हिमालय के संरक्षण में लोगों को शामिल करें : पर्यावरणविद

अंजलि ओझा

नई दिल्ली, 13 सितम्बर (आईएएनएस)। हिमालय के इर्द-गिर्द बड़े पैमाने पर बनते बड़े-बड़े बांधों की निंदा करते हुए प्रमुख पर्यावरणविदों ने कहा है कि विकास कार्यो, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और छोटे-छोटे बांधों के निर्माण में पहाड़ी लोगों को शामिल करके इस परेशानी का हल निकाला जा सकता है।

पिछले सप्ताह हिमालय दिवस पर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा के साथ यहां पहुंचे अनिल जोशी ने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांधों का निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहा है। इससे पर्यावरण को तो नुकसान पहुंच ही रहा है इसके अलावा अल्पावधि के लाभ के लिए लोगों को बेदखल किया जा रहा है।"

पद्मश्री प्राप्त जोशी 'हिमालयन एनवायरॉनमेंटल स्टडीज एंड कन्जर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन' के संस्थापक हैं। यह संगठन हिमालय में बसे ग्रामीणों के विकास के लिए काम करता है।

जोशी ने आईएएनएस को बताया, "विकास के नाम पर पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। तथ्य यह है कि जंगलों, खदानों और बांधों के नियमित व्यवसायिक इस्तेमाल से हिमालय के निवासियों के लिए जीवित रहना और अपने अस्तित्व को बचाए रखना बहुत मुश्किल हो गया है।"

जंगलों की कटाई के खिलाफ चले 70 के दशक के महत्वपूर्ण चिपको आंदोलन के नेता 73 वर्षीय बहुगुणा स्थानीय समुदायों को आंदोलित कर सक्रिय रूप से एक अभियान चलाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

उन्होंने उत्तराखण्ड में टिहरी बांध के खिलाफ चले आंदोलन का भी नेतृत्व किया था। बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद 2006 में इस बांध का निर्माण कार्य पूरा हो गया था।

बहुगुणा कहते हैं, "एक बांध में पानी को कुछ समय तक ही रोका जा सकता है और इसके बाद वह गाद से भर जाता है। पानी की समस्या स्थायी है इसलिए इसका हल भी स्थायी ही होना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "बांध नदी के प्राकृतिक बहाव को रोककर नदी की पारिस्थितिक नष्ट कर देते हैं। उनमें तल में गाद इकट्ठी हो जाती है, इस वजह से नदी की लहरें ज्यादा गहरी नहीं रह जातीं। इससे हिमालय के संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्र में अधिक दबाव पड़ता है और इससे भूगर्भीय संतुलन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।"

भारत में हिमालय क्षेत्र में इस समय 15,208 मेगा वाट क्षमता वाली 74 जलविद्युत परियोजनाएं हैं जबकि 37 और परियोजनाओं पर काम चल रहा है। वहां करीब 300 और परियोजनाएं शुरू करने की योजना है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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