बराक ओबामा जैसे क्यों नहीं हैं हमारे नेता?

ओबामा दौरे पर 'औपचारिकता' गायब
ओबामा के भारत दौरे में उनकी स्कूली बच्चों के साथ मुलाकात सबसे स्पेशल रहीं। मुंबई के स्कूल में मिशेल-बराक ओबामा का बच्चों के साथ डांस करना, हमारे लिए जितना अनौपचारिक था, उनके लिए उतना ही स्वाभाविक। ओबामा बच्चों के साथ नाचे और दीवाली मनाई, लेकिन ना किसी का भाषण हुआ, ना अतिथियों को फूल-माला पहनाया गया। भारत के लिए ये बिल्कुल नया था। ये बेतकुल्लफी बराक ओबामा और मिशेल ओबामा के लिए स्वाभाविक रही लेकिन हम भारतीयों के लिए ये एक हद तक विचित्र था।
'ट्विटर' पर संदेश भरे पड़े थे कि हमारे राजनीतिज्ञ हमसे इतनी आसानी से क्यों घुल-मिल नहीं पाते? ऐसे में मुझे इंदिरा गांधी की आदिवासियों के साथ नाचते हुए खींची गई एक तस्वीर याद आती है। उसके बाद राजीव गांधी की। शायद उनके बाद आम जनता के साथ घुलने-मिलने की बात वहीं खत्म हो गई। बल्कि इसके उलट भारत की जनता राजनीतिज्ञों की बजाई धुन पर नाचती रहती है।
ओबामा ने इसके बाद युवाओं को मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में संबोधित किया, बराक ओबामा को खुद मिशेल ओबामा ने मंच पर आमंत्रित किया। मिशेल ने युवाओं को कहाकि आप लोगों को मेरे पति से बेहद कठिन प्रश्न पूछने चाहिए। मंच पर मिशेल और बराक के अलावा कोई भी नहीं था, क्या इससे पहले भारत में कभी ऐसा देखा गया है? भाषण के बाद भी नीरसता नाम की कोई चीज नहीं दिखी जो हर राजनीतिक समारोह की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।
ओबामा ने वहां पर 8 प्रश्नों के जवाब दिए पर ऐसा लग रहा था जैसे उन्होने सैकड़ों प्रश्नों के जवाब दिए हों। सोचने वाली बात है आखिर ओबामा के व्यवहार में खास क्या था जो माहौल इतना स्वाभाविक लग रहा था। शायद इसका एक जवाब ये है कि हमारे राजनीतिज्ञ हमें पसंद नहीं करते। ये हमारे पास सिर्फ चुनावों में आते हैं। हमारा कोई राजनीतिक्ष हमसे बात करने के लिए, हमारी समस्याएं सुनने के लिए तत्पर नहीं दिखता।
हमारे नेता क्यूं नहीं 'ऐसे'
टाउनहॉल संबोधन के बाद ओबामा ने युवाओं से जम कर हाथ मिलाया। इस दौरान उनके सुरक्षा बल ने उनसे दूरी बनाए रखी और इस ब्रैंड बिल्डिंग में बिलुकल हस्तक्षेप नहीं किया। लेकिन भारत में क्या हमारे राजनीतिज्ञ जनता और भीड़ को अपने इतने करीब आने देते हैं? क्या हम भारतीय, पश्चिमी और अपने यहां के 'नेताओं' से अलग-अलग तरीके से पेश आते हैं? शायद ऐसा ही है!
पश्चिमी राजनीतिज्ञ आमतौर पर अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का खूब इस्तेमाल करते हैं लेकिन भारतीय राजनीतिज्ञों में ऐसा करने वालों के नाम याद करना मुश्किल है। ओबामा ने भी मुंबई के व्यापारिक सम्मेलन में इसका बखूबी परिचय दिया। उन्होने अमेरिका में अपनी पार्टी की ताजा चुनावी हार पर चुटकी ली। हमारे राजनीतिज्ञों के बारे में ऐसा सोचना भी मुश्किल है कि वह अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का सार्वजनिक या व्यापारिक सम्मेलनों में प्रदर्शन कर सकते हैं और अपनी हार पर खुद व्यंग्य करना , ये तो सिर्फ कल्पना ही हो सकता है।
आने वाले दिनों में भारतीय राजनीतिज्ञों के दोहरे और अभिजात्य भरे व्यवहार से लोगों में गुस्सा भड़कना निश्चित है। लेकिन इस गुस्से का उन पर कोई प्रभाव पड़ना मुश्किल है। हमारी भारतीयों की जिंदगी तो बस यूं ही चलते रहने के लिए है। इस 'यूं ही में' दोनों शामिल हैं, हम और हमारे राजनेता दोनों!












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