मन को समझकर हालात को जीतिए
बी.के. चंद्रशेखर
नई दिल्ली, 7 नवंबर (आईएएनएस)। एक साधारण विचार उस स्थिति में शक्तिशाली उपचारक बल बन जाता है, जब वह एक शांत मन से उत्पन्न होता है। शांत मन से निकले हुए एक केंद्रित विचार में इतनी ताकत होती है कि वह किसी भी परिस्थिति चाहे दुख हो, निराशा हो या कोई अत्यंत आवश्यकता, अपना रास्ता ढूंढ़ लेता है और उस स्थान पर पहुंच जाता है, जहां उसके हल का स्रोत होता है।
मानव चेतनावस्था में ब्रह्मांड के साथ फैलने और घुल मिल जाने की क्षमता होती है। यही इनविजिबल डॉक्टर की मजबूत हीलिंग (उपचारक तरंग) कहलाती है।
अति प्राचीन समय से, मानव जीव दुख और सुख के क्षणों में पड़ते रहे हैं और अपनी इच्छाओं का विचारों को जिसे वे उसे संबंधित करते रहे हैं, जिसे उन्होंने भगवान या सार्वभौमिक नियम नाम दिया है। निरपेक्ष शक्ति की यह सत्ता प्रत्येक चेतनावस्था का केंद्र होती है।
मन चेतन अवस्था का एक शक्तिशाली उपकरण है। यह योयो की तरह कार्य करता है जिसका काम हमारे मेमोरी बैंक (अर्धचेतन या अचेतन) में जमे संस्कारों और आदतों को विचारों के रूप में बाहर फेंकता रहना है। यही विचार फिर चेतना अवस्था में तरंगें पैदा करता है।
मेमोरी बैंक में जब शक्तिहीनता, अकेलापन, चिड़चिड़ापन या अंधकार के विचारों की तरंगें बार-बार उत्पन्न होती हैं, तो यह एक ढर्रा या जाल बन जाता है, जिसमें एक व्यक्ति बुरी तरह फंस जाता है और तब वह यह सोचकर हैरान होता है कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों?
यदि आप अपने जीवन के किसी पक्ष से नाखुश हैं तो एक रास्ता जो आपको परिवर्तन और सुख की तरफ ले जाएगा, वह है अपने अर्धचेतन या अचेतन मन को समझाना, जो इन विचारों का उद्गम है। अगर परिस्थितियों पर जीत पानी है तो इस मन को समझना ही होगा।
मन के खतरनाक ढर्रे को समझने के दो पक्ष हैं। प्रथम मन की नकारात्मक आदतों को समझना और सतर्कतापूर्वक उन्हें सकारात्मक आदतों से प्रतिस्थापित करना। दूसरा, अपने मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना, ताकि वह आपके अंतर से मेल खाते हुए विचार ही उत्पन्न करें।
एक विचार, शक्ति और ऊर्जा के साथ एक तरंग होती है, जो इसके पीछे होती है। यह चल सकती है, उड़ सकती है, यात्रा कर सकती है और सर्वत्र फैल सकती है। एक तरीके से यह आपके साथ है, और फिर भी हर जगह है, विशेष जहां आपकी इच्छा इसे चाहती है।
नकारात्मक विचारों (घृणा, स्वयं को सही मानना आदि) पर लगातार सतर्क नजर रखने के अलावा एक व्यक्ति को अदृश्य डॉक्टर के चुनाव की दिशा में सकारात्मक और शक्तिशाली विचारों को उत्पन्न करने की स्थिति को बढ़ाना होगा।
प्रत्येक दिन हम लोग आकाश में पक्षियों को देखते हैं। वे न तो बीज बोते हैं, न फसल लगाते और काटते हैं और न ही अनाज और फल भंडारित करते हैं, फिर भी वे हमेशा खुश रहते हैं। यहां तक कि वे भविष्य के बारे में भी नहीं सोचते, इससे उन्हें कोई तनाव या दबाव नहीं होता। इसलिए वे लोग भी अति विवेकपूर्ण होते हैं जो, यदि यह चिंता करना और सोचना बंद कर देते हैं कि कल क्या पहनेंगे, खाएंगे और पीएंगे और जो ये सोचते हैं वे इस तरह अपने आप को तनाव में रखते हैं।
यदि हम आज के लिए जीना सीखते हैं, तो हमारा कल निश्चित ही उत्साह से भरा और प्यारा होगा। इसका आशय यह नहीं है कि हमारे पास धन नहीं होना चाहिए। हमें ईमानदारी, सही साधन और कड़ी मेहनत से धन कमाना चाहिए। जो हमारे पास है हमें उससे संतुष्ट भी होना चाहिए।
हमें निर्माणकारी और रचनात्मक विचारों को ज्यादा देना चाहिए, न कि हमें नकारात्मक विचारों व भावनाओं (ईष्या, द्वेष, बदला, घृणा, स्वार्थ) के शिकार हो जाना चाहिए। वे जो विचारपूर्ण और सत्यवादी हैं ; वे हमेशा खुश रहते हैं और सुंदर, अच्छे, सुहावने, प्रफुल्लित, प्यारे और उत्साहपूर्ण विचारों के गर्वपूर्ण स्वामी होते हैं।
हम उन विचारों को बताना चाहेंगे जो जीवन के आधारभूत सत्य है और जो जीवन के मूल सिद्धांतों से अंकुरित होते हैं। हमें अपनी बुद्धि, बुद्धिमत्ता और भावनाओं को संतुलित करना सीखना होगा। बुद्धि क्या है? मूल रूप से, इसका अर्थ प्राकृतिक नियमों के अनुसार जीवन जीने से है। यह व्यावहारिक ज्ञान है। यह नि:स्वार्थ प्यार का नियम भी है।
मूल सिद्धांत सार्वभौमिक होते हैं। उन्हीं से ही संस्कृति का विकास होता है। हमें क्षणिक भावनाओं और अनुभवों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। हमें हर समय जीवन की वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए।
एक प्रेरक और उसकी अनुक्रिया के बीच हमेशा कुछ अंतराल होता है। उस अंतराल का प्रयोग बौद्धिक, रचनात्मक और निर्माणकारी तरीके से उत्तर देने के लिए करना चाहिए। हमारे कार्य ऐसे होने चाहिए जो निराशामय और दु:ख की तरफ अग्रसर न हो।
जीवन के मूल सिद्धांत कभी नहीं बदलते हैं- जैसे अच्छाई, दयालुता, सम्मान, ईमानदारी, सेवा, सहानुभूति, दयाभाव इत्यादि। इन सिद्धांतों के पीछे मालिक या मास्टर इनविजिबल डॉक्टर है - अंत:करण। अंत:करण अंदर की छोटी और शांतिपूर्ण आवाज होती है। यह अंदर के इनविजिबल डॉक्टर की आवाज होती है।
यह अंत:प्रज्ञा से युक्त बुद्धि है जिसमें नैतिक नियम शामिल होते हैं। यह बताता है कि साध्य और साधन अलग नहीं होते। जैसा कि गांधी जी ने कहा "अनैतिकता और बेईमानी से सारे साधन सहसा धूल में मिल जाते हैं।"
उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर आगे कहा है कि "काम के बिना धन, अंत:करण के बिना सुख, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवता के बिना विज्ञान, त्याग के बिना पूजा और सिद्धांत के बिना राजनीति धूल में मिल जाएंगे।"
(डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. से प्रकाशित पुस्तक 'इनविजिबल डॉक्टर' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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