असंतोष नहीं तो बीमारियां भी नहीं

लुइस एल. हे

नई दिल्ली, 12 अक्टूबर (आईएएनएस)। वर्तमान सबसे अधिक शक्तिशाली होता है। आज तक जीवन में आपने जिन घटनाओं का अनुभव किया है, वे सभी आपके अतीत से जुड़े विचारों और आस्थाओं से बने हैं। वे उन विचारों और शब्दों से बने थे, जिन्हें आपने कल, पिछले सप्ताह, पिछले माह, पिछले वर्ष, आपकी आयु के अनुसार 10, 20, 30, 40 या इससे अधिक वर्षो के दौरान इस्तेमाल किया था।

फिर भी, वह आपका अतीत है। वह बीत चुका है। इस पल में महत्वपूर्ण यह है कि आप अभी क्या सोचना, विश्वास करना व कहना चाहते हैं, क्योंकि ये विचार और शब्द आपका भविष्य निर्धारित करेंगे। वर्तमान क्षण ही आपकी ताकत हैं और यही आपक कल, अगले सप्ताह, अगले माह, अगले वर्ष और आगे के अनुभवों का आधार हैं।

आप ध्यान दे सकते हैं कि इस क्षण में आप क्या सोच रहे हैं। वह नकारात्मक है या सकारात्मक? क्या आप चाहते हैं कि यह विचार आपका भविष्य तय करे? बस ध्यान दें और सजग हो जाएं।

हम केवल विचारों के साथ व्यवहार करते हैं और विचार बदले जा सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि समस्या क्या है, हमारे अनुभव अपने विषय अंदरूनी विचारों के बाहरी परिणाम हैं। यहां तक कि अपने आपसे घृणा करना भी केवल अपने विषय में ही विचार से घृणा करना है।

आपका यह विचार है कि 'मैं एक बुरा व्यक्ति हूं।' यह विचार एक भावना को उत्पन्न करता है और आप उस भावना के वश में हो जाते हैं। लेकिन यदि आपका यह विचार न हो तो यह भावना भी नहीं होगी। विचारों को बदला जा सकता है। विचार को बदलें तो यह भावना समाप्त हो जाएगी।

ये केवल यह दर्शाने के लिए है कि हम अपने बहुत से विश्वास कहां से प्राप्त करते हैं। लेकिन इस जानकारी को अपनी पीड़ा में डूबे रहने के बहाने के रूप में इस्तेमाल न करें। अतीत का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं होता। यह मायने नहीं रखता कि हम कितने लंबे समय से नकारात्म विचारों में डूबे रहे। शक्ति का केंद्रबिंदु वर्तमान क्षण में है। इसे महसूस करना कितना अद्भुत है! हम इस क्षण में मुक्त होना शुरू कर सकते हैं!

मानो या ना मानो, हम स्वयं उपने विचारों को चुनते हैं। हम आदत के अनुसार किसी विचार को बार-बार सोच सकते हैं, ताकि ऐसा न लगे कि हम स्वयं विचारों को चुन रहे हैं। लेकिन पहली बार विचार का चयन हमने ही किया था। हम कुछ खास विचारों को सोचने से इनकार कर सकते हैं। जरा ध्यान दीजिए कि आपने कितनी बार अपने बारे में सकारात्मक विचार लाने से इनकार कर दिया है। तो फिर आप अपने बारे में नकारात्म सोचने से भी इनकार कर सकते हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि इस धरती पर जिस किसी को मैं जानती हूं या जिसके साथ काम किया है, वह किसी-न किसी तरह आत्म-वंचना और अपराध-बोध से ग्रस्त है। हम जितनी ज्यादा आत्म -वंचना और अपराध-बोध रखते हैं, हमारा जीवन उतना ही बदतर होता है। आत्म-वंचना और अपराध-बोध जितना कम होता है, हमारा जीवन-हर स्तर पर उतना ही बेहतर होता है।

मैंने जिन लोगों के साथ काम किया है,उनके भीतर गहराई में यही विश्वास होता है 'मैं उतना अच्छा नहीं हूं।' साथ ही हम हमेशा कहते हैं,'और मैं अपेक्षित कार्य नहीं करता या 'मैं इसके योग्य नहीं हूं।' क्या लगता है कि आप ऐसे ही हैं? अकसर यही कहते, जोर देते या महसूस करते हैं कि आप 'बेहतर नहीं हैं' लेकिन किसके लिए? और किसके मानदंडों के अनुसार?

यदि यह विचार आपके अंदर अडिग है तो आप कैसे एक प्रेममय, आनंददायक, खुशहाल और स्वस्थ्य जीवन जी सकते थे? किसी न किसी तरह आपका प्रभावी अवचेतना विचार हमेशा उसका विरोध करता है। किसी न किसी तरह सही तालमेल नहीं हो पाता, क्योंकि कहीं न कहीं, कुछ न कुछ हमेशा गलत हो जाता है।

मैंने पाया कि नाराजगी, आलोचना, अपराध-बोध और भय किसी भी अन्य बात से अधिक समस्याएं उत्पन्न करते हैं। ये चार बातें हमारे शरीर और हमारे जीवन में बड़ी समस्याएं उत्पन्न करती हैं। ये भावनाएं दूसरों पर दोषारोपण करने और अपने अनुभवों के लिए स्वयं को जिम्मेदार न ठहराने से आती हैं। देखिए, यदि हम सभी अपने जीवन में हर बात के लिए जिम्मेदार हैं तो हम किसी पर दोषारोपण नहीं कर सकते।

बाहर जो भी घट रहा है, वह केवल हमारे आंतरिक विचारों का एक आईना है। मैं दूसरे लोगों के बुरे व्यवहार को नजरअंदाज नहीं कर रही हूं, लेकिन हमारा विश्वास ही लोगों को हमसे किसी प्रकार का व्यवहार करने के लिए आमंत्रित करता है।

यदि आप खुद को यह कहता पाएं कि हर कोई हमेशा मेरे साथ ऐसा करता है, मेरी आलोचना करता है, कभी मेरी मदद नहीं करता, मुझे पायदान की तरह इस्तेमाल करता है, तो ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करने के लिए आप लोगों को आकर्षित करते हैं। जब आप उस तरह नहीं सोचते तो वे कहीं और जाकर, किसी और के साथ ऐसा करेंगे। फिर आप उन्हें आकर्षित नहीं कर पाएंगे।

कुछ प्रवृत्तियों के नतीजे, जो शारीरिक स्तर पर अभिव्यक्त होते हैं, इस प्रकार हैं- लंबे समय से ठहरा असंतोष शरीर को नुकसान पहुंचाता है और कैंसर जैसी बीमारी बन जाता है। आलोचना, एक स्थायी आदत के रूप में अपनाएं तो यह शरीर में आर्थराइटिस को प्रेरित कर सकता है। अपराधबोध हमेशा सजा की तलाश करता है और सजा से पीड़ा होती है। (जब कोई मेरे पास ज्यादा पीड़ा के साथ आता है तो मैं जानती हूं कि उसमें बहुत सारा अपराधबोध है) भय और उसके कारण उत्पन्न होने वाले तनाव गंजापन, अल्सर और यहां तक कि पैरों में दर्द को जन्म दे सकता है।

मैंने पाया है कि क्षमा करने और असंतोष को बहा देने से कैंसर तक ठीक हो सकता है। शायद मेरी बात बड़ी सरल एवं अपरिपक्व लगती हो, लेकिन मैंने इसका प्रभाव देखा और अनुभव किया है।

(प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'यू कैन हील योर लाइफ' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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