प्रेरणा की शक्ति को पहचानें
रमेश पोखरियाल 'निशंक'
नई दिल्ली, 9 नवंबर (आईएएनएस)। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है, 'सद्गुणियों के सान्निध्य से व्यक्ति में गुणों का विकास होता है। दुष्टों की संगति से विनाश निश्चित है।' सकारात्मक सोच, आपको जीवन के हर मोड़ पर कुछ -न-कुछ सकारात्मक देती है तो सकारात्मक सोच अकारण और निराधार नहीं होती, इस सोच को योजनाबद्ध रूप से विकसित किया जा सकता है। आइए देखें कि इसके लिए कौन-से तत्व आवश्यक हैं?
धर्य रखें : धर्य सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। अगर आपमें धर्य की भावना है, तो स्वाभाविक है कि आपके मन में कभी नकारात्मक विचार नहीं आ सकते। अक्सर हम - 'मुझे यह अवसर नहीं मिला', 'काश! मेरा बच्चा पढ़ाई में तेज होता।' 'अमुक की नौकरी चली गई, अब क्या होगा?' - ऐसी बातों के लिए हम दुख व्यक्त करते हैं। ऐसा रोना रोने से कुछ हासिल नहीं होता। अगर आप ऐसे मोड़ पर धर्य बरतेंगे और परिस्थिति से निबटने का रास्ता खोजें, तभी उस चिंता को दूर कर सकेंगे।
आशावादी बनें : आशाएं ही सफलता की सीढ़ी तक आपको पहुंचाती है, निराशा सिर्फ कुंठाओं से भर देती है। 'मैं क्यों नहीं कर सकता', 'इस बार अवसर मुझे ही मिलेगा' आप ऐसी सोच से ही आगे बढ़ सकते हैं। यह न सोचें कि मेरी किस्मत ही अच्छी नहीं, सारी दुनिया को मुझसे समस्या है। आशावादी बनकर तो देखें। आपकी सारी समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी।
संतोष रखें : जिस घड़ी आप अपने भीतर संतोष का भाव पैदा कर लेंगे, उसी पल से आप सकारात्मक सोचने लगेंगे और अनावश्यक तनाव से बचेंगे। जो मिला है, जितना मिला है - उसमें संतोष बरतें। कहते हैं कि संतोष में ही परम सुख है, संतोष से बढ़कर कुछ भी नहीं। अवसाद की स्थिति से बचने के लिए संतोष एकमात्र उपचार है।
हर कोई अपने जीवन में किसी न किसी से प्रेरित होता है। ऐसे लोगों से प्रेरणा लीजिए जो जीवन को जिंदा-दिली और खुशहाली से जीना जानते हैं। हर व्यक्ति के भीतर कुछ न कुछ अच्छाईयां जरूर होती हैं। कोई व्यक्ति व्यवस्थित होता है तो कोई धर्यवान, कोई सकारात्मक सोच रखता है तो कोई जागरूक होता है, आप उन गुणों व अच्छाइयों से प्रेरित होकर अपने भीतर भी सकारात्मक भाव पैदा करें।
लक्ष्य निर्धारित करें : अगर आपको लक्ष्य निर्धारित हो तो आपको निराशा या विफलता का मुंह देखना नहीं पड़ता। आपको क्या काम करना है, कैसा घर बनाना है? यह निर्धारित करना आवश्यक है। साथ ही उसका विकल्प भी तैयार रखना जरूरी होता है। लक्ष्य स्पष्ट हो तो उसे पाना आसान हो जाता है। अस्पष्ट लक्ष्य रखने वाले ऐसा ही सोचते हैं कि मैं इंजीनियर नहीं बना तो डॉक्टर बनूंगा वरना संगीतज्ञ बन जाऊंगा और वह भी न बना तो दुकान खो लूंगा। इससे वे किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते।
आदर्श बनें : अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाएं कि दूसरे आपको अपना आदर्श मानें। जब आप कठिन परिस्थितियों में भी अपना मानसिक संतुलन बनाए रखेंगे, हर हाल में प्रसन्न रहेंगे, दूसरों के सुख-दुख में उनकी मदद करने को हमेशा तत्पर रहेंगे तो आप किसी आदर्श व्यक्ति से कम नहीं होगें। सोचिए, आखिर आप अपने माता या पिता या गुरु को अपना आदर्श क्यों मानते हैं? उनमें जरूर ऐसे गुण होंगे जो हर किसी को प्रभावित करते होंगे तो क्यों न आप भी दूसरों के लिए आदर्श बनें।
विजेता बनें : विजेता बनने के लिए आप अपना सुनिश्चित लक्ष्य सामने रखें, लेकिन अगर सफलता हासिल न हो तो निराश न हों। दोबारा दोगुने उत्साह के साथ उसके लिए जुट जाएं। विजय और पराजय जीवन में लगी ही रहती है। असफलता मिलने पर निराश होकर न बैठ जाएं। खुद को समझाएं, बार-बार कहें कि 'हम होंगे कामयाब एक दिन।'
सहज बनें : जो लोग सहज जीवन जीते हैं, उन्हें कभी भी नकारात्मक विचार नहीं घेरते। बनावटी जीवन जीने से बेहतर होगा कि वास्तविकता में जिएं। इससे कभी भी आपको समस्याओं का सामना कम करना पड़ेगा। घर-परिवार से लेकर व्यावसायिक जीवन तक सहजता जरूरी है। असहजता न सिर्फ आपकी सफलता के मार्ग में बाधक होती है, बल्कि आपके इस व्यवहार से दूसरे भी परेशान होकर किनारा कर लेते हैं।
(लेखक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता के अचूक मंत्र' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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