आजादी के लिए ज्ञान की जरूरत
लुइस एल. हे
नई दिल्ली, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। अपने परिवार को दोषी ठहराना। दोष देना किसी समस्या के टिके रहने का एक निश्चित तरीका है। दूसरों को दोषी ठहराने में हम अपनी शक्ति बरबाद करते हैं। 'समझना' हमें उस समस्या से ऊपर उठने और अपने भविष्य को नियंत्रित करने में मदद करती है।
अतीत को बदला नहीं जा सकता। भविष्य हमारी वर्तमान सोच से आकार लेता है। हमारी आजादी के लिए यह समझना अनिवार्य है कि हमारे माता-पिता के पास जो समझ, जागरूकता और ज्ञान था, उसके साथ वे अपने हिसाब से श्रेष्ठ काम कर रहे थे। जब हम किसी और को दोषी ठहराते हैं तो हम अपनी जिम्मेदारी नहीं ले रहे होते।
जिन लोगों ने हमारे साथ वो सब गलत किया, वे वैसे ही डरे हुए और आशंकित थे, जितने आप हैं। वे उतना ही असहाय महसूस करते थे जितना आप करते हैं। वो आपको उतना ही सिखा सकते थे, जितना उन्हें सिखाया गया था।
आप अपने माता-पिता के बचपन के बारे में, खासकर दस वर्ष की आयु से पहले उनके बचपन के बारे में कितना जानते हैं? यदि अब भी आपके लिए यह पता लगाना संभव है तो उनसे पूछिए। यदि आप अपने माता-पिता के बचपन के बारे में पता कर पाते हैं तो आप और अधिक आसानी से समझ पाएंगे कि उन्होंने जो किया, वह क्यों किया। यह समझ आपके अंदर संवेदना उत्पन्न करेगी।
यदि आपको इस बारे में पता नहीं है और पता नहीं कर सकते तो कल्पना करने कस प्रयास करें कि उनका बचपन कैसा रहा होगा। किस प्रकार का बचपन उनके जैसा वयस्क तैयार कर सकता है।
आपकी अपनी आजादी के लिए इस ज्ञान की जरूरत है। आप जब तक उन्हें मुक्त नहीं करते, तब तक आप खुद को मुक्त नहीं कर सकते। आप तब तक अपने आप को माफ नहीं कर सकते, जब तक आप उन्हें माफ न करें। यदि आन उनसे पूर्णता की मांग करते हैं तो आप खुद से भी पूर्णता की मांग करेंगे और फिर अपनी पूरी जिंदगी दु:खी रहेंगे।
अपने माता-पिता को चुनना। मैं इस सिद्धांत से सहमत हूं कि हम खुाद अपने माता-पिता को चुनते हैं। हम जो सबक सीखते हैं, वे हमारे माता-पिता की 'कमजोरियों' से पूरी तरह मेल खाते प्रतीत होते हैं।
मैं मानती हूं कि हम सभी एक अनंत सफर पर हैं। हम इस धरती पर कुछ खास सबक सीखने के लिए आए हैं, जो हमारे आध्यात्मिकक विकास के लिए जरूरी है। हम अपना लिंग, अपना रंग, अपना देश चुनते हैं और फिर एक पूर्ण 'परफेक्ट' माता-पिता की तलाश करते हैं जो हमारे विचार प्रारूपों को प्रतिबिंबित करते हैं।
इस धरती पर हमारा आना स्कूल जाने के समान है। यदि आप ब्यूटीशियन बनना चाहते हैं तो आप वैसे संस्थान में जाएंगे। यदि आप मेकैनिक बनना चाहते हैं तो आप मेकैनिक्स स्कूल में जाएंगे। यदि आप वकील बनना चाहते हैं तो आप लॉ स्कूल में जाएंगे। इस बार आपने जिन माता-पिता को चुना है, वे उन बातों में पूर्ण हैं, जो चीजें आप सीखना चाहते हैं।
जब हम बड़े होते हैं तो अकसर हम अपने माता-पिता की ओर उंगलियां उठाते हैं और कहते हैं, 'आपने मेरे साथ ऐसा किया!' लेकिन मेरा मानना है कि हमने स्वयं उन्हें चुना है।
दूसरों की बात सुनना। जब हम छोटे होते हैं तो हमारे बड़ भाई और बहन हमारे लिए भगवान होते हैं। यदि वे खुश नहीं थे तो शायद उन्होंने वह नाराजगी शारीरिक या शाब्दिक रूप से हमारे ऊपर निकाली। शायद उन्होंने ऐसी बातें कहीं-'यह तुम्हारी गलती है।' (अपराध-बोध डालने के लिए) 'तुम अभी बच्चे हो,तुम ऐसा नहीं कर सकते।' 'तुम बहुत बेवकूफ हो, हमारे साथ नहीं खेल सकते।' स्कूल में हमारे शिक्षक हम पर काफी प्रभाव डालते हैं। पांचवीं कक्षा में एक शिक्षक ने जोर देकर मुझसे कहा है कि मैं नृत्य करने के लिए अधिक लंबी हूं। मैंने उस पर विश्वास किया और नृत्य करने की अपनी इच्छाओं को दबा दिया, जब तक कि मैं नृत्य में अपना करियर बनाने की अपनी आयु पार नहीं कर गई।
क्या आप समझते थे कि परीक्षाएं ओर ग्रेड केवल यह देखने के लिए थे कि आपको एक निश्चित समय पर कितना ज्ञान था या आप ऐसे बालक थे जो ऐसी परीक्षाओं और ग्रेडों की मदद से अपना सामथ्र्य आंकते थे।
हमारे शुरुआती मित्र जीवन के बारे में अपनी जानकारी हमारे साथ बांटते हैं। स्कूल के दूसरे बच्चे हमें परेशान कर सकते हैं और हमेशा याद रहने वाली चीजें दे सकते हैं। जब मैं छोटी थी तो मेरा अंतिम नाम 'लुने' था और बच्चे मुझे 'लुनेटिक'(पागल)कहते थे।
पड़ोसियों का भी हम पर प्रभाव होता है, न केवल अपनी टिप्पणियों की वजह से, बल्कि इसलिए भी, क्योंकि हमें यह कहा जाता था,'पड़ोसी क्या सोचेंगे?'
उन दूसरे महत्पूर्ण लोगों के बारे में सोचिए, जिन्होंने आपके बचपन में आपको प्रभावित किया था। और निश्चित रूप से पत्रिकाओं में एवं टेलीविजन पर आनेवाले विज्ञापनों में भी सशक्त और प्रेरित करनेवाली बातें होती थीं। बहुत सारे उत्पाद हमें यह महसूस कराते हुए बेचे जाते हैं कि यदि हमने उनका इस्तेमाल नहीं किया तो बेकार या गलत हैं।
हम सब यहां पर अपनी शुरुआती संकीर्णताओं से आगे बढ़ने के लिए हैं, चाहे वे जो भी रहे हों। हम यहां पर अपनी भव्यता और दिव्यता को पहचानने के लिए हैं, चाहे 'उन्होंने' हमसे जो भी कहा हो। आपको अपने नकरात्मक विचारों पर काबू पाना है और मुझे अपने नकारात्मक विचारों पर काबू पाना है।
(प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'यू कैन हील योर लाइफ' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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