नेपाल में प्रधानमंत्री पद के एक और निष्फल चुनाव की तैयारी
सुदेशना सरकार
काठमांडू, 25 सितम्बर (आईएएनएस)। पिछले लगभग तीन महीने से प्रधानमंत्री विहीन नेपाल में रविवार को एक बार फिर प्रधानमंत्री पद के निष्फल चुनाव की तैयारी है। यह विफलता इसलिए सुनिश्चित है, क्योंकि दो सबसे बड़ी पार्टियों ने चुनाव में हिस्सा न लेने का निर्णय किया है।
संसद में सबसे बड़ी, माओवादी पार्टी ने घोषणा की है कि वह अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, यानी पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' को चुनावी दौड़ से वापस ले रही है।
ज्ञात हो कि दो वर्ष पहले हिंदू राज्य से धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में परिवर्तित हुए नेपाल के पहले प्रधानमंत्री रहे प्रचंड पिछले सात दौर के चुनाव में संसद में सामान्य बहुमत हासिल करने में विफल रहे हैं। इस कारण उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर कर लिया है।
माओवादी, रविवार को होने वाले चुनाव का या तो बहिष्कार करेंगे, अथवा मतदान में हिस्सा नहीं लेंगे। परिणामस्वरूप मैदान में इकलौते उम्मीदवार, नेपाली कांग्रेस पार्टी के राम चंद्र पौडल ही रह जाएंगे। लेकिन यह नेपाल के संविधान का तकाजा है कि चुनाव फिर भी होगा। संविधान के अनुसार जब तक मैदान में एक भी उम्मीदवार रहेगा, चुनावी प्रक्रिया चलती रहेगी।
पूर्व उप प्रधानमंत्री पौडल और उनकी नेपाली कांग्रेस पार्टी ने चुनावी दौड़ से हटने से इंकार कर दिया है। लेकिन पौडल को चुनाव जीतने के लिए 601 सदस्यीय संसद में कम से कम 300 सदस्यों का वोट चाहिए। जबकि नेपाली कांग्रेस के पास केवल 114 सदस्य ही हैं।
पौडल को हालांकि दो अन्य छोटी पार्टियों के 11 अतिरिक्त सदस्यों का समर्थन मिल रहा है, फिर भी सामान्य बहुमत के साथ रविवार का चुनाव जीत पाना उनके लिए असंभव है। क्योंकि माओवादी और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी ने मतदान में हिस्सा न लेने का निश्चय किया है।
कार्यवाहक प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनीफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट (यूएमएल) पहले से ही सातों दौर के चुनाव से खुद को अलग किए हुए है। यूएमएल ने इस बात की घोषणा के लिए माओवादियों के साथ एक समझौता किया है कि वह रविवार के चुनाव में हिस्सा नहीं लेगी।
दरअसल, माओवादी और यूएमएल चाहते हैं कि मौजूदा चुनावी प्रक्रिया का अंत हो जाए, ताकि प्रधानमंत्री पद के चुनाव के लिए कोई नई प्रक्रिया अपनाई जा सके।
लेकिन संसद के सभापति सुभाष नेमबांग का कहना है कि जब तक पौडल मैदान से नहीं हट जाते, तब तक चुनावी प्रक्रिया जारी रखने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है, भले ही चुनाव निष्फल होता रहे।
दरअसल, नेपाल में मौजूदा राजनीतिक गतिरोध के लिए भी माओवादी जिम्मेदार हैं। माओवादियों ने इसके पहले की सरकार को सत्ता छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया था, जबकि प्रधानमंत्री को संसद में बहुमत हासिल था।
यद्यपि माओवादियों को चुनाव जीतने का पूरा भरोसा था, लेकिन चार क्षेत्रीय पार्टियों के एक मोर्चे द्वारा एक घोटाले के बाद प्रचंड को वोट देने से इंकार कर देने के बाद उनकी आशा, निराशा में बदल गई।
ज्ञात हो कि छठें दौर के चुनाव के पूर्व एक ऑडियो टेप सामने आया था। उस टेप में माओवादी सांसद कृष्ण बहादुर म्हारा और एक अज्ञात मध्यस्थ के बीच हुई बातचीत दर्ज है। उस मध्यस्थ ने 50 सांसदों का वोट खरीदने के लिए चीन स्थित अपने एक मित्र से 50 करोड़ नेपाली रुपये माओवादियों को उपलब्ध कराने का वादा किया है। प्रचंड की जीत के लिए माओवादियों को उतने ही वोट की आवश्यकता थी।
बहरहाल, अब गेंद पूरी तरह नेपाली कांग्रेस के पाले में है कि वह चुनाव के इस निष्फल दौर का अंत करे या इसे जारी रखे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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