक मेरे पास आई। वह गाना सिखाती थी और उसके कई विद्यार्थी टेलीविजन विज्ञापन बना रहे थे। वह भी ऐसा करना चाहती थी, लेकिन डरती थी। मैंने उसे पूरा सहयोग दिया और समझाया, 'आपके जैसा कोई नहीं है। बस जैसे हो। वैसे रहो।' मैंने कहा, 'इसे मजे के लिए करो। वहां पर ऐसे लोग हैं, जो बिलकुल उसी चीज की तलाश कर रहे हैं, जो आपके पास है। उन्हें बाताओ कि आपका अस्तित्व है।'

उसने कई एजेंटों और कास्टिंग निर्देशकों को बुलाया और कहा, 'मैं एक सीनियर हूं, वरिष्ठ नागरिक और मैं कमर्शियल करना चाहती हूं।' कुछ ही समय बात उसके पास एक कमर्शियल था और तब से उसने काम करना बंद नहीं किया है। मैं अक्सर उसे टी.वी. और पत्रिकाओं में देखती हूं। नए कैरियर किसी भी उम्र में शुरू हो सकते हैं, खासकर जब आप मजे के लिए उन्हें करते हैं। इसलिए आत्मनिंदा अपने लक्ष्य से भटकना है। यह केवल टाल-मटोल और आलस्य को बढ़ाएगा।

(प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'यू कैन हील योर लाइफ' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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