परिश्रम सफलता का पहला सूत्र
डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक'
नई दिल्ली, 6 नवंबर (आईएएनएस)। आधुनिक उद्योगपतियों का स्वभाव यूं तो इंसानी फितरत का रंग-बिरंगा नजारा है। कोई बेहद मिलनसार है तो कोई घोर एकांतप्रिय, कोई शाहखर्च है तो कोई पक्का मक्खीचूस, कोई मनमोह लेता है तो कोई महाबोर है। मगर इन सबमें बहुत-सी बातें समान भी होती हैं, जो सफलता की ओर बढ़ने में सहायक होती हैं। जो महत्वाकांक्षा की अनिवार्य योग्यता हैं।
यह जानी-मानी बातें हैं कि व्यापार को शिखर तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। रोजाना बारह घंटे का दफ्तर, दिन के भोजन के समय भी कारोबारी मुलाकातें, रातों में और छूट्टी के दिन भी काम - यह उद्योगपतियों की आम दिनचर्या होती है। परिश्रम ही सफलता का पहला सूत्र है। जिसके लिए काम का नशा चढ़ना जरूरी है।
काम की धुन : विश्वविख्यात भारतीय उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा को काम करने का नशा था। वह प्रत्येक कार्य में उत्कृष्टता हासिल करने का प्रयास करते थे और उनकी कार्यशैली में एक विशिष्ट नैतिकता होती थी, जिसने टाटाओं को उद्योग की दुनिया में ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
कितने ही उद्योगपति कबूल करते हैं कि उन्हें काम का नशा है। अटलांटा के नौजवान उद्योगपति राबर्ट एडवर्ड टर्नर तृतीय ने एक साक्षात्कार में कहा था, 'मैं घरवालों की सारी आवश्यकताएं पूरी कर चुका हूं, फिर भी कमाए जा रहा हूं क्यों? क्योंकि यह एक ऐसी मस्ती है, जो छोड़ते नहीं बनती।' यूनाइटेड टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन हैरी ग्रे को भयंकर दुर्घटना के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ गया। इस पर उन्होंने फाइलें लेकर अपने सेक्रेटरी को भी वहां बुलवा लिया और महीनों पीठ के बल लेटे-लेटे काम निपटाते रहे।
रिलायंस उद्योग समूह के संस्थापक धीरूभाई अंबानी ने बहुत थोड़ी संपदा से कार्य आरंभ किया। कम संसाधनों से अधिक उत्पादन तथा हर कार्य में गुणवत्ता को सर्वोपरि रखकर उन्होंने रिलायंस उद्योग को समृद्ध बनाया। इसी तरह मोदी उद्योग के संस्थापक राय बहादुर गूजरमल मोदी और उनके पुत्र भी आगे बढ़े। आधुनिक भारतीय उद्योगपति भी अपनी कार्यशैली से ही दुनिया में कामयाब हुए हैं।
उसकी छुट्टी न हुई जिसको सबक याद हुआ
ये उद्योगपति इस कदर कार्यनिष्ठ होते हैं कि छुट्टी-वुट्टी उनके लिए एक बेहूदगी है। अमेरिकन स्टैंडर्ड इन्कॉर्पोरेटेड के अध्यक्ष विलियम माक्र्वोड लंबी छुट्टियों के बजाय लंबे वीक एंड्स को पसंद करते हैं। वह कहते हैं, 'चौथा दिन बीतते-बीतते मुझे अकुलाइट होने लगती है।' अटलांटा के फूक्वो इंडस्ट्रीज के संस्थापक जॉन लुक्स फूक्वो एक बार दो सप्ताह की छुट्टी मनाने स्विट्जरलैंड गए, मगर तीन दिन बाद ही दफ्तर लौट आए। बोले, 'महल सारे एक-से होते हैं। एक देखा तो समझो, सभी देख लिए।' विलक्षण कार्यानुरक्ति के लिए उद्योगपतियों को असाधारण ऊर्जा चाहिए।
बहुत से होनहार, युवा उद्यमी केवल इसलिए सफल नहीं हुए कि उनके कस-बल जुदा किस्म के थे। जेरॉक्स के पीटर मैककोलो कहते हैं, 'जल्दी ही यह पता चल जाता है कि कौन दौड़ में पिछड़ जाएगा।' यही बात लिटन इंडस्ट्रीज के टैक्स थार्नटन ने कही है, 'दौड़ने वाले घोड़ों का पालन पोषण दौड़ के लिए ही किया जाता है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू होती है, क्योंकि उद्यम संस्कारों में होता है।'
प्रेरक सत्ता : सफल उद्यमियों को कड़ी मेहनत की प्रेरणा कहां से मिलती है? धन की कामना आदमी को व्यवसाय की ओर उन्मुख करती है, परंतु ऊंचाइयां छूने का प्रेरक धन नहीं होता। यह प्रेरक है सत्ता की लालसा। मानसिटो कंपनी के प्रधान अधिकारी जॉन वेलर हैनली को अब तक याद है कि किशोरावस्था से ही वे दूसरों से मनचाहा काम करा लेने की फिराक में रहते थे। शुरू-शुरू में जब वे सोडा वाटर की दुकान पर काम करते थे, तब भी वे ग्राहकों से माल्टमिश्रित मिल्क शेक में अंडा डालकर पीने का आग्रह करते रहते थे।
डोनाल्ड वेल्सन फ्राई अपने परिश्रम के बल पर 44 वर्ष की आयु में फोर्ड मोटर्स के ग्रुप - वाइस प्रेजीडेंट बन गए, पर उन्हें तसल्ली नहीं हुई। वे कहते थे, 'मुझे एक पूरा कारोबार खुद चलाना है।' अंतत: फोर्ड को छोड़कर वे बेल एंड हाबेल के प्रधान अधिकारी बन बैठे। यह कंपनी फोर्ड के मुकाबले बित्ते-भर की थी, मगर पूरी की पूरी उनके अधीन थी।
जबर्दस्त जिज्ञासु : उद्योगपति जबर्दस्त जिज्ञासु होते हैं। होनहारों का गुण उनके करियर के प्रारंभ में ही स्पष्ट हो जाता है - वह कभी भी अपनी जगह पर नहीं बैठते। वह दूसरे विभागों में घूमता, लोगों से सवाल-जवाब करता, उन्हें परामर्श देता, तंग करता रहता है। एटी एंड टी के पूर्व प्रधान अधिकारी जॉन डिवट्स कई बार मेंटनेंस विभाग के कर्मचारियों के साथ टेलीफोन लगाने या तारों की मरम्मत में उनका हाथ बंटाते रहते। 'फार्च्यून' में प्रकाशित उनके एक उपाध्यक्ष का संस्करण है : बॉस और मैं एक कमरे के सामने से गुजरे। मैंने पूछा, जॉन साहब, पता नहीं ये सब क्या हो रहा है। इस पर वे जरा तेज आवाज में बोले, 'पर मैं तो जानता हूं वे क्या कर रहे हैं।'
उद्योगपतियों की कुछ और विशेषताओं भी होती हैं। मौका न चूकने के मामले में वे लाजवाब होते हैं। निहायत चौकस-एकदम घात में। निजी फायदे का कोई भी मौका उनके हाथ से नहीं निकल सकता। इस सबके अलावा, ये लोग सच्चे अर्थो में आस्थापात्र होते हैं। अपने काम में, अपने माल में, अपनी कंपनी में और निरकुंश उद्योग प्रणाली में उन्हें गहरी आस्था होती है। और क्यों न हो, इसमें उन्हें सफलता जो मिली है।
(लेखक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता के अचूक मंत्र' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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