नई सोच से बदलें पुराने विचार

लुइस एल. हे

नई दिल्ली, 1 नवम्बर (आईएएनएस)। मेरे अंदर हमेशा हठ की एक प्रवृत्ति रही है। अब भी कभी -कभी जब मैं अपने जीवन में कोई बदलाव लाना चाहती हूं तो यह हठ सामने आ जाता है और अपनी सोच को बदलने के प्रति मेरा प्रतिरोध सशक्त हो जाता है। ऐसे में थोड़ी देर के लिए मैं स्वार्थी, क्रोधित और पराजित हो सकती हूं।

जी हां, इतने वर्षो तक मेहनत करने के बावजूद यह सब मेरे अंदर अब भी चलता रहता है। मेरा एक सबक है। लेकिन अब ऐसा जब भी होता है, मैं जानती हूं कि मैं परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण बिंदु पर हूं। हर बार जब मैं अपने जीवन में कोई बदलाव लाने, कुछ और छोड़ने का फैसला करती हूं, ऐसा करने के लिए मैं अपने भीतर अधिक गहराई में जाती हूं।

हमें पुराने विचार की परत को नई सोच से बदलना चाहिए। उसमें से कुछ आसान है और कुछ एक पंख से चट्टान उठाने की तरह है।

जब मैं कहती हूं कि मैं परिवर्तन लाना चाहती हूं, तो मैं पुराने विचार को दृढ़ता से पकड़ती हूं और उतना ही जानती हूं कि उसे छोड़ना मेरे लिए सबसे महत्तवपूर्ण है। इन चीजों को सीखने के बाद ही मैं दूसरों को सिखा सकती हूं।

मेरी राय है कि वास्तव में कई अच्छे शिक्षक खुशहाल परिवारों से नहीं होते, जहां सबकुछ आसान होता है। वे अधिक पीड़ा व दु:ख देखकर आते हैं और वे उस स्थान तक कई परतों को पार करके पहुंचे होते हैं, जहां अब वे मुक्त होने में दूसरों की मदद कर सकते हैं। अधिकतर अच्छे शिक्षक सीमाओं की गहरी परतों को हटाने के लिए और भी अधिक विचारों को छोड़ने पर लगातार काम करते रहते हैं। यह एक जीवन भर का व्यवसाय बन जाता है।

पहले मैं आस्थाओं को छोड़ने के विषय में जिस रूप में काम करती थी और आज जिस रूप में करती हूं, उसमें प्रमुख अंतर यह है कि अब मुझे ऐसा करने के लिए अपने ऊपर क्रोधित नहीं होना पड़ता। अब मैं यह नहीं मानती कि मैं केवल इसलिए एक बुरी इंसान हूं कि मुझे अपने अंदर बदलाव के लिए कुछ और मिलता है।

अब मैं अपने मन-मस्तिष्क में जो कार्य करती हूं, वह किसी घर की सफाई करने जैसा है। मैं अपने मन के कमरों से गुजरती हूं और उनमें मौजूद विचारों व आस्थाओं की जांच करती हूं। कुछ को मैं पसंद करती हूं, इसलिए उन्हें झाड़-पोंछकर चमका देती हूं तथा उन्हें और भी उपयोगी बना देती हूं।

कुछ को मैं हटाने या मरम्मत की जरूरत महसूस करती हूं और उस कार्य में लग जाती हूं। कुछ पिछले दिन के अखबार, पुरानी पत्रिकाओं या कपड़ों की तरह होते हैं, जो अब उपयुक्त नहीं रह गए हैं। उन्हें मैं या तो छोड़ देती हूं या कूड़ेदान में फेंक देती हूं, साथ ही उन्हें हमेशा के लिए जाने देती हूं।

मेरे लिए ऐसा करने की प्रक्रिया में क्रोधित होना या स्वयं को बुरा व्यक्ति महसूस करना आवश्यक नहीं है।

अभ्यास : बदलना चाहता हूं। चलिए, इस दृढ़ वचन का प्रयोग करते हैं, 'मैं बदलना चाहता हूं।' इसे बार-बार दुहराएं। 'मैं बदलना चाहता हूं, मैं बदलना चाहता हूं।' आप ऐसा कहते समय अपने गले को स्पर्श कर सकते हैं। गला शरीर का ऊर्जा केंद्र है, जहां पर्वितन होता है। अपने गले को स्पर्श करते हुए आप स्वीकार करते हैं कि आप परिवर्तन की प्रक्रिया में हैं।

जब आपके जीवन में परिवर्तन आएं तो अच्छा सहित उन्हें दें। यह ध्यान रखें कि जहां पर आप 'नहीं बदलना चाहते,' वहीं वास्तव में आपको बदलाव की सबसे अधिक आवश्यकता है।

(प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'यू कैन हील योर लाइफ' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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