भलखू की जुओं की बदौलत बनी शिमला-कालका रेलवे लाइन!

हिमाचल पर्यटन विकास विभाग द्वारा शिमला के अतीत के बारे में प्रकाशित पुस्तक 'हर घर कुछ कहना है' में दी गई है। एक सरकारी बयान के मुताबिक यह पुस्तक पर्यटन विभाग के निदेशक डा.अरुण शर्मा के व्यक्तिगत प्रयासों से 10 माह की मेहनत के बाद हाल ही में प्रकाशित की गई है। किताब के मुताबिक ब्रिटिश रेलवे कंपनी के चीफ इंजीनियर एच.एस.हैरिंगटन के लाइन बिछाने की विफलता के बाद एक पहाड़ी अनपढ़ युवक 'भलखू' ने इस 95 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का खाका तैयार किया था।

किताब के अनुसार पहाड़ी युवक 'भलखू ने अपने घुंघराले-घने बालों में पड़ी जुओं में विद्यमान दैवीय शक्ति के माध्यम से इस रेलवे ट्रैक का नक्शा तैयार किया था। 'भलखू' अपने सिर में पड़ी जुओं को शक्कर का भोग लगाता था। उसने ब्रिटिश इंजीनियरों को अपने पीछे चलने का फरमान सुनाया तथा कहा कि जिस रास्ते से वह गुजरेगा उसी रास्ते से शिमला-कालका रेलवे लाइन का ट्रैक बनाया जाएगा।

'भलखू' ने अपने सिर में विद्यमान जुओं की दैवीय शक्तियों के निर्देश पर कालका से शिमला रेलवे लाइन की रूपरेखा तय की तथा वह जहां-जहां चलता रहा, ब्रिटिश इंजीनियरों का दल उसके पीछे रेलवे ट्रैक का निशाना लगाता रहा।

किताब के अनुसार अंग्रेज शासकों ने शिमला को रेलवे लिंक से जोड़ने की योजना वर्ष 1847 में बनाई थी, लेकिन कठिन पर्वतीय स्थितियों की वजह से रेलवे ट्रैक का सर्वे न हो पाने की वजह से यह देश की पहली रेलवे लाइन बनने से वंचित रह गई।

9 नवम्बर 1903 को शुरू की गई कालका-शिमला रेलवे लाइन मूल रूप से 107 सुरंगों के बीच से निकाला गया था, लेकिन बाद में इन सुरंगों की संख्या 103 रह गई तथा अब यह रेलवे लाइन 102 सुरंगों से होकर गुजरती है।

यह रेलवे लाइन 800 पुलों तथा 900 पहाड़ी तीखें मोड़ों से गुजरती है। यह सभी सुरंगों वर्ष 1900 से 1903 के बीच निर्मित की गई थीं। सबसे बड़ी एक किलोमीटर लंबी सुरंग बड़ोग में है। बड़ोग सुरंग को कर्नल एस.बड़ोग के नाम पर रखा गया है जिन्हें सुरंग की गलत अलाइनमेंट की वजह से हुए नुकसान के लिए तत्कालीन वायसराय ने एक रुपया जुर्माना लगाया था जिससे दुखी होकर उन्होंने इस जगह पर आत्महत्या कर ली थी तथा उसकी यादगार में इस सुरंग का नाम बड़ोग सुरंग रख दिया गया था।

रेलवे लाइन शुरू होने के कुछ वर्षो तक शिमला से पांच किलोमीटर पहले स्थित तारादेवी रेलवे स्टेशन पर 'प्लेग इंस्पेक्शन पोस्ट' स्थापित की थी जिसके अंतर्गत तत्कालीन ब्रिटिश राजधानी शिमला जाने वाले सभी रेलवे यात्रियों को फ्यूमीगेशन के माध्यम से गुजारा जाता था ताकि महारानी ब्रिटिश हुक्मरानों तक न पहुंच सके।

किताब के अनुसार जब निजी ट्रेन से यात्रा कर रहे एक भारतीय महाराजा को फ्यूमीगेशन से गुजरने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपनी ट्रेन वापिस कालका के लिए मोड़ ली तथा अंग्रेज वायसराय को कड़ा विरोध पत्र भेज दिया।

शिमला जाने वाले हर यात्री का तारादेवी रेलवे स्टेशन का पूरा नाम, पता आदि लिखा जाता था तथा वह स्टेशन 'आप का नाम-बाप का नाम' रेलवे स्टेशन के रूप में मशहूर हो गया तथा यहां पर दी गई सभी जानकारी ब्रिटिश सी.आई.डी. को प्रदान की जाती थी।

कालका-शिमला रेलवे स्टेशन पर अब भी अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई 'नील टोकन उपकरण प्रणाली' कार्यरत है जिसके अंतर्गत ट्रेन ड्राइवर को हर स्टेशन पर टोकन प्रदान किया जाता है। इस प्रणाली के अंतर्गत 1923 में ब्रिटिश कंपनी 'साक्सवार्ड फार्मर्स लिमिटेड' द्वारा स्थापित की गई मशाीनों से निकाला गया टोकन ड्राइवर को दिया जाता है।

इस प्रणाली के अंतर्गत ड्राइवर को हर स्टेशन पर टोकन दिया जाता है जिसे वह अगले स्टेशन पर जमा करवाता है तथा आगे की यात्राओं के लिए उसे फिर नया टोकन प्रदान किया जाता है। इस प्रणाली के अंतर्गत जब ड्राइवर स्टेशन पर स्टेशन मास्टर को टोकन देता है तो उस टोकन को मशीन में डाला जाता है तथा उस मशीन का लिंक अगले स्टेशन की मशीन से जुड़ा होता है। दोनों मशीनों के बीच तकनीकी मेलजोल से ही नया टोकन निकलता है तथा यह प्रक्रिया पूरी कालका-शिमला रेलवे लाइन पर अभी भी अपनाई जाती है।

इस रेलवे लाइन के प्रत्येक लाइनमैन को नौ किलोमीटर रेलवे ट्रैक की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है तथा यदि इस ट्रैक पर वह कोई भूस्खलन आदि पाए तो वह रेलवे ट्रैक पर पटाखे बांध देता है जिससे जब रेल उस ट्रैक से गुजरती है तो उसे खतरे का अहसास हो जाता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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