नलखेड़ा में समग्र स्वच्छता बनी मिसाल

मध्य प्रदेश के गुना जिले के राघौगढ़ जनपद के गांव नलखेड़ा का नाम पूरे जिले में सम्मान से लिया जाता है क्योंकि इस गांव ने समग्र स्वच्छता अभियान में उम्मीदों से ज्यादा सफलता पाई है।

यूनिसेफ के सहयोग से चलाए जा रहे इस कार्यक्रम में गांव में सभी घरों में शौचालय का निर्माण कर स्वच्छ और स्वस्थ जीवन की आधारशिला रखी गई। इसी गांव के निवासी सुरेश आठवीं फेल हैं और पंचायत का कुछ काम कर अपनी आजीविका चला रहे हैं।

सुरेश ने अपनी बेटी नीति को पांचवीं तक पढ़ाया है और वह अगले साल उसका विवाह कर रहे हैं। वह बताते हैं कि उन्हें चिंता थी कि बेहतर दामाद मिलेगा या नहीं लेकिन पास के ही गांव ठाकर डोढ़ी में उन्हें पसंद का परिवार मिल गया। लड़का नरसिंहगढ़ में नौकरी करता है लेकिन पैतृक घर गांव में है।

सुरेश जब वहां गए तो यह देख कर चौंक गए कि बेटी के भावी ससुराल में शौचालय नहीं है। वह संबंध तय कर घर तो आ गए लेकिन शौचालय न होने की बात उन्हें अखरती रही। वह कहते हैं कि मैंने नलखेड़ा में शौचालय बनवाने के अभियान में हिस्सा लिया फिर अपनी बेटी ऐसे घर में कैसे ब्याह देता जहां शौचालय नहीं था।

उन्होंने भी अपने परिवार को शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए यह कह कर राजी किया था कि इससे वे बार-बार बीमार नहीं होंगे। गांव में सफाई रहेगी तो महामारी नहीं फैलेगी।

परेशान होकर आखिर एक दिन हिम्मत कर उन्होंने बेटी के ससुर से बात की, उन्हें शौचालय के फायदे बताए। वह इसके लिए राजी तो हो गए लेकिन धन की कमी आड़े आ गई। इस पर सुरेश ने प्रस्ताव दिया कि शौचालय बनवाने के लिए वह आर्थिक मदद करेंगे। इस पर सहमति बन गई और उन्होंने 1500 रुपये खर्च कर निर्माण सामग्री पहुंचाई। अब वह खुश हैं कि बेटी को सुसराल में शौचालय की कमी नहीं अखरेगी।

उन्होंने कहा कि यह दहेज नहीं बल्कि एक परिवार के स्वास्थ्य में सुधार के लिए किया गया उनका योगदान है।

सुरेश का यह कार्य मामूली नहीं है लेकिन वे कहते हैं कि नलखेड़ा में जो हुआ वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। पांच साल पहले तक गांव के अधिकांश लोग खुले में शौच करने जाते थे। वर्तमान सरपंच बलदेव प्रसाद बताते हैं कि यूनिसेफ के कार्यकर्ताओं ने जब उन्हें खुले में शौच के नुकसान बताए और कहा कि गांव में बार-बार बीमारियां फैलने का बड़ा कारण यह भी है तो वह चौंक गए थे। उन्होंने तभी तय किया था गांव को इस दोष से मुक्त करवाएंगे।

पूरे गांव में शौचालयों का निर्माण करवाना इतना आसान नहीं था। पंचायत सचिव लोकेंद्र यादव कहते हैं कि यह मूल रूप से आदत बदलने का मसला है। लोगों को समझाने और दबाव बनाने पर वे कुछ दिन शौचालय का इस्तेमाल करते फिर बाहर जाने लगते। इसे रोकने के लिए गांव के समझदार लोगों का सहारा लिया गया।

स्कूल में शिक्षकों ने बच्चों को शौचालय के इस्तेमाल के फायदे तो बताए और शौच के बाद व भोजन के पहले साबुन से हाथ धोने की जरूरत भी बताई। बच्चों ने न केवल इस आदत को अपनाया बल्कि घर में बड़ों को भी इसके लिए तैयार करने में मदद की। जिन घरों में जमीन नहीं थी। वहां जमीन का प्रबंध किया गया और सतत निगाह रखी गई कि कोई खुले में शौच न करे।

तीन साल के इस अथक प्रयास का परिणाम है कि आज गांव में बच्चे पहले की तरह बीमार नहीं पड़ते और न बड़ों को एमीबियोसिस जैसे रोगों के कारण पेट की बीमारी का शिकार होना पड़ता।

गौरतलब है कि यूनिसेफ राज्य और केंद्र सरकारों को समग्र स्वच्छता और जल आपूर्ति अभियानों के लिए सहायता देता है। नलखेड़ा की बदली सूरत इसी अभियान का सफल परिणाम है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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